कविता - नरेंद्र मोदी हर संकट में बन जाते , भारत के हनुमान



⚔️ वीर रस – जोशीली ओजस्वी कविता ⚔️

जब-जब घिरी घटा संकट की, जब-जब अंधियारा छाया है,
बन वीर पुरुषार्थी, मोदी जी ने ध्वज ऊँचा लहराया है।
इतिहास गर्जना करता है, युग-युग तक गूँजेगा यह नाम, 
नरेंद्र मोदी हर संकट में बन जाते , भारत के हनुमान।
-----=----
न भूले घाटी की ज्वाला, न सीमाओं की वह पुकार,
जहाँ लहू से लिखी वीरता, जहाँ शौर्य अपरंपार ।
सैनिक-सा संकल्प लिए वह, वज्र-हृदय, दृढ़ भुजा उठाए,
भारत के स्वाभिमान हेतु, अग्नि-पथ पर बढ़ता जाए!

लोहे-सा जिसका इरादा, पर्वत-सा अडिग जिसका मान,
आंधी-तूफाँ भी झुक जाएँ, ऐसा उसका दृढ़ स्वाभियान।
जनसेवा का जप करते-करते, बन गया वह राष्ट्र का मान,
हर कण में है कर्म की गाथा, हर श्वास में भारत माता।

गूँजा जब स्वच्छता का नाद, उठा जन-जन का अभिमान,
गाँव-गाँव में दीप जले, जागा नवभारत का अरमान।
कर्मवीर की गर्जना सुन, हर दिल में ज्वाला प्रज्वलित,
अंधकार को चीर निकलता, उजियारा बन प्रखर, प्रबलित!

कूटनीति के रण में जब भी, डगमग होता था संसार,
सिंह-नाद कर आगे बढ़ा वह, लेकर साहस की तलवार।
गूँज उठा फिर एक ही स्वर— “भारत पहले, भारत महान!”
हर मंच पर लहराया उसने, राष्ट्रधर्म का गौरव-गान !

अर्थचक्र के रणक्षेत्र में भी, बना अडिग वह ढाल सदा,
संकट के हर घोर प्रहार को, मोड़ा उसने बनकर वज्र-निधा।
नवचेतना का दीप जलाकर, आगे बढ़ता गया देश,
परिश्रम की ज्वाला से उसने, लिख डाला स्वर्णिम परिवेश!

जब-जब राष्ट्र पुकारगा, जब-जब संकट छाएगा,
उसमें सोया अग्नि-पुरुष फिर, ज्वालामुखी बन जाएगा!
कर्मभूमि की मर्यादा लेकर, जन-जन में चेतन भर दे,
भारत माँ के चरणों में वह, जीवन अपना सर्वश्व समर्पण कर दे!

जय-घोष करे आज धरा— “परिश्रम ही वीरों का धर्म!”,
गूँजे नभ, गूँजे यह धरती— “राष्ट्र प्रथम, यही है कर्म!”
ऐसे ओजस्वी नेतृत्व को, शत-शत नमन करे यह धाम,
युग-युग तक गूँजेगा जग में— भारत का अमर यह नाम!  ⚔️🔥

---

⚔️ वीर रस – मोदी पर ओजस्वी कविता ⚔️

जब जब आई कठिनाई ,संकट की छाई घोर घटाएं,
तब तब वह पुरुषार्थी, राहत के प्रबंध करता है ।
इतिहास सदियों याद रखेगा,मोदी नाम है जो हर संकट को हरता है ।


न भूले घाटी की लपटें,
न सीमाओं की तपती रातें,
सैनिक-सा साहस लेकर आया,
भारत के स्वाभिमान की बातें।

लोहे-सा उसका निश्चय था,
वज्र-सा उसका संयम था,
जनसेवा का जप करते-करते—
वह स्वयं एक प्रण-धर्म बन गया।

स्वच्छता का शंखनाद हुआ,
गाँवों में उजियारा फैला,
कर्म-वीर की दृढ़ भुजा ने
नवयुग का दीपक जलाया।

कूटनीति के रण में जब-जब
देश को चाहिये था धीर,
वह आगे बढ़ सिंह-स्वर में
बोल उठा— “भारत पहले, मेरे वीर!”

अर्थव्यवस्था की सीमा पर भी
साहस उसका ढाल बना,
नवचेतना के पथ पर चलकर
देश को बढ़ने की चाल बना।

जब-जब राष्ट्रधर्म पुकारे,
उसमें ज्वाला जाग उठे,
कर्मभूमि की मर्यादा लेकर
अगणित जन-मन जग उठे।

जय-घोष करे आज भारत—
“परिश्रम ही वीरों का धर्म”,
ऐसे कर्मवीर नेतृत्व को
नमन करे यह राष्ट्र-धरम।
---


टिप्पणियाँ

इन्हे भी पढे़....

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहे।

कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश

सेंगर राजपूतों का इतिहास एवं विकास

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, मास्को जेल में..?

Daughter of Netaji Subhas Chandra Bose

राजस्थान के व्याबर जिले में देवमाली गांव,कैंसर का 'झाड़ा'

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, किसी को भी अपमानजनक व्यवहार का अधिकार नहीं देती

दशा माता पूजन Dasha Mata Puja

वीरांगना रानी अवंती बाई