मां त्रिपुरा सुंदरी,बांसवाड़ा, राजस्थान



मां त्रिपुरा सुंदरी
राजस्थान में बांसवाड़ा से लगभग 14 किलोमीटर दूर तलवाड़ा ग्राम से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर ऊंची रौल श्रृखलाओं के नीचे सघन हरियाली की गोद में उमराई के छोटे से ग्राम में माताबाढ़ी में प्रतिष्ठित है मां त्रिपुरा सुंदरी। कहा जाता है कि मंदिर के आस-पास पहले कभी तीन दुर्ग थे। शक्तिपुरी, शिवपुरी तथा विष्णुपुरी नामक इन तीन पुरियों में स्थित होने के कारण देवी का नाम त्रिपुरा सुन्दरी पड़ा
तीनों पुरियों में स्थित देवी त्रिपुरा के गर्भगृह में देवी की विविध आयुध से युक्त अठारह भुजाओं वाली श्यामवर्णी भव्य तेजयुक्त आकर्षक मूर्ति है। इसके प्रभामण्डल में नौ-दस छोटी मूर्तियां है जिन्हें दस महाविद्या अथवा नव दुर्गा कहा जाता है। मूर्ति के नीचे के भाग के संगमरमर के काले और चमकीले पत्थर पर श्री यंत्र उत्कीण है, जिसका अपना विशेष तांत्रिक महत्व हैं । मंदिर के पृष्ठ भाग में त्रिवेद, दक्षिण में काली तथा उत्तर में अष्ट भुजा सरस्वती मंदिर था, जिसके अवशेष आज भी विद्यमान है। यहां देवी के अनेक सिद्ध उपासकों व चमत्कारों की गाथाएं सुनने को मिलती हैं।

पर्व उत्सव

मंदिर शताब्दियों से विशिष्ट शक्ति साधकों का प्रसिद्ध उपासना केन्द्र रहा है। इस शक्तिपीठ पर दूर-दूर से लोग आकर शीष झुकाते है। नवरात्रि पर्व पर इस मंदिर के प्रागण में प्रतिदिन विशेष कार्यक्रम होते है, जिन्हें विशेष समारोह के रूप में मनाया जाता है। नौ दिन तक प्रतिदिन त्रिपुरा सुंदरी की नित-नूतन श्रृंगार की मनोहारी झांकी बरबस मन मोह लेती है। चेत्र व वासन्ती नवरात्रि में भव्य मूर्ति के दर्शन प्राप्त करने दूरदराज से लोग आते हैं। चौबीसों घंटे भजन कीर्तन जागरण, साधना, उपासना, जप व अनुष्ठान की लहर में डूबा हर भक्त हर पल केवल मात की जय को उद्घोष करता दिखाई देता है। प्रथम दिवस शुभ मुहूर्त में मंदिर में घट स्थापना की जाती है। शुद्ध स्थान पर गोबर मिट्टी बिछा कर उसमें जौ या गेहूं बोये जाते हैं। इसके समीप ही अखण्ड ज्योति जलाई जाती है। मिट्टी-गोबर में बोये गए धान पर एक मिट्टी के कलश में जल भर कर रखा जाता है। इसे घट स्थापना कहते हैं। जल कलश के ऊपर मिट्टी के ढ़क्कन में गोबर-मिट्टी रखकर जौ बोये जाते हैं। दो तीन दिन पश्चात्‌ धान के अंकुर फूटते हैं, जिन्हें जवारे कहते हैं। इनके सामने देवी मां के चित्र की धूप, अगरबत्ती, नारियल, पुष्प, रोली, मोली आदि से पूजा करते हैं। नवरात्रि की अष्टमी और नवमीं को यहां हवन होता है। नवमीं या दशहरे पर जवारों को माताजी पर चढ़ाते हैं। तत्पश्चात्‌ पूजा अर्चना करके इस कलश को जवारों सहित माही नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। विसर्जन स्थल पर पुनः एक मेला सा जुटता है, जहां त्रिपुरे माता की जय से समस्त वातावरण गूंज उठता है। अष्टमी पर यहां दर्शनार्थ पहुंचने वालों में राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और महाराष्ट्र के भी लाखों श्रद्धालु शमिल होते है।

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