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पैसा जहां से आता है... लूटतंत्र वहीं जाता है

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विचार - " पैसा जहां से आता है " उसके इर्द गिर्द घूम रही है पूरी व्यवस्था... न लोकतंत्र है, न न्याय है और नहीं मानवता है... है तो महा भ्रष्टाचार है.....। " यह कथन — "पैसा जहां से आता है उसके इर्द-गिर्द घूम रही है पूरी व्यवस्था... न लोकतंत्र है, न न्याय है और नहीं मानवता है... है तो महा भ्रष्टाचार है..." — भारतीय सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पर एक कठोर लेकिन यथार्थपरक टिप्पणी है। इस आधार पर भारतीय व्यवस्था का विश्लेषण निम्न बिंदुओं में किया जा सकता है: --- 1. लोकतंत्र की वास्तविकता बनाम दिखावा संविधान में भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य कहा गया है। लेकिन व्यवहार में लोकतंत्र अक्सर केवल चुनावों तक सिमट कर रह गया है। ज्यादातर जनप्रतिनिधि चुनाव जीतते ही... कार्यकर्ताओं से और जनता से मुंह मोड़ लेते हैँ.... फिर उनकी फस्ट चवाइस ठेकेदार, सप्लार, कमीशन देनें वाले अधिकारी हो जाते हैँ। क्योंकि चुनाव खर्च निकलना है और अगले चुनावों का प्रबंध करना है। चुनावी राजनीति में धनबल और बाहुबल का वर्चस्व है। "पैसा जहां से आता है...

अपार संपत्ती का स्रोत,राजनेताओं को बताना अनिवार्य हो - अरविन्द सिसोदिया rajnetaon ki apaar snpatti

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अपार संपत्ती का स्रोत,राजनेताओं को बताना अनिवार्य हो - अरविन्द सिसोदिया  भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ हैं। जबकि भारत की शासन व्यवस्था के रोम रोम में भ्रष्टाचार व्याप्त है। यह अंग्रेजो के समय से ही चला आ रहा है, इसमें बहुत सारे अच्छे बदलाव अभी तक नहीं हो पाए हैं। इसका मुख्य कारण क्षेत्रीय राजनीति ही रहा है। किन्तु वर्तमान में तमाम विपक्ष को भी भ्रष्टाचारियों के पक्ष में खड़ा हुआ देख सकते हैं।  राजनीतिक दलों ने भी अपना पैसा बनाने और कमाने को ही प्रथम उद्देश्य रखा, इस कारण अंग्रेज व्यवस्था का भ्रष्टाचारी तंत्र छोटे मोटे बदलाव के बाद आज भी उसी तरह से बना हुआ है। अंग्रेजों के समय में, वोट डालने का अधिकार ही धनवान व्यक्ती को होता था,जिसके पास पैसा होता था, वही वोट डाल पाता था। आम गरीब उस समय वोट भी नहीं डाल पाता था। इसलिए तब राजनेता लाभ कमाने वाले होते थे। जो गरीबों का शोषण भी करते थे। वही वृति वही परंपरा अभी भी कमोवेश बनी हुई है।  अंग्रेज गये ओर बाबू छोड़ गये वाली कहावत यही दर्शाती है कि अंग्रेजों के समय की भ्रष्टाचारी व्यवस्था अभी भी ...

भ्रष्टाचार मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है ....

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- अरविन्द सिसोदिया     एक तरफ तो अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा जनता के बिच सार्वजानिक करने का दौर चल रहा है .. दूसरी तरफ बालाकृष्णन जैसे लोग .. जो सर्वोच्च न्यायलय के सर्वे सर्व रहे हों ...? अभी अभी हटे सतर्कता आयुक्त थामस साहब जो पोमा आयल में भ्रष्टाचार के लिए नाम जद थे ..! ए राजा जो केन्द्रीय मंत्री थे ... सुरेश कलमाड़ी कांग्रेस की प्रमुख टीम में सचिव थे संसद हैं .., नाम जितने आरोप उतनें.., जैसे ही लोग तो शिखर पर हैं .. , उनमें से ही एक लोकपाल होगा तब अन्ना क्या करेंगें ...!!  खबर है तिरुवनंतपुरम से ....... देश के  वर्तमान में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष  एवं  पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन ने अपनी संपत्ति के खुलासे से इंकार किया है। उनका कहना है कि ये उनकी निजता का हनन है। साथ ही उन्होने आयकर विभाग को ये सूचना भी भेजी है कि वह अपनी संपत्ति का खुलासा इसलिए नहीं करना चाहते क्योंकि ये किसी भी प्रकार से जनकल्याण के मुद्दे से जुड़ी नहीं है। उल्लेखनीय है कि अत्याधिक दबाव के बाद बालकृष्णन पिछले महीने अपनी संपत्ति के खुलासे के लिए तैयार हुए थे।...