श्री मोहन जी भागवत : मानगढ़ धाम



राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक परम पूजनीय मोहन जी भागवत को वागड़ के अमर बलिदानी गोविन्द गुरु की तस्वीर भेंट करते राजस्थान सरकार के पूर्व चिकित्सा एवं स्वास्थ्य राज्य मंत्री श्री भवानी जोशी 
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक परम पूजनीय श्री मोहन जी भागवत ने आज मानगढ़ धाम पहुँच कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।




राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक परम पूजनीय श्री मोहन जी भागवत ने  मानगढ़ धाम पहुँच कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

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शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले....।।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक परम पूजनीय श्री मोहन जी भागवत ने आज मानगढ़ धाम पहुँच कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।



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दूसरा जलियावाला बाग हत्याकांड
राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, दक्षिणी मेवाड़, सिरोही तथा गुजरात व मालवा के मध्य पर्वतीय अंचलों की आबादी प्रमुखतया भीलों और मीणा आदिवासियों की है। इन आदिवासियों में चेतना जागृत करने एवं उन्हें संगठित करने का बीड़ा डूंगरपुर से 23 मील दूर बांसिया गाँव में जन्मे बणजारा जाति के गुरु गोविंद ने उठाया था। गोविन्द गुरु ने आदिवासियों को संगठित करने के लिए संप-सभा की स्थापना की।
संप का अर्थ है एकजुटता, प्रेम और भाईचारा। संप सभा का मुख्य उद्देश्य समाज सुधार था। उनकी शिक्षाएं थी - रोजाना स्नानादि करो, यज्ञ एवं हवन करो, शराब मत पीओ, मांस मत खाओ, चोरी लूटपाट मत करो, खेती मजदूरी से परिवार पालो, बच्चों को पढ़ाओ, इसके लिए स्कूल खोलो, पंचायतों में फैसला करो, अदालतों के चक्कर मत काटो, राजा, जागीरदार या सरकारी अफसरों को बेगार मत दो, इनका अन्याय मत सहो, अन्याय का मुकाबला करो, स्वदेशी का उपयोग करो आदि।
शनैः शनैः यह संपसभा तत्कालीन राजपूताना के पूरे दक्षिणी भाग में फैल गई। यहाँ की रियासतों के राजा, सामंत व जागीरदार में इससे भयभीत हो गए। वे समझने लगे कि राजाओं को हटाने के लिए यह संगठन बनाया गया है। जबकि यह आंदोलन समाज सुधार का था। गुरु गोविंद ने आदिवासियों को एकजुट करने के लिए सन् 1903 की मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा से गुजरात एवं मेवाड़ की सीमा पर स्थित मानगढ़ पहाड़ी पर धूणी में होम { यज्ञ व हवन } करना प्रारंभ किया जो प्रतिवर्ष आयोजित किया जाने लगा।
7 दिसम्बर 1908 को हजारों भील, मीणा आदि आदिवासी रंगबिरंगी पोशाकों में मानगढ़ पहाड़ी पर हवन करने लगे। इससे डूंगरपुर, बांसवाड़ा और कुशलगढ़ के राजा चिंतित हो उठे। उन्होंने अहमदाबाद में अंग्रेज कमिश्नर ए. जी. जी. को सूचना दे कर बताया कि आदिवासी इनका खजाना लूट कर यहां भील राज्य स्थापित करना चाहते हैं। बंदूकों के साथ फौजी पलटन मानगढ़ पहाड़ी पर आ पहुँची तथा
पहाड़ी को चारों और से घेर लिया एवं अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। पहाड़ी पर एक के बाद एक लाशें गिरने लगी। करीब 1500 आदिवासी मारे गए। अंग्रेजो ने गोविंद गुरु गिरफ्तार कर लिया। यह भीषण नरसंहार इतिहास में दूसरा जलियावाला बाग हत्याकांड के नाम से जाना जाता है। 






 




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