सृष्टि ज्ञान में विज्ञान अधूरा है सनातन ही पूरा है Science is incomplete in the knowledge of creation, only Sanatan is complete.

Science is incomplete in the knowledge of creation, 
only Sanatan is complete.


पूर्णमदः पूर्णमिदं" बृहदारण्यक उपनिषद और ईशावास्य उपनिषद का एक प्रसिद्ध शांति पाठ है, जो परमात्मा (ब्रह्म) की अनंतता और पूर्णता को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि वह (परमात्मा) पूर्ण है, और यह (संसार) भी पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण को निकालने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है, जो अद्वैत (एकता) का प्रतीक है। 

मंत्र:
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

अर्थ और व्याख्या:
1- पूर्णमदः (वह पूर्ण है): 'अदः' का अर्थ है 'वह' (परमात्मा या ईश्वर)। वह निराकार ब्रह्म आदि और अंत से रहित, पूर्ण और अनंत है।

2- पूर्णमिदं (यह पूर्ण है): 'इदं' का अर्थ है 'यह' (प्रकट जगत या सृष्टि)। चूँकि यह संसार पूर्ण ईश्वर से ही उत्पन्न हुआ है, इसलिए यह भी अपने आप में पूर्ण है।

3- पूर्णात्पूर्णमुदच्यते (पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति): इस पूर्ण ब्रह्म से ही इस पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति हुई है।

4- पूर्णस्य पूर्णमादाय (पूर्ण से पूर्ण लेने पर): उस पूर्ण ब्रह्म में से इस पूर्ण जगत को ले लेने पर या अलग करने पर।

पूर्णमेवावशिष्यते (पूर्ण ही शेष रहता है): जो बाकी बचता है, वह भी पूर्ण ही रहता है। 

5- दिव्य पूर्णता कभी कम नहीं होती। 

मुख्य संदेश:
यह मंत्र बताता है कि परमात्मा अद्वैत है। यद्यपि हम इस संसार को देखते हैं, लेकिन इसका मूल आधार भी पूर्ण ही है। आध्यात्मिक दृष्टि से, पूर्णता कभी कम या ज्यादा नहीं होती। 


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