अखंड सौभाग्य का व्रत : करवा चौथ





अखंड सौभाग्य के लिए करवा चौथ व्रत
- रश्मि शर्मा
दैनिक भास्कर से साभार
मंगलवार २२ अक्टूबर २०१३ को करवा चौथ है। यह व्रत कार्तिक कृष्ण की चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को किया जाता है। यह पर्व दंपती के लिए एक?दूसरे के प्रति प्रेम, त्याग एवं उत्सर्ग की चेतना लेकर आता है।

इस दिन सुहागिन स्त्रियां पूर्ण श्रृंगारित होकर भगवान गणेश एवं चंद्रमा से अपने अखंड सौभाग्यवती होने की प्रार्थना करती है। इस दिन सुहागिन महिलाएं कुछ भी ग्रहण नहीं करती एवं अखंड रूप से भगवान से अपने पति की मंगल कामना करती है एवं पूर्ण निष्ठा से इस व्रत के पालन में तत्पर रहती है।

इस दिन केवल चंद्र ही नहीं बल्कि शिव?पार्वती, कार्तिकेय का भी पूजन होता है। शिव?पार्वती का दांपत्य एक आदर्श दांपत्य है, इसलिए उनका पूजन किया जाता है। जैसे घोर तप कर पार्वतीजी ने अखंड सौभाग्य श्ंाकरजी के रूप में पाया था, वैसा ही सौभाग्य सभी को मिले इसलिए इस दिन गौरी पूजन होता है।

महाभारत काल में द्रौपदी ने भी अर्जुन की सुरक्षा के लिए इस व्रत को भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर किया था एवं अर्जुन को वापस सुरक्षित पाया था। इस पूजन में एक कथा भी श्रवण की जाती है।

कथा: इंद्रप्रस्थ नगर में वेद शर्मा नाम के ब्राह्मण के सात पुत्र थे एवं एक पुत्री थी। जिसका नाम वीरावती था। सभी भाइयों का बहन पर अपार स्नेह था। सुदर्शन नामक युवक के साथ उनकी बहन का विवाह हुआ। एक बार वीरावती ने भी करवा चौथ का व्रत किया तथा दिनभर निर्जल एवं निराहार रहने से वह निढाल हो गई। उसी समय उसके भाई उससे मिलने आए। अपनी बहन की यह हालत उनसे देखी नहीं गई। उन्होंने कृत्रिम चंद्रमा दिखाकर अपनी बहन का व्रत खुलवा दिया।

ऐसा करने से उसके पति को अपार कष्ट के साथ बीमारी का सामना कर पड़ा एवं दु:खी हुए। एक बार इंद्र की पत्नी इंद्राणी पृथ्वी पर करवा चौथ करने आई। वीरावती ने उससे अपने पति के कल्याण का मार्ग पूछा, तब उसने बताया कि तुमने पहले अपने करवा चौथ व्रत को खंडित किया था, उसी का यह परिणाम है। तब वीरावती ने पूर्ण विधि?विधान से करवा चौथ का व्रत किया एवं अपने पति को रोगादि एवं दरिद्रता से मुक्त किया, तभी से यह व्रत प्रचलन में आया।



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