कविता - चमचा पुराण



शीर्षक : चमचा पुराण 

चमचों को छोड़ो, चमचे ही खाली करते हैं,
राजनीति के रंगमंच पर,चमचे ही कालिख भरते हैं।
====1====
नेता तो बस मुखौटा है, असली खेल है चमचों का,
सच बोले तो भारी उपेक्षा,चुगलखोर की मौज महान है ,
असली खेल हे चमचों का।
====2====
ये चमचे न विचार न प्रचार, बस स्वार्थ का सवाल,
जिसकी दाल में घी ज़्यादा, उसकी जिंदाबाद का नारा,
यही खेल हे चमचों का।
====3====
आज इधर, कल उधर,इनका न कोई झंडा न कोई ईमान,
जहाँ दिखी मलाई,वहीं लार टपकाई,वहीं  वंदन वहीं अभिनन्दन,
यही सच हे चमचों का।
====4====
सच को गाली, झूठ की जयकार,चमचों के स्वार्थधर्म का यही सार।
जब नेता गिरता है,संभालते चमचे हैं!ज्योंहि नेता की चलती कम होती,
सबसे पहले चमचा फरार।
====5====
ये साथ नहीं, बंटवारा है,ये भीमकाय माया है।
नेता की कमजोरी, झूठी जय जयकार,
हर साजिश में इनकी लीला अपार,
जिस नेता के पास बैठे करता उसकी खाली है,
चमचे की चाल निराली है।
====6====
चमचों की जब तक़ होती पहचान,
तब तक़ रंगमच बन जाता शमशान,
सच का उजाला जब आता सामने,
तब तक़ तोता उड़ जाता आसमान में।
====7====
चमचों को छोड़ो, सत्य से स्वयं की जोड़ो,
चमचे नेता के शुभचिंतक नहीं बल्कि है असली शैतान,
इनके चक़्कर को छोडो,ये करा देते घमासान,
अपने को बचाना है तो चमचे कोहटाना है,
इसी में है सब का कल्याण।
====समाप्त====


चमचा पुराण (संक्षिप्त रूप)

चमचों को छोड़ो, चमचे ही खेल रचाते हैं,
राजनीति के रंगमंच पर, कालिख ये पुतवाते हैं।

नेता तो बस मुखौटा है, असली चाल चमचों की,
सच बोले तो उपेक्षा, चुगलखोर मौज मनाते हैँ।

न विचार, न सिद्धांत, बस स्वार्थ की पहचान,
जहाँ ज़्यादा दिखे मलाई , वहीं करें यह जयगान।

आज इधर, कल उधर, न झंडा न ईमान,
जहाँ मिले चंदन , वहीं वंदन-अभिनंदन।

सच को गाली, झूठ की जय—यही इनका धर्म,
नेता डूबे तो पहले भागे, यही इनका कर्म।

साथ नहीं, सौदे करते, माया का ये जाल,
नेता की कमजोरी में, चमचे की चाल कमाल।

सच जब सामने आता है, उड़ जाता है यह तोता,
रंगमंच बनता श्मशान, खुल जाता हर झूठा कोटा।

चमचों से दूरी रखो, सत्य से नाता जोड़ो,
ये शुभचिंतक नहीं, असली शैतान—इनसे खुद को तोड़ो।

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