ईश्वर तो हमारे भीतर भी है और बाहर भी है - अरविन्द सिसोदिया
ईश्वर तो हमारे भीतर भी है और बाहर भी है - अरविन्द सिसोदिया
भाइयों और बहनों,मनुष्य अपने आप को बहुत बड़ा समझता है… अपने ज्ञान पर, अपनी शक्ति पर, अपनी उपलब्धियों पर गर्व करता है। मात्र 5–6 फीट का यह शरीर, सीमित बुद्धि और सीमित समझ के साथ, परम सत्ता को भी चुनौती देने लगता है। तर्क करता है, प्रश्न करता है, और कभी-कभी तो यह मान बैठता है कि सब कुछ उसी के नियंत्रण में है।
लेकिन ज़रा ठहर कर सोचिए… क्या सच में ऐसा है?
एक माँ गर्भवती होती है… वह उस जीवन को अपने भीतर धारण करती है, उसे महसूस करती है, उससे जुड़ती है… लेकिन क्या वह जानती है कि उसके गर्भ में उस शिशु की रचना कौन कर रहा है? कौन है जो उस नन्हे से जीवन को आकार दे रहा है? कौन उसकी आँखें बना रहा है, उसका हृदय गढ़ रहा है, उसकी धड़कन को गति दे रहा है?
माँ माध्यम है… पर सृजनकर्ता कौन है?
और एक मनुष्य… अपने अहंकार में डूबा हुआ, अपने शरीर की शक्ति पर इतराता हुआ, अन्याय और अत्याचार करता रहता है। लेकिन क्या उसे यह भी पता है कि उसके शरीर के भीतर क्या चल रहा है?
उसकी धमनियों में रक्त कैसे बह रहा है?
उसके फेफड़ों में श्वास कैसे आ-जा रही है?
उसका हृदय बिना रुके, बिना थके, हर पल कैसे धड़क रहा है?
जिस जीवन को वह “अपना” कहता है… उसके संचालन का रहस्य भी वह नहीं जानता।
तो फिर यह नियंत्रण किसका है?
भाइयों और बहनों, जब हम इस सृष्टि को ध्यान से देखते हैं—सूक्ष्म से अति सूक्ष्म और विराट से अति विराट तक—तो हमें एक अद्भुत व्यवस्था दिखाई देती है। एक ऐसी व्यवस्था, जो पूर्ण है, अचूक है, और जिसके नियमों से कुछ भी बाहर नहीं है।
सूर्य समय पर उगता है, समय पर ढलता है…
ऋतुएँ बदलती हैं…
जीवन जन्म लेता है, बढ़ता है, और एक दिन समाप्त भी हो जाता है…
सब कुछ एक अदृश्य शक्ति के नियंत्रण में चल रहा है।
वही परम सत्ता है… वही ईश्वर है।
उसका प्रभाव हर क्षण है… उसकी मौजूदगी हर जगह है…
वह हमारे भीतर भी है और बाहर भी है…
वह हमारी हर श्वास में है…
अब प्रश्न यह नहीं है कि ईश्वर है या नहीं…
प्रश्न यह है कि क्या हम उसे महसूस कर पा रहे हैं?
जब यह अनुभूति भीतर उतरती है, तब मनुष्य का अहंकार स्वतः ही समाप्त होने लगता है। वह समझ जाता है कि वह इस सृष्टि का स्वामी नहीं है… वह तो केवल एक छोटा सा अंश है, एक पात्र है।
और उसी क्षण, चुनौती देने वाला मन नतमस्तक हो जाता है…
विवाद करने वाली बुद्धि मौन हो जाती है…
और भीतर से केवल एक ही भाव उठता है—समर्पण का, श्रद्धा का, कृतज्ञता का।
भाइयों और बहनों,
उसकी लीला को समझ पाना आसान नहीं…
उसे जानना भी संभव नहीं…
लेकिन उसे महसूस करना… उसे स्वीकार करना… यही सच्ची साधना है।
हम उसके हैं… और वही हमारा है…
इसी भाव के साथ…
जय हो प्रभुजी!
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