CJI

 To,
The Hon’ble Chief Justice of India,
Supreme Court of India, New Delhi

Subject: Representation for safeguarding judicial dignity and framing guidelines on baseless recusal pleas

Respected Sir,

I respectfully submit this representation as a concerned citizen. Recently, the Delhi High Court, in its decision concerning recusal, rejected the plea seeking withdrawal of Hon’ble Justice Swarana Kanta Sharma from hearing the matter, observing that the allegations were unfounded and could undermine the institutional dignity of the judiciary.

This issue, in my humble view, raises a matter of wider public importance. If allegations regarding judicial bias are made without substantive basis, it may adversely affect not only the judicial process but also public confidence in the administration of justice. The court of law is a forum meant for adjudication of genuine grievances and not for seeking publicity or exerting indirect pressure.

Therefore, I most respectfully pray that this Hon’ble Court may consider framing appropriate guidelines in this regard, including:

1. Clear parameters to identify baseless or speculative recusal applications;
2. Norms for imposing appropriate costs or measures in such cases;
3. Principles to prevent misuse of judicial processes for extraneous purposes.

This representation is made without intent to comment upon any individual, but only to request a policy-level consideration to further strengthen the dignity, independence, and credibility of the judiciary.

I sincerely hope that this Hon’ble Court will consider the matter.

Thanking you,

Yours faithfully,

Applicant:
Arvind Singh Sisodia
S/o Bhupendra Singh Ji
Caste: Rajput
Age: 69 years

Address:
In front of Bakery, Radhakrishna Mandir Road,
Dadwara, Kota Junction, Rajasthan
PIN Code: 324002

Mobile: 9414180151


Will Not Recuse Myself From Hearing This Case Here Is What Justice Swarna Kanta Sharma Said While Dismissing Kejriwals Plea 

मैं इस केस की सुनवाई से हटूंगी नहीं... क्या-क्या कहते हुए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने केजरीवाल की अर्जी कर दी खारिज
दिल्ली हाई कोर्ट ने शराब घोटाला मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को सुनवाई से हटाने की अरविंद केजरीवाल और अन्य की याचिका खारिज कर दी। इस दौरान जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने याचिकाकर्ताओं के आरोपों पर कोर्ट का पक्ष रखा।


नई दिल्लीः दिल्ली हाई कोर्ट ने आबकारी नीति मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को सुनवाई से हटाने की अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि पक्षपात के आरोप बेबुनियाद और बिना किसी आधार के थे। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के दावे न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश के समान हैं और इन्हें सुनवाई से हटने का आधार नहीं बनाया जा सकता। याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक कामकाज को बेबुनियाद आशंकाओं से प्रभावित नहीं किया जा सकता। 

आइए जानते हैं दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस जज स्वर्ण कांता शर्मा ने अपने फैसले में क्या क्या कहा?

Arvind Kejriwals recusal plea against Justice Swarana Kanta Sharma 

दिल्ली हाई कोर्ट ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को सुनवाई से हटाने की अरविंद केजरीवाल की याचिका खारिज कर दी है।

न्यायिक संस्था की गरिमा से जुड़ा मामला बताया
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि जब उन्होंने फैसला लिखना शुरू किया, तो "कोर्टरूम में सन्नाटा छा गया था," और उनके सामने भारत के संविधान के प्रति ली गई शपथ का गंभीर दायित्व था।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि एक जज के तौर पर उनकी चुप्पी पर भी सवाल उठाए गए थे, और यह मामला सिर्फ उनकी निजी निष्पक्षता से जुड़ा नहीं था, बल्कि पूरी न्यायिक संस्था की गरिमा से जुड़ा था।

जज ने कहा कि आसान रास्ता तो यह होता कि वे इस अर्जी पर फैसला किए बिना खुद को केस से अलग कर लेतीं, लेकिन उन्होंने इस मामले पर फैसला करने का ही विकल्प चुना, क्योंकि इसमें संस्था से जुड़ा एक बड़ा सवाल शामिल था।

कोर्ट ने कहा कि यह काम और भी मुश्किल हो गया था, क्योंकि दलीलों के दौरान विरोधाभासी बातें कही जा रही थीं—एक तरफ तो यह कहा जा रहा था कि जज की निष्पक्षता पर कोई शक नहीं है, लेकिन फिर भी केस को किसी असल पूर्वाग्रह के आधार पर नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह की आशंका के आधार पर दूसरी जगह ट्रांसफर करने की मांग की जा रही थी। जज ने आगे कहा कि इस तरह की अर्जी असल में पूरी न्यायिक संस्था पर ही सवाल खड़े करती है।

कोर्ट ने कहा कि किसी भी राजनेता को अपनी सीमाएं लांघने या न्यायपालिका की काबिलियत पर सवाल उठाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।

कोर्ट ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत दी थी, तो इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया गया था, और हाई कोर्ट के फैसले को रद्द नहीं किया गया था।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने जोर देकर कहा कि किसी जज की काबिलियत का आकलन कोई ऊपरी अदालत करती है, न कि कोई केस लड़ने वाला व्यक्ति।

मैं ये एप्लिकेशन्स रिजेक्ट करती हूं क्योंकि मेरी शपथ संविधान से हुई है और मुझे सिखाया है कि न्याय दबाव में झुकने से नहीं होता। न्याय दबाव में झुकता नहीं है। मेरी संविधान के प्रति निष्ठा है और मैं बिना डर के न्याय के पक्ष में फैसला करूंगी। इस मामले में खुद को अलग नहीं करूंगी। मैं इस केस की सुनवाई से हटूंगी नहीं।

जस्टिस जज स्वर्ण कांता शर्मा, दिल्ली हाई कोर्ट

  
RSS के कार्यक्रम में शामिल होने के आरोप पर क्या बोलीं?

जज ने कहा कि कई जज ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होते हैं, और सिर्फ एक वक्ता या मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होने को वैचारिक पूर्वाग्रह नहीं माना जा सकता, और न ही इससे किसी तरह के पूर्वाग्रह की कोई वाजिब आशंका पैदा होती है।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि यह समझना मुश्किल है कि सिर्फ मुख्य अतिथि या वक्ता के तौर पर शामिल होने से पूर्वाग्रह की आशंका कैसे पैदा हो सकती है, या इससे यह कैसे साबित होता है कि किसी केस पर फैसला करने की जज की काबिलियत पर कोई असर पड़ा है।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि किसी भी केस लड़ने वाले व्यक्ति को वकीलों और जजों के बीच के रिश्ते को कमजोर करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

उन्होंने जोर देकर कहा कि भले ही कुछ वकील राजनीतिक पार्टियों की तरफ से केस लड़ते हों, लेकिन कोर्ट में केसों पर फैसला पूरी तरह से केस के तथ्यों और मेरिट के आधार पर ही किया जाता है, न कि किसी राजनीतिक जुड़ाव के आधार पर।
जज समाज से कटकर, अलग थलग रहने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अगर ऐसा हुआ तो उन्हें ये कैसे पता चलेगा कि समाज में हो क्या रहा है और फिर वह उन विवादों को कैसे निपटाएंगे, जो उनके सामने आएंगे।

उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे आरोपों को अनुमति देने से न्यायिक प्रणाली में विश्वास कमज़ोर होगा और ऐसे मामलों की बाढ़ आ जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ऐसे आधारों पर विचार किया गया तो न्यायाधीशों को सार्वजनिक गतिविधियों से पीछे हटना पड़ेगा।

न्यायालय ने यह भी कहा कि केजरीवाल उनके द्वारा दिए गए किसी भी राजनीतिक बयान का उल्लेख करने में विफल रहें और कहा कि न्यायिक निष्पक्षता की एक पूर्वधारणा होती है जिसे न्यायाधीश को मामले से हटाने की मांग करने वाले वादी द्वारा खंडित किया जाना चाहिए।

बच्चों के सरकारी वकील के रूप में नियुक्ति पर क्या बोलीं
जस्टिस शर्मा ने इसके बाद उनके बच्चों को सरकारी वकील के रूप में नियुक्त किए जाने से उत्पन्न हितों के टकराव के आरोपों पर अपनी बात कही।

दिल्ली हाई कोर्ट ने जज के बच्चों के सरकारी वकीलों के पैनल में होने को लेकर 'हितों के टकराव' के दावे को ठुकरा दिया।
कोर्ट ने कहा कि एक जज के परिवार वालों से उसी प्रोफेशन में आने के उनके मौलिक अधिकार से उनको वंचित नहीं किया जा सकता। आवेदक के दावे निराधार और निरर्थक हैं।

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