विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026


संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण के दौरान विपक्षी सांसद—हिबी ईडन, प्रशांत पडोले, डीन कुरियाकोस, सुप्रिया सुले और अन्य—1 अप्रैल 2026 को विरोध प्रदर्शन करते हुए। फोटो: पीटीआई

 विदेशी फंड वाले NGOs पर सरकार ने कसा शिकंजा,चुनावी मौसम में नए विधेयक पर बढ़ा विवाद नए नामित प्राधिकरण को बिना स्वतंत्र समीक्षा या तय समयसीमा के विदेशी फंड से बने संपत्तियों को जब्त, ट्रांसफर या बेचने का अधिकार दिया गया है।

 मार्च को लोकसभा में चुपचाप पेश किया गया एक विधेयक कुछ ही दिनों में चुनावी मौसम के सबसे तीखे राजनीतिक विवादों में से एक बन गया है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय द्वारा पेश विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 यह तय करता है कि भारत में NGOs और सिविल सोसायटी संगठन विदेशी फंड कैसे प्राप्त और खर्च करेंगे। कागजों पर यह एक नियामक सुधार जैसा दिखता है, लेकिन व्यवहार में यह केंद्र सरकार को हजारों संगठनों—जिनमें स्कूल, अस्पताल और धार्मिक स्थल शामिल हैं—की उन संपत्तियों पर व्यापक अधिकार देता है, जो दशकों में विदेशी फंड से बनाई गई हैं।

 केरल में बढ़ा सियासी तापमान इस विधेयक को लेकर सबसे ज्यादा राजनीतिक गर्मी केरल में देखी जा रही है, जहां 9 अप्रैल को विधानसभा चुनाव होने हैं। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस विधेयक को वापस लेने की मांग की है। राज्य में सत्तारूढ़ वाम दल और कांग्रेस—दोनों का आरोप है कि यह कानून अल्पसंख्यक संस्थानों को निशाना बनाने के लिए लाया गया है। राहुल गांधी ने इससे भी आगे बढ़ते हुए कहा कि यह RSS को फायदा पहुंचाएगा, जबकि चैरिटेबल संगठनों को केंद्र सरकार की दया पर छोड़ देगा। 

 केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इन आरोपों को “पूरी तरह झूठा, मनगढ़ंत और भ्रामक” बताया है। राजनीतिक बयानबाजी के पीछे इस कानून के प्रावधानों को खुद समझना जरूरी है, क्योंकि इसकी बारीकियां दोनों पक्षों के दावों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। जिस कानून में संशोधन किया जा रहा है, उसका इतिहास लंबा है। विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA), 1976 को आपातकाल के दौरान विदेशी राजनीतिक प्रभाव को रोकने के लिए लागू किया गया था। इसे 2010 में पूरी तरह बदल दिया गया।
 Also Read - महिला आरक्षण के बहाने सीट बढ़ोतरी-परिसीमन, क्या विपक्ष फंस गया है? इसके बाद 2016, 2018 और खासकर 2020 में इसमें संशोधन किए गए। 2020 के संशोधन में संगठनों द्वारा प्रशासनिक खर्च के लिए विदेशी फंड के उपयोग की सीमा 50% से घटाकर 20% कर दी गई। सभी फंड को नई दिल्ली में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एक ही खाते के माध्यम से भेजना अनिवार्य किया गया। साथ ही, संगठनों को छोटे पार्टनर NGOs को फंड ट्रांसफर करने से भी रोका गया। राज्यों की चिंता क्यों बढ़ी * केंद्र को FCRA से जुड़े सभी जांच मामलों पर वीटो पावर मिल जाती है, जिससे राज्यों की भूमिका खत्म हो जाती है। 

गैर-बीजेपी शासित राज्यों में धार्मिक और अल्पसंख्यक संस्थानों की संपत्तियां जब्त होने का खतरा बढ़ जाता है। 
* कोई स्वतंत्र अपीलीय निकाय नहीं है; सभी फैसले कार्यपालिका द्वारा नियुक्त अधिकारी के हाथ में होंगे। 
* पिछली सरकारों के समय रद्द हुए संगठनों की संपत्तियों पर भी यह कानून पिछली तारीख से लागू हो सकता है। 
* केरल जैसे चुनावी राज्यों में इसे अल्पसंख्यक संस्थानों पर लक्षित कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है। 
* इसे वित्त विधेयक (फाइनेंशियल बिल) के रूप में पेश करने से राज्यसभा की भूमिका सीमित हो जाती है, जहां विपक्ष अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है। यह विधेयक अब केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों, नागरिक समाज की स्वतंत्रता और राजनीतिक संतुलन पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। 

सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में इन प्रतिबंधों को बरकरार रखा था और कहा था कि विदेशी अंशदान प्राप्त करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है। इसका संयुक्त प्रभाव आंकड़ों में साफ दिखाई देता है। 2014 में इस कानून के तहत 40,000 से अधिक संगठनों के पास पंजीकरण था। आज यह संख्या लगभग 15,000 रह गई है, यानी 60 प्रतिशत से अधिक की गिरावट। करीब 22,000 संगठनों का पंजीकरण रद्द कर दिया गया, जबकि 15,000 से अधिक का पंजीकरण समाप्त हो गया। 

इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स ने 2024 में निष्कर्ष निकाला कि यह कानून गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के काम में अवैध रूप से बाधा डाल रहा है और इसे रद्द या संशोधित करने की मांग की। 

2026: नया नामित प्राधिकरण 2026 का संशोधन ऐसे ही विवादित माहौल में आया है। सबसे महत्वपूर्ण प्रस्तावित बदलाव “डिज़िग्नेटेड अथॉरिटी” (नामित प्राधिकरण) का गठन है। यह नया निकाय उन संपत्तियों पर नियंत्रण कर सकता है, जो विदेशी फंड से बनाई गई हैं, जब किसी संगठन का पंजीकरण रद्द हो जाए, वह स्वयं सरेंडर कर दे या उसकी वैधता समाप्त हो जाए। कल्पना कीजिए—कोई स्कूल, अस्पताल या धार्मिक स्थल जो विदेशी फंड से बना हो। यह प्राधिकरण ऐसी संपत्तियों को जब्त कर सकता है, उन्हें किसी सरकारी विभाग को हस्तांतरित कर सकता है या बेच सकता है। इसकी बिक्री से प्राप्त राशि सीधे केंद्र सरकार के खजाने में जाएगी। इस प्राधिकरण के फैसलों की समीक्षा करने के लिए कोई स्वतंत्र निकाय मौजूद नहीं है। कार्यपालिका (एक्जीक्यूटिव) को नियम बनाने की व्यापक शक्तियां दी गई हैं। इन प्रावधानों का पिछली तारीख से लागू होना भी बिना किसी नियंत्रण के है। यह स्वीकार करना उचित है कि यह प्रावधान किस समस्या को संबोधित करता है। मौजूदा कानून पहले से ही सरकार को पंजीकरण रद्द होने पर ऐसी संपत्तियों को अपने नियंत्रण में लेने की अनुमति देता था, लेकिन इसके लिए कोई स्पष्ट ढांचा नहीं था। सेंटर फॉर एडवांसमेंट ऑफ फिलैंथ्रॉपी ने इस पुराने प्रावधान को “डैमोक्लीज़ की तलवार” बताया था, जो पांच साल तक NGOs के ऊपर लटकी रहती थी, लेकिन इसे लागू करने का कोई स्पष्ट तंत्र नहीं था। खामियां भी बरकरार नया निकाय एक वास्तविक कमी को पूरा करता है, लेकिन समस्या इस बात में है कि यह इसे कैसे करता है। यह एक ही कार्यपालिका द्वारा नियुक्त अधिकारी के नियंत्रण में होगा। इसके फैसलों के लिए कोई समयसीमा तय नहीं है। कोई स्वतंत्र समीक्षा तंत्र मौजूद नहीं है। और जहां कोई संपत्ति आंशिक रूप से विदेशी और आंशिक रूप से घरेलू फंड से बनी हो, वहां भी पूरी संपत्ति इस प्राधिकरण के अधीन चली जाएगी। संगठन घरेलू हिस्से की वापसी के लिए आवेदन कर सकता है, लेकिन उसे यह साबित करना होगा कि वह हिस्सा “अलग या स्पष्ट रूप से निर्धारित” है। यदि कोई संगठन समय पर नवीनीकरण के लिए आवेदन नहीं करता, उसका आवेदन खारिज हो जाता है, या उसकी वैधता समाप्त हो जाती है, तो उसका पंजीकरण स्वतः खत्म हो जाता है। ऐसी किसी भी स्थिति में, बिना किसी अलग सुनवाई के ही इस प्राधिकरण की शक्तियां लागू हो जाएंगी। दांव बहुत बड़ा यही बात केरल के राजनीतिक नेतृत्व को चिंतित कर रही है। यदि नवीनीकरण आवेदन में देरी हो जाए या तकनीकी कारणों से खारिज हो जाए, तो केंद्र सरकार को उस संस्था की संपत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण मिल सकता है। धार्मिक संस्थानों के लिए, जिन्होंने दशकों में स्कूल, अस्पताल और सामुदायिक केंद्र बनाए हैं, दांव बहुत बड़ा है। धार्मिक स्थलों के लिए एक विशेष प्रावधान मौजूद है। यदि किसी स्थायी रूप से अधिग्रहित संपत्ति में कोई धार्मिक स्थल शामिल है, तो प्राधिकरण को उसका प्रबंधन किसी उपयुक्त व्यक्ति को सौंपना होगा। साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि उस स्थान की धार्मिक प्रकृति बनी रहे। हालांकि यह सुरक्षा प्रावधान भी उन नियमों पर निर्भर करेगा जो अभी बनाए जाने बाकी हैं। प्राधिकरण के पास यह तय करने का अधिकार रहेगा कि वह “उपयुक्त व्यक्ति” कौन होगा। शायद सबसे उल्लेखनीय प्रावधान पिछली तारीख से लागू होने वाली धारा (रेट्रोस्पेक्टिव क्लॉज) है। पुराने, अब हटाए जा चुके प्रावधान के तहत जिन संपत्तियों का पहले ही अधिग्रहण हो चुका था, उन्हें नए कानून के लागू होते ही इस नए निकाय के अधीन अस्थायी रूप से माना जाएगा। जिन संगठनों का पंजीकरण कई साल पहले रद्द हो चुका है, उनकी संपत्तियां भी बिना किसी नई कानूनी प्रक्रिया के इस नए ढांचे के तहत आ जाएंगी। दो अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान दो अन्य प्रावधान भी उल्लेखनीय हैं। पहला, इस कानून के तहत कोई भी जांच तब तक शुरू नहीं हो सकती जब तक केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति न हो। यह नियम राज्य सरकारों पर भी लागू होगा। केंद्र का कहना है कि इससे संगठनों को राजनीतिक बदले की भावना से होने वाली कार्रवाई से सुरक्षा मिलेगी। लेकिन इससे केंद्र सरकार को सभी प्रवर्तन कार्रवाइयों पर प्रभावी वीटो भी मिल जाता है। दूसरा, संशोधन में सरकार को विदेशी फंड की प्राप्ति और उपयोग के लिए समय-सीमा तय करने का अधिकार दिया गया है। हालांकि ये समय-सीमाएं कानून में सीधे परिभाषित नहीं हैं, बल्कि कार्यपालिका द्वारा बनाए जाने वाले नियमों के माध्यम से तय की जाएंगी। यह एक बार-बार दिखने वाला पैटर्न है—महत्वपूर्ण विवरण कानून में स्पष्ट करने के बजाय कार्यपालिका के विवेक पर छोड़ दिए जाते हैं, जो संसद की निगरानी से बाहर होते हैं। सजा में राहत, लेकिन जिम्मेदारी बढ़ी दंड के मामले में संशोधन अधिकतम जेल की सजा को पांच साल से घटाकर एक साल कर देता है, जो एक महत्वपूर्ण राहत है। हालांकि व्यक्तिगत जिम्मेदारी का दायरा काफी बढ़ा दिया गया है। “मुख्य पदाधिकारी” (की फंक्शनरी) की व्यापक परिभाषा में अब निदेशक, साझेदार, ट्रस्टी, पदाधिकारी, संचालन निकाय के सदस्य और संगठन के प्रबंधन पर नियंत्रण रखने वाला कोई भी व्यक्ति शामिल होगा। इन सभी को उल्लंघन के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा। हालांकि “ड्यू डिलिजेंस” का बचाव उपलब्ध है, लेकिन इसके लिए व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि उसे उल्लंघन की जानकारी नहीं थी और उसने सभी उचित सावधानियां बरती थीं। संसदीय जांच से बचने का आरोप इस विधेयक को वित्त विधेयक (फाइनेंशियल बिल) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिससे राज्यसभा की इसे रोकने की क्षमता सीमित हो जाती है। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इसके पेश होने का विरोध करते हुए कहा कि यह कार्यपालिका को बिना संवैधानिक सुरक्षा के अत्यधिक शक्तियां दे देता है। एक और दिलचस्प बात यह है कि इस विधेयक के वित्तीय ज्ञापन में कहा गया है कि इससे सरकार पर कोई अतिरिक्त खर्च नहीं आएगा। यदि सार्वजनिक धन खर्च ही नहीं हो रहा, तो इसे वित्त विधेयक के रूप में वर्गीकृत करना प्रक्रियात्मक आवश्यकता से अधिक लगता है। यह अधिक ऐसा प्रतीत होता है जैसे गंभीर महत्व के मुद्दे पर राज्यसभा की भूमिका को सीमित करने का प्रयास हो। आश्वासन बनाम वास्तविकता केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू का यह आश्वासन कि यह संशोधन धार्मिक समूहों को निशाना नहीं बनाता, और नित्यानंद राय का यह कहना कि वास्तविक संस्थानों पर इसका असर नहीं पड़ेगा—संभव है कि ईमानदार हो। लेकिन कानून का पाठ एक अलग कहानी बताता है। इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि किसी संस्था को “वास्तविक” (जेनुइन) क्या बनाता है। प्राधिकरण के फैसलों की समीक्षा करने के लिए कोई स्वतंत्र निकाय नहीं है। कार्यपालिका के पास नियम बनाने की व्यापक शक्तियां हैं और प्रावधानों को पिछली तारीख से लागू करने पर भी कोई स्पष्ट सीमा नहीं है। नागरिक समाज पर असर भारत का नागरिक समाज क्षेत्र स्वास्थ्य सेवाएं देता है, कानूनी सहायता उपलब्ध कराता है, पर्यावरणीय नियमों की निगरानी करता है और मानवाधिकार स्थितियों का दस्तावेजीकरण करता है। जब इस क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले नियम जवाबदेही के बजाय नियंत्रण को प्राथमिकता देते हैं, तो इसका सबसे बड़ा असर उन समुदायों पर पड़ता है जो इन संगठनों के काम पर सबसे ज्यादा निर्भर हैं। यह संशोधन अपने घोषित उद्देश्यों को कहीं अधिक संतुलित तरीके से भी हासिल कर सकता था—जैसे प्राधिकरण के फैसलों के लिए तय समय-सीमा, एक स्वतंत्र अपीलीय तंत्र, संपत्तियों के निपटान के स्पष्ट मानक, मिश्रित फंड से बनी संपत्तियों को अलग करने के व्यावहारिक नियम और पिछली तारीख से लागू होने वाले प्रावधानों पर समय-सीमा। इन सुरक्षा उपायों के बिना, जो कदम पारदर्शिता बढ़ाने के रूप में पेश किया जा रहा है, वह धीरे-धीरे संगठनों को खत्म करने की एक व्यवस्था जैसा दिखाई देता है

------=------
क्या सुप्रीम कोर्ट ने एनजीओ के खिलाफ कोई टिप्पणी की हुई है यदि हां तो बताएं

हां, भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने समय-समय पर एनजीओ (NGOs) के कामकाज, उनकी फंडिंग और विकास परियोजनाओं में बाधा डालने वाली याचिकाओं को लेकर सख्त टिप्पणियां की हैं। 

मुख्य टिप्पणियां और मामले निम्नलिखित हैं:
विकास परियोजनाओं में बाधा (अप्रैल 2025): सुप्रीम कोर्ट ने एक एनजीओ (कहार समाज पंच कमेटी) द्वारा रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट (जयकवाड़ी बांध) को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने पूछा, "अगर हर प्रोजेक्ट का विरोध किया जाएगा, तो देश कैसे प्रगति करेगा?" कोर्ट ने एनजीओ के पीछे के स्वार्थों (funding) पर भी सवाल उठाए।

पर्यावरण कानूनों के दुरुपयोग की चेतावनी: सुप्रीम कोर्ट ने यह चिंता जताई है कि कुछ एनजीओ प्रतिस्पर्धी कंपनियों के इशारे पर पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए पर्यावरण कानूनों का दुरुपयोग कर रहे हैं।

फंडिंग और ऑडिट (2021): सुप्रीम कोर्ट ने उन लगभग 30 लाख एनजीओ का ऑडिट करने का निर्देश दिया था, जिन्हें सरकारी धन मिला लेकिन वे यह बताने में विफल रहे कि पैसा कैसे खर्च किया गया। कोर्ट ने फंड की निगरानी के लिए तंत्र न होने पर नाराजगी जताई थी।

अनुच्छेद 32 का दुरुपयोग (दिसंबर 2025): कोर्ट ने एक एनजीओ पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया, जिसने अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े पुराने फैसले को चुनौती दी थी। कोर्ट ने इसे "प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग" बताया।
FCRA नियमों पर रुख: सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि विदेशी चंदा प्राप्त करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है और सरकार इसे विनियमित (regulate) कर सकती है। 

हालांकि, कोर्ट ने एनजीओ का पक्ष भी लिया है:
सितंबर 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी थी कि वे एनजीओ को परेशान न करें। कोर्ट ने चेन्नई स्थित दो एनजीओ के FCRA नवीनीकरण (renewal) को तकनीकी आधार पर अस्वीकार करने पर सरकार को फटकार लगाई थी और कहा था कि समाज सेवा करने वाले एनजीओ को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जाना चाहिए। 


FCRA Judgment: Assessing the Impact on NGOs - Supreme Court Observer
6 जून 2022 — In 2021, various NGOs challenged these Amendments at both High Courts and the Supreme Court for placing arbitrary and unconstitutional limits on their functioni...

Supreme Court Observer

Supreme Court dismisses revocation of NGO's FCRA registration in rare ...
3 अक्टू॰ 2025 — Supreme Court dismisses revocation of NGO's FCRA registration in rare protection of freedom of association. October 3, 2025. Event Summary. In September 2025, t...

Eu SEE

FCRA Amendment - Supreme Court Observer
20 जुल॰ 2022 — Justices A.M. Khanwilkar, Dinesh Maheshwari and C.T. Ravikumar delivered a Judgment upholding the Amendment on April 8th,2022. The court held that the Right to ...

Supreme Court Observer

Supreme Court pulls up Centre for denying FCRA renewal - Hindustan Times
20 सित॰ 2025 — The top courts' message comes at a time when several NGOs across India have faced scrutiny and denial of FCRA renewals in recent years. Updated on: Sep 20, 2025...

Hindustan Times

How will country progress if every project is opposed: SC slams NGO | India News
1 अप्रैल 2025 — Home / India News / How will country progress if every project is opposed: SC slams NGO. How will country progress if every project is opposed: SC slams NGO. Th...

Business Standard

SC on NGO's opposition to development projects: 'How will country progress?'
1 अप्रैल 2025 — This story is from April 01, 2025. SC on NGO's opposition to development projects: 'How will country progress?' TOI News Desk / TIMESOFINDIA.COM / Updated: Apr ...

The Times of India

SC warns against misuse of environmental laws to stall development ...
2 अप्रैल 2025 — SC warns against misuse of environmental laws to stall development projects. ... The Supreme Court has dismissed a plea by an NGO against a floating solar power...

The Economic Times

सुप्रीम कोर्ट ने एनजीओ के फंड की निगरानी के लिए कोई तंत्र न होने पर केंद्र सरकार को ...
अनुवाद किया गया — सरकार से खातों में हेराफेरी करने और धन की धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने का आह्वान किया गया है। ... मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को उन लगभग 30 ...

The Hindu

'प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग': सुप्रीम कोर्ट ने 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया...
12 दिस॰ 2025 — सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक गैर सरकारी संगठन पर अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर करने के लिए 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया, जिसमें 2014 के संविधान पीठ के ...

Live Law

FCRA Judgment: Assessing the Impact on NGOs
6 जून 2022 — In 2021, various NGOs challenged these Amendments at both High Courts and the Supreme Court for placing arbitrary and unconstitutional limits on their functioni...

Supreme Court Observer

एआई से मिले जवाबों में गलतियां हो सकती हैं. कानूनी सलाह के लिए, किसी वकील से बात करें. ज़्यादा जानें
कोई सवाल पूछें



टिप्पणियाँ

इन्हे भी पढे़....

छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश

कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहे।

सेंगर राजपूतों का इतिहास एवं विकास

वास्तविक "रघुपति राघव राजा राम " भजन Original "Raghupati Raghav Raja Ram" Bhajan

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर NSA लगाया जाये

परमपूज्य डॉ. हेडगेवार : अखण्ड राष्ट्र-साधना

खींची राजवंश : गागरोण दुर्ग

हिंदू और हिंदुत्व की सुरक्षा, अस्तित्व का यक्ष-प्रश्न; इसे नकारा नहीं जा सकता - अरविन्द सिसोदिया

श्री चांदमारी बालाजी मंदिर मार्ग कोटा की समस्या व समाधान Chandmari Balaji Kota