कविता - चमचावाद के प्रभाव में

कविता - चमचावाद के प्रभाव में 

चमाचावाद के प्रभाव में, नैतिकता के अभाव में,
जब-जब कोई संगठन चलेगा, पूछो न पूछो, 
उसे डूबने से कौन रोकेगा... ?
===1===
जहाँ सच कहना अपराध बने, झूठ पहरेदार बनें,
योग्यता को किनारे धकेल, चाटुकारिता की नाव चले,
स्वार्थ के डंके बजें और सच्चाई की कोई न सुने,
इस अनचार में, उसे डूबने से कौन रोकेगा ?
===2===
नेताओं के कानों को, सिर्फ़ अपने गुणगान चाहिए,
जनता की आवाज़ें कौन सुने, दरवारी चाटुकार चाहिए,
आँखों पर चढ़ गईं स्वप्रशंसा की पट्टी, सच कैसे दिखेगा,
इस स्वघोषित अंधकार में, उसे डूबने से कौन रोकेगा ?
===3===
जहाँ प्रश्नों पर पहरा हो और विचारों पर लगें ताले,
वहाँ पतन निश्चित होता है, फिर भी सब फरेब के मतवाले,
स्वार्थ के चरणस्पर्श में,स्वाभिमान कहां टिकगा,
झूठ की जाजम पर बैठे को, डूबने से कौन रोकेगा ?
===4===
व्यक्तिगत पूजा की आँधी में, लोकतंत्र खो गया,
हक़ की आवाजें थम गईं,आनाचारमय व्यवस्था हो गईं,
इतिहास लिखेगा परिणाम,असत्य ही जीत कर आया,
अनीति के दृष्टिदोष जिसे ,उसे डूबने से कौन रोकेगा ?
===5===
चमाचावाद के प्रभाव में, नैतिकता के अभाव में,
जब-जब कोई संगठन चलेगा,पूछो न पूछो, 
उसे डूबने से कौन रोकेगा ?
===समाप्त===

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