प्रजनन दर (TFR) में ऐतिहासिक गिरावट







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संयुक्त राष्ट्र की इन रिपोर्ट्स (विशेषकर [UNFPA की 'स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन Report'](https://www.drishtiias.com/hindi/daily-updates/daily-news-analysis/unfpa-state-of-world-population-report-2025)) में भारत की जनसांख्यिकीय स्थिति (Demographics) को लेकर कई महत्वपूर्ण और चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। भारत के संदर्भ में मुख्य निष्कर्ष निम्नलिखित हैं: -

## 1. दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और 'पीक' का अनुमान

* शीर्ष स्थान: भारत 1.47 अरब से अधिक आबादी के साथ दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। यह वैश्विक आबादी का लगभग 17.8 प्रतिशत है। 

* पीक पॉपुलेशन (Peak Population): रिपोर्ट के अनुसार, भारत की आबादी अभी कुछ दशकों तक बढ़ती रहेगी और 2060 के दशक की शुरुआत में यह लगभग 170 करोड़ (1.7 बिलियन) के अपने उच्चतम स्तर (Peak) पर पहुंचेगी। इसके बाद, यानी आज से करीब 40 साल बाद भारत की आबादी में गिरावट शुरू होगी। 


## 2. प्रजनन दर (TFR) में ऐतिहासिक गिरावट

* रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे: भारत का कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.9 पर आ गया है। यह आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी 'रिप्लेसमेंट लेवल' (2.1) से काफी नीचे है। 

* इसका मतलब है कि औसतन एक भारतीय महिला अपने जीवनकाल में 2 से भी कम बच्चों को जन्म दे रही है। 1970 में भारत का TFR लगभग 5 था, जो अब तेजी से गिरा है। 


## 3. भारत के भीतर 'जनसंख्या विभाजन' (Regional Disparity)
रिपोर्ट भारत के भीतर ही राज्यों के बीच एक बड़ा जनसांख्यिकीय अंतर (Fertility Divide) दिखाती है: 

* उच्च प्रजनन दर वाले राज्य: बिहार (3.0), मेघालय (2.9), और उत्तर प्रदेश (2.7) जैसे राज्यों में जन्म दर अभी भी रिप्लेसमेंट लेवल से ऊपर बनी हुई है।

* कम प्रजनन दर वाले राज्य: देश के 31 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश रिप्लेसमेंट स्तर से नीचे आ चुके हैं। केरल, तमिलनाडु, और नई दिल्ली (1.2) जैसे राज्यों व शहरों में जन्म दर बहुत तेजी से घट रही है। 


## 4. कार्यशील आबादी और डेमोग्राफिक डिविडेंड (Demographic Dividend)

* युवा भारत: भारत के पास इस समय आर्थिक विकास की एक बड़ी खिड़की है क्योंकि देश की 68 प्रतिशत आबादी कार्यशील आयु वर्ग (15-64 वर्ष) में आती है।

* वहीं, भारत की कुल आबादी में 0-14 वर्ष के बच्चे 24% और 10-24 वर्ष के युवा 26% हैं।
* बुजुर्गों की बढ़ती संख्या: भारत में 65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के बुजुर्गों की आबादी फिलहाल 7% है, लेकिन जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) बढ़ने (पुरुषों के लिए 71 वर्ष और महिलाओं के लिए 74 वर्ष) के कारण भविष्य में बुजुर्गों की संख्या भी तेजी से बढ़ेगी। [5, 9, 10] 


## 5. प्रजनन स्वतंत्रता और वित्तीय चिंताएं
UNFPA की इस रिपोर्ट ने प्रजनन अधिकारों पर भी ध्यान केंद्रित किया है: 

* भारत में लगभग 23% 'द्वैध प्रजनन अंतर' (Dual Fertility Gap) देखा गया है, जहां लोग चाहकर भी अपनी पसंद के अनुसार बच्चों की संख्या का फैसला (वित्तीय बाधाओं या स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण) नहीं कर पा रहे हैं।

* 40% लोगों ने माना कि आर्थिक तंगी और नौकरी की असुरक्षा परिवार नियोजन (फैमिली प्लानिंग) के फैसलों को प्रभावित करती है। 

संक्षेप में कहें तो: भारत इस समय जनसंख्या विस्फोट से नहीं, बल्कि जनसंख्या संतुलन के एक नए मोड़ से गुजर रहा है। भारत के पास भारी युवा कार्यबल का लाभ उठाने का सुनहरा अवसर है, बशर्ते उन्हें उचित रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें। 
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भारत में धार्मिक आधार पर जनसंख्या विविधता और असंतुलन (Demographic Changes by Religion) को लेकर कई आधिकारिक और वैश्विक शोध संस्थाओं की प्रमाणित रिपोर्ट्स मौजूद हैं। इनमें भारत सरकार का राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS), भारत की जनगणना (Census of India), प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) का वर्किंग पेपर और अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center) की रिपोर्ट्स सबसे प्रमुख हैं। [1, 2, 3] 
इन रिपोर्ट्स के मुख्य निष्कर्ष और आंकड़े निम्नलिखित हैं:-

## 1. प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट (Pew Research Center - 2021/2025)
प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट 'Religious Composition of India' भारत में धार्मिक आबादी के बदलावों का सबसे गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है: 
* बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक अनुपात: इसके आंकड़ों के अनुसार, पिछले दशकों में भारत की धार्मिक संरचना में मामूली बदलाव आया है। सन् 2010 से 2020 के बीच भारत में हिंदू आबादी का हिस्सा लगभग 80% से मामूली घटकर 79.4% रहा, जबकि मुस्लिम आबादी का हिस्सा 14.3% से बढ़कर लगभग 15.2% हुआ। 

* 2050 का अनुमान: प्यू रिसर्च के अनुसार, 2050 तक हिंदुओं की आबादी देश में लगभग 77% और मुस्लिमों की आबादी 18.4% होने का अनुमान है। ईसाई (2%), सिख, बौद्ध और जैन धर्म की हिस्सेदारी या तो स्थिर रहेगी या मामूली रूप से घटेगी क्योंकि इनकी प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से कम है। 

* मुस्लिम आबादी का मिथक: रिपोर्ट साफ करती है कि बढ़ती आबादी के बावजूद, भारत में हिंदू एक बहुत बड़ा बहुमत बने रहेंगे। इस बात की कोई जनसांख्यिकीय संभावना नहीं है कि मुस्लिम आबादी संख्या में हिंदुओं से आगे निकल जाए। 

## 2. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के प्रमाणित आंकड़े
भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय समय-समय पर प्रजनन दर (Fertility Rate) के आंकड़े जारी करता है। NFHS-5 (2019-21) के आंकड़े दिखाते हैं कि सभी धर्मों में बच्चे पैदा करने की दर (TFR) तेजी से गिर रही है: 

* प्रजनन दर में समानता: मुस्लिम महिलाओं में प्रजनन दर में गिरावट की गति हिंदुओं की तुलना में अधिक तेज रही है। 1992 में हिंदू और मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रजनन दर का अंतर 1.1 (बच्चे प्रति महिला) था, जो अब घटकर सिर्फ 0.3 रह गया है। 

* धार्मिक आधार पर वर्तमान TFR: मुस्लिमों का फर्टिलिटी रेट घटकर 2.36 हो गया है, जबकि हिंदुओं का 1.94, ईसाइयों का 1.88, और सिखों का 1.61 है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले सालों में यह अंतर पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। 

## 3. प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM Paper - 2024)
मई 2024 में EAC-PM द्वारा जारी एक वर्किंग पेपर 'Share of Religious Minorities: A Cross-Country Analysis' में 1950 से 2015 के बीच जनसांख्यिकीय बदलावों का अध्ययन किया गया: 

* इस रिपोर्ट के अनुसार, 1950 से 2015 के बीच भारत में बहुसंख्यक हिंदू आबादी की हिस्सेदारी में 7.82% की गिरावट आई, जबकि मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी में 43.15% की वृद्धि दर्ज की गई।
* रिपोर्ट का निष्कर्ष था कि भारत में अल्पसंख्यकों की आबादी सुरक्षित है और फल-फूल रही है, जबकि पड़ोसी देशों (जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश) में बहुसंख्यक आबादी का हिस्सा बढ़ा है और अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी घटी है। 


## 4. भारत की दशकीय जनगणना (Census of India - 1951 से 2011)
आधिकारिक जनगणना के ऐतिहासिक आंकड़े भी इसी जनसांख्यिकीय बदलाव को दर्शाते हैं: 

| धार्मिक समूह | 1951 की जनगणना (हिस्सेदारी) | 2011 की जनगणना (हिस्सेदारी) | 2001-2011 दशकीय वृद्धि दर |
|---|---|---|---|
| हिंदू | 84.1% | 79.8% | 16.8% |
| मुस्लिम | 9.8% | 14.2% | 24.6% |
| ईसाई | 2.3% | 2.3% | 15.5% |
| सिख | 1.79% | 1.7% | 8.4% |
| बौद्ध/जैन/अन्य | ~2.0% | ~2.0% | 5.4% - 6.1% |

असंतुलन के मुख्य कारण क्या हैं?
प्रमाणित शोध बताते हैं कि विभिन्न धर्मों के बीच आबादी की वृद्धि दर में अंतर का मुख्य कारण कोई धार्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक संकेतक हैं। जिन समुदायों या क्षेत्रों में गरीबी अधिक है, महिला शिक्षा की कमी है, और बुनियादी स्वास्थ्य एवं परिवार नियोजन तक पहुंच कम है, वहां जन्म दर स्वाभाविक रूप से अधिक देखी गई है। जैसे-जैसे शिक्षा और आर्थिक स्तर सुधर रहा है, सभी समुदायों की आबादी स्थिर हो रही है। 
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The Ghost of Population Past:
How Population Control Persists in india 
लिंक -==
https://eacpm.gov.in/wp-content/uploads/2026/09/The_Ghost_of_Population_Past_EACPM_final.pdf 


(EAC-PM Paper - 2024) जनसंख्या असंतुलन पर पेपरवर्क प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) द्वारा मई 2024 में जारी किए गए वर्किंग पेपर का शीर्षक "Share of Religious Minorities: A Cross-Country Analysis (1950-2015)" है। इस रिसर्च पेपर में वर्ष 1950 से 2015 के बीच दुनिया के 167 देशों में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक आबादी के अनुपातिक बदलावों का अध्ययन किया गया है, जिसके भारत से जुड़े आंकड़ों ने देश में 'जनसंख्या असंतुलन' (Population Imbalance) पर एक बड़ी बहस को जन्म दिया।इस पेपर के मुख्य बिंदु, आंकड़े और निष्कर्ष नीचे दिए गए हैं:📊 भारत से जुड़े मुख्य आंकड़े (1950 - 2015)अध्ययन के मुताबिक, इन 65 वर्षों के दौरान भारत की कुल आबादी में विभिन्न धार्मिक समूहों की हिस्सेदारी (Share) में निम्नलिखित बदलाव देखे गए:बहुसंख्यक (हिंदू) आबादी की हिस्सेदारी में गिरावट: वर्ष 1950 में भारत की कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी 84.68% थी, जो 2015 में घटकर 78.06% हो गई (कुल हिस्सेदारी में 7.82% की गिरावट)।मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी में वृद्धि: वर्ष 1950 में मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी 9.84% थी, जो 2015 में बढ़कर 14.09% हो गई (कुल हिस्सेदारी में 43.15% की वृद्धि)।अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति:ईसाई: हिस्सेदारी 2.24% से बढ़कर 2.36% हुई।सिख: हिस्सेदारी 1.24% से बढ़कर 1.85% हुई।बौद्ध: हिस्सेदारी 0.05% से बढ़कर 0.81% हुई।जैन और पारसी: इन दोनों सूक्ष्म-अल्पसंख्यक समुदायों की आबादी की हिस्सेदारी में गिरावट दर्ज की गई।

🌐 वैश्विक परिप्रेक्ष्य (Global Context)EAC-PM के इस वर्किंग पेपर में केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक प्रवृत्तियों को भी रेखांकित किया गया है:वैश्विक गिरावट: दुनिया के 167 देशों में से अधिकांश में बहुसंख्यक आबादी की हिस्सेदारी औसतन 22% कम हुई है।पड़ोसी देशों की तुलना: पेपर के अनुसार, भारत के विपरीत उसके पड़ोसी गैर-मुस्लिम बहुसंख्यक देशों (जैसे श्रीलंका और भूटान) को छोड़कर, अन्य पड़ोसी देशों (जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश) में बहुसंख्यक धार्मिक आबादी की हिस्सेदारी बढ़ी है और वहां अल्पसंख्यकों की संख्या में भारी गिरावट आई है।

⚖️ पेपर के निष्कर्ष और व्याख्यासमावेशी माहौल का प्रमाण: ईएसी-पीएम पेपर के अनुसार, भारत में अल्पसंख्यकों की बढ़ती हिस्सेदारी यह दर्शाती है कि देश का सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी ढांचा उनके संरक्षण और विकास के लिए बेहद अनुकूल और समावेशी रहा है।सांख्यिकीय स्पष्टीकरण (विशेषज्ञों का मत): पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (PFI) और अन्य जनसांख्यिकी विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि 'हिस्सेदारी में 43% की वृद्धि' का मतलब यह नहीं है कि मुस्लिमों की कुल जनसंख्या हिंदुओं से अधिक हो रही है। यह केवल कुल आबादी के प्रतिशत में आया 4.2 प्रतिशत अंकों (Percentage Points) का अंतर है। भारत के सभी समुदायों में प्रजनन दर (Fertility Rate) लगातार तेजी से गिर रही है।

🔄 हालिया अपडेट (2026 की पूरक रिपोर्ट)EAC-PM ने अपनी हालिया रिपोर्ट "The Ghost of Population Past" (सितंबर 2026) में जनसंख्या नीति पर एक नया मोड़ लिया है:भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.9 पर आ गई है, जो रिप्लेसमेंट लेवल (2.1) से काफी नीचे है।इस पेपर में सलाह दी गई है कि अब सरकार को जनसंख्या नियंत्रण या दो-बच्चों के नियमों (Two-child norms) और नसबंदी से जुड़े प्रोत्साहनों को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए, क्योंकि देश अब घटती जन्मदर और बुजुर्ग होती आबादी (Ageing Population) की ओर बढ़ रहा है।आप इस विषय की अधिक विस्तृत जानकारी के लिए सीधे EAC-PM की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर मूल वर्किंग पेपर देख सकते हैं।


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