भारत रत्न बाबा साहब की बात कांग्रेस मानती तो भारत अखण्ड और तिब्बत स्वतंत्र रहता - अरविन्द सिसोदिया



भाजपा और मोदी सरकार नें बाबा साहब का मान - सम्मान आगे बढ़ाया - अरविन्द सिसोदिया 
भारत रत्न बाबा साहब की बात कांग्रेस मानती तो भारत अखण्ड  और तिब्बत भी स्वतंत्र रहता - अरविन्द सिसोदिया 

कोटा 13 अप्रैल। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविन्द सिसोदिया नें भारत रत्न बाबा साहब भीमराव अंबेड़कर की जन्मजयंती के अवसर पर कहा है कि " भारत रत्न बाबा साहब ड़ा भीमराव अंबेड़कर भारतीय राजनीती में समतामूलक समाज के महान निर्माता हैँ वे ईश्वरीय प्रेरणा से ही भारत भूमि पर जन जन का उद्धार करने अवतरित हुये थे। उनका योगदान, परिश्रम और उपकार,भारत को  सदियों तक मार्गदर्शित करता रहेगा । "
सिसोदिया नें कहा कि " बाबा साहब ने 1940 में ही कह दिया था कि विभाजन किसी भी समस्या का हल नही है, इससे समस्या हल नहीं होगी। करना ही है तो संपूर्ण अदला बदली करें। किन्तु कांग्रेस ने उनकी बात नहीं मानी, देश बंटवा लिया और सांप्रदायिकता की समस्या और अधिक बड़ गईं है। "

सिसोदिया नें कहा कि स्वतंत्रता से पूर्व और पश्चात् के कालखंड में बाबा साहब अंबेड़कर अपनी बौद्धिक क्षमता और दूरदृष्टि से राष्ट्रहित राजनैतिक समझ और लोककल्याण में हमेशा अग्रणी रहे। कांग्रेस नें हमेशा उनके विरुद्ध भेदभाव  और अवरोध की राजनीती की, कठनाईयां उत्पन्न कीं, यहाँ तक की चुनावी राजनीती में अपमानित करने तक की कोशिशेँ कीं, जो अक्षम्य है। "
सिसोदिया नें कहा बाबा साहब देश विभाजन और पाकिस्तान निर्माण के घोर विरोधी थे, उन्होंने तब ही कह दिया था कि इससे यह समस्या खत्म नहीं होगी। वे तुष्टिकरण के सख्त खिलाफ थे  धारा 370 के प्रबल विरोधी थे। उन्होंने नेहरू सरकार की चीन  और तिब्बत को लेकर किए गये निर्णय का भी विरोध किया था। यदि बाबा साहब की मानी जाती तो तिब्बत भी स्वतंत्र रहता।कांग्रेस नें बाबा साहब को गंभीरता से लिया होता तो आज देश बहुत सारी समस्याओं से मुक्त होता।
सिसोदिया नें कहा कि " बाबा साहब को  कांग्रेस नें कभी स्पोर्ट नहीं किया बल्कि वे अपनी योग्यता के आधार पर गोलमेज सम्मेलन में आमंत्रण किए गये, आरक्षण के द्वारा समानता का सफल संघर्ष उनका था।  कांग्रेस नें उन्हें संविधान सभा में नहीं भेजा, बल्कि बंगाल के दलित नेता मंडल के सहयोग से वे उपचुनाव के माध्यम से संविधान सभा के लिए निर्वाचित हुये थे। वे योग्यता के आधार ड्राफ्ट कमेटी के अध्यक्ष बनें। भारत की प्रथम सरकार राष्ट्रीय सरकार थी, जिसका गठन अपरोक्ष ब्रिटिश सरकार की देख रेख में हुआ था। जिसमे बाबा साहब योग्यता के आधार पर केंद्रीय मंत्री थे, कांग्रेस का कहीं कोई योगदान नहीं था। "
सिसोदिया नें कहा कि " डॉ. भीमराव अंबेडकर 1952 के लोकसभा चुनाव और 1954 के लोकसभा उपचुनावों लड़े थे, उनके खिलाफ कांग्रेस ने प्रत्याशी उतारा और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा खिलाफ प्रचार किया। जिससे वे लोकसभा सदन में नहीं पहुंच सके। "

सिसोदिया नें कहा कि " पहली वोट चोरी के शिकार बाबा साहब ही हुये थे, कांग्रेस ने कई कई हजार मतपत्र निरस्त करवा कर बाबा साहब को हरवाया था। हलांकि विपक्षी दलों के सहयोग से बाबा साहब तत्कालीन बांम्बे स्टेट से दो बार राज्यसभा पहुंचे और अपने विचारों को आगे बढ़ाते रहे। कांग्रेस तो इतनी निकृष्ट निकली कि उनके महान योगदान के लिए भारत रत्न तक नहीं दिया। "

सिसोदिया नें कहा कि " बाबा साहब को कांग्रेस नें भले ही भुलाने के तमाम षड्यंत्र किए मगर वे निष्पक्ष, न्यायप्रिय और राष्ट्रवादी विचारों के साथ भारतीय राजनीती के संवेधानिक इतिहास में सूर्य की भांति आज भी प्रकाशमान कर रहे हैँ। "

सिसोदिया नें कहा कि बाबा साहब के मान सम्मान और ज्ञान को नई ऊँचाइंया देनें में भाजपा का बड़ा योगदान है, 1990 में बाबा साहब को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित कराने में अटलबिहारी वाजपेयी का योगदान भी था, तब भाजपा के समर्थन से वी पी सिंह सरकार सत्ता में थी।"
सिसोदिया नें कहा कि" बाबा साहब ड़ा भीमराव अंबेडकर की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने कई पहलें की हैं, जिसके प्रमुख कदमों में “पंचतीर्थ” का विकास के तहत अंबेडकरजी  से जुड़े पाँच महत्वपूर्ण स्थानों—जन्मभूमि (मऊ), दीक्षा भूमि (नागपुर), महापरिनिर्वाण स्थल (दिल्ली), चैत्य भूमि (मुंबई) और लंदन स्थित उनका निवास—को स्मारक स्थलों के रूप में विकसित किया गया। इसका उद्देश्य उनके जीवन और विचारों को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुँचाना है। इसी प्रकार नई दिल्ली में डॉ. अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय केंद्र की स्थापना भी एक अहम पहल है। इसके अलावा, 26 नवंबर को हर साल संविधान दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की गई, ताकि संविधान और अंबेडकर के योगदान के प्रति जागरूकता बढ़े।"

सिसोदिया नें कहा कि " इसके अतिरिक्त, अंबेडकरजी  से जुड़े दस्तावेजों, लेखन और स्मारकों के संरक्षण और प्रसार के प्रयास भी किए गए हैं। सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से उनके विचार—विशेषकर समानता, शिक्षा और अधिकारों—को समाज में आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया है।"

भवदीय 
अरविन्द सिसोदिया 
9414180151
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डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर जयंती पर विशेष..

मोहम्मद गौरी ने मंदिरों के स्तंभ और नींव तोड़कर अजमेर में मस्जिदें बना दीं। कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1000 से अधिक मंदिर तोड़े और उसके बाद उनकी नींव पर ही मस्जिदें खड़ी कर दी। उसने दिल्ली में मस्जिद बनाई और इसमें वह पत्थरऔर सोना लगाया जो मंदिर तुड़वाकर प्राप्त किया था। दिल्ली की मस्जिद के निर्माण में 27 मंदिरों की सामग्री होने का प्रमाण हैं।

-डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर, राइटिंग्स एंड स्पीचेज, वॉल्यूम 8, पृष्ठ 59-60

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14 अगस्त, 1931 को मुंबई के मणि भवन में दोनों के बीच पहली बैठक तय हुई. यह मुलाक़ात काफ़ी दिलचस्प थी. आंबेडकर ने आरोप लगाते हुए कहा कि " कांग्रेस की दलितों के प्रति सहानुभूति औपचारिकता भर है। "
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डॉ. भीमराव अंबेडकर ने तिब्बत के मुद्दे पर जवाहरलाल नेहरू की नीति की तीखी और दूरदर्शी आलोचना की थी। उनका मानना था कि नेहरू की चीन-नीति और तिब्बत को लेकर अपनाई गई उदासीनता भारत की सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक खतरा है। 
अंबेडकर द्वारा नेहरू की तिब्बत नीति की प्रमुख आलोचनाएं इस प्रकार थीं:
  • तिब्बत के अधिग्रहण पर चिंता: अंबेडकर ने 1951 में ही चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा करने (गैरिसन) की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि तिब्बत को चीन को सौंपना एक बड़ी गलती है और यह भारत की सुरक्षा के लिए "दीर्घकालिक खतरा" (long-term threat) पैदा करेगा।
  • नेहरू के "हिंदी-चीनी भाई-भाई" दृष्टिकोण का विरोध: उन्होंने नेहरू के 'पंचशील' सिद्धांतों और चीन के प्रति बहुत अधिक मैत्रीपूर्ण रुख पर सवाल उठाए। उनका तर्क था कि साम्यवादी चीन पर भरोसा करना और तिब्बत के मुद्दे पर चुप रहना भारत के लिए आत्मघाती है।
  • चीन के इरादों पर शक: अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि साम्यवाद विस्तारवादी (Expansionism) होता है। यदि माओत्से-तुंग को पंचशील में विश्वास होता, तो वे अपने ही देश के बौद्धों के साथ दुर्व्यवहार नहीं करते। उन्होंने कहा था कि "राजनीति में पंचशील के लिए कोई जगह नहीं है"।
  • तिब्बत की संप्रभुता का समर्थन: अंबेडकर का मानना था कि एक स्वायत्त और संप्रभु तिब्बत भारत की विदेश नीति और सुरक्षा के लिए अनिवार्य था। उन्होंने भारत सरकार से तिब्बत के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाने की अपील की थी।
  • साम्यवाद की भयावहता: उन्होंने चेतावनी दी थी कि चीन के तिब्बत पर कब्जे से हिमालयी सीमा पर अस्थिरता बढ़ेगी, जो बाद में कश्मीर की तरह भारत के लिए एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। 
संक्षेप में, अंबेडकर की दृष्टि यह थी कि चीन के साथ "मैत्री की कीमत" तिब्बत की बलि देकर नहीं चुकाई जानी चाहिए। इतिहास ने बाद में उनकी इन चेतावनियों को काफी हद तक सही साबित किया, विशेषकर 1962 के भारत-चीन युद्ध के संदर्भ में।

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डॉ. भीमराव अंबेडकर और कांग्रेस पार्टी के बीच वैचारिक और राजनीतिक मतभेद इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। आपके द्वारा उठाए गए बिंदुओं के संदर्भ में उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों और विभिन्न राजनैतिक दृष्टिकोणों का विवरण नीचे दिया गया है:अंबेडकर के प्रति कांग्रेस के रवैये से संबंधित प्रमुख बिंदु:

राजनीतिक अवरोध और हार: ऐतिहासिक रिकॉर्ड और हालिया बयानों के अनुसार, कांग्रेस ने 1952 के पहले आम चुनाव और 1954 के उपचुनाव (भंडारा सीट) में डॉ. अंबेडकर को हराने के लिए सक्रिय रूप से काम किया था। नेहरू जी ने खुद उनके खिलाफ प्रचार किया था।

संविधान सभा में प्रवेश में बाधा: यह कहा जाता है कि कांग्रेस के प्रभाव के कारण, डॉ. अंबेडकर को शुरुआत में संविधान सभा के लिए मुंबई से नहीं चुना गया था। उन्हें अंततः मुस्लिम लीग की मदद से बंगाल से चुना गया था।

कैबिनेट से इस्तीफा: नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद (हिंदू कोड बिल और दलितों के मुद्दों पर मतभेद के कारण), कांग्रेस ने उनके योगदान को कम करके आंका।

भारत रत्न में देरी: डॉ. अंबेडकर को भारत रत्न उनके निधन के 34 साल बाद, 1990 में, वीपी सिंह (भाजपा समर्थित सरकार) के कार्यकाल में मिला, न कि कांग्रेस के शासनकाल के दौरान।

अंतिम संस्कार के बाद उपेक्षा: यह भी आरोप लगाया जाता है कि कांग्रेस ने उनके अंतिम संस्कार के बाद भी उनके स्मारक और विरासतों को सहेजने में रुचि नहीं दिखाई।

दूसरी ओर (ऐतिहासिक संदर्भ):

गांधीजी की भूमिका: यह भी सच है कि कांग्रेस और महात्मा गांधी ने वैचारिक मतभेदों के बावजूद डॉ. अंबेडकर को देश की पहली कैबिनेट में कानून मंत्री के रूप में शामिल करने में भूमिका निभाई थी।

संविधान निर्माण: संविधान सभा में कांग्रेस नेताओं ने अंबेडकर की कानून और संविधान में विशेषज्ञता का सम्मान किया और उन्हें मसौदा समिति (Drafting Committee) का अध्यक्ष नियुक्त किया।

निष्कर्ष:ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि कांग्रेस के साथ डॉ. अंबेडकर के संबंध तनावपूर्ण थे, विशेष रूप से 1950 के दशक में, और कांग्रेस ने उनके राजनीतिक करियर में बाधाएं डाली थीं। यह एक व्यापक राजनीतिक बहस का विषय है कि क्या यह "राजनीतिक हत्या" का मामला था, जैसा कि कुछ लोग मानते हैं, या केवल कड़े राजनीतिक मतभेद थे।


डॉ. भीमराव अंबेडकर की चुनावी हार और अवैध मतों (invalid votes) को लेकर आपका दावा ऐतिहासिक रिकॉर्ड और हालिया चर्चाओं के साथ मेल खाता है। 1952 के पहले आम चुनाव में उनकी हार के पीछे अवैध घोषित किए गए मतों की संख्या एक विवादित और महत्वपूर्ण मुद्दा रही है। 
इस विषय से जुड़े मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं:

* अवैध मतों की भारी संख्या: 1952 के चुनाव में बॉम्बे नॉर्थ सेंट्रल सीट पर डॉ. अंबेडकर लगभग 14,500 से 15,000 मतों के अंतर से हारे थे। उपलब्ध आंकड़ों और ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, उस चुनाव में लगभग 74,333 मतों को अवैध (invalid) घोषित कर दिया गया था।

* चुनाव याचिका (Election Petition): अपनी हार के बाद, डॉ. अंबेडकर और अशोक मेहता ने मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष एक संयुक्त याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने चुनाव परिणाम रद्द करने की मांग की थी और तर्क दिया था कि इतनी बड़ी संख्या में मतों को निरस्त किया जाना संदिग्ध था।

* राजनीतिक विरोध: इस हार के लिए अक्सर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आक्रामक चुनाव प्रचार को जिम्मेदार माना जाता है। नेहरू ने डॉ. अंबेडकर के खिलाफ उनके पूर्व सहायक नारायण सदोबा काजरोलकर (कांग्रेस उम्मीदवार) के पक्ष में जमकर प्रचार किया था।

* 1954 का उपचुनाव: इसके बाद 1954 में भंडारा उपचुनाव के दौरान भी डॉ. अंबेडकर को कांग्रेस उम्मीदवार भाऊराव बोरकर से करीब 8,500 मतों से हार का सामना करना पड़ा था। 

इन घटनाओं को आज भी कई राजनीतिक विश्लेषक और नेता लोकतंत्र के शुरुआती दौर में डॉ. अंबेडकर को चुनावी राजनीति से दूर रखने के एक प्रयास के रूप में देखते हैं। 

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. भीमराव अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू के बीच वैचारिक मतभेद और 1952 के चुनावों में उनकी हार भारतीय राजनीति के चर्चित और विवादास्पद विषयों में से एक हैं। 

आपके द्वारा उठाए गए बिंदुओं के ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ नीचे दिए गए हैं:

1. देश विभाजन और तुष्टिकरण पर दृष्टिकोण 

विभाजन पर कड़ा रुख: डॉ. अंबेडकर ने अपनी पुस्तक 'पाकिस्तान और थॉट्स ऑन पार्टीशन' (1940) में विभाजन के मुद्दे का गहरा विश्लेषण किया था। उन्होंने तर्क दिया था कि यदि विभाजन होना है, तो वह पूर्ण जनसंख्या विनिमय (complete population exchange) के साथ होना चाहिए ताकि भविष्य में सांप्रदायिक संघर्ष न हों।

तुष्टिकरण का विरोध: उन्होंने अक्सर कांग्रेस और गांधीजी की नीतियों की आलोचना की थी। उनका मानना था कि कांग्रेस मुसलमानों को खुश करने के लिए अत्यधिक रियायतें दे रही है, जबकि दलितों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है। 

धारा 370 और कश्मीर: अंबेडकर कश्मीर को विशेष दर्जा देने (धारा 370) के भी खिलाफ थे। उनका मानना था कि यह भारत की एकता के लिए घातक होगा और उन्होंने नेहरू की इस कूटनीति की आलोचना की थी।

2. 1952 चुनाव: हार और "वोट चोरी" के आरोप 

चुनावी धांधली के आरोप: 1952 के लोकसभा चुनाव (बॉम्बे नॉर्थ सेंट्रल सीट) में डॉ. अंबेडकर की हार के बाद, चुनावी शुचिता पर गंभीर सवाल उठे थे।

अवैध मतों का विवाद: उस चुनाव में 74,333 मतों को अवैध (invalid) घोषित किया गया था, जो एक बहुत बड़ी संख्या थी।

 डॉ. अंबेडकर केवल 14,561 वोटों के अंतर से हारे थे।

पहली इलेक्शन पिटीशन: डॉ. अंबेडकर और अशोक मेहता ने इस चुनाव परिणाम के खिलाफ 21 अप्रैल 1952 को पहली चुनावी याचिका (Election Petition) दायर की थी, जिसमें उन्होंने चुनाव रद्द करने की मांग की थी। 

नेहरू का आक्रामक प्रचार: नेहरू ने अंबेडकर को हराने के लिए उनके पूर्व सहायक नारायण सदोबा काजरोलकर (कांग्रेस उम्मीदवार) के पक्ष में व्यक्तिगत रूप से प्रचार किया था और इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था।

3. राजनीतिक संघर्ष इस्तीफा और मतभेद: 1951 में अंबेडकर ने नेहरू कैबिनेट से कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके मुख्य कारणों में हिंदू कोड बिल पर देरी और विदेश नीति पर मतभेद शामिल थे।

राज्यसभा का रास्ता: लोकसभा में हार के बाद, डॉ. अंबेडकर राज्यसभा के सदस्य बने। कुछ ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, उन्हें जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अन्य गैर-कांग्रेसी नेताओं का समर्थन प्राप्त था।

ऐतिहासिक तथ्य यह स्पष्ट करते हैं कि डॉ. अंबेडकर और नेहरू के बीच न केवल व्यक्तिगत बल्कि गहरे नीतिगत मतभेद थे, और 1952 की उनकी हार में भारी संख्या में मतों का खारिज होना आज भी एक विवादित विषय बना हुआ है।
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1951 में लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों की एक सभा को संबोधित करते हुए अंबेडकर ने चेतावनी दी थी, “सरकार की विदेश नीति भारत को मजबूत बनाने में विफल रही है। भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट क्यों नहीं मिलनी चाहिए? प्रधानमंत्री ने इसके लिए प्रयास क्यों नहीं किया? भारत को संसदीय लोकतंत्र और कम्युनिस्ट तानाशाही के बीच चुनाव करना होगा और अंतिम निर्णय पर पहुंचना होगा।”

चीन के मुद्दे पर, अंबेडकर तिब्बत नीति से पूरी तरह असहमत थे। उन्होंने कहा, “अगर माओ को पंचशील में जरा भी विश्वास होता, तो वे निश्चित रूप से अपने देश में बौद्धों के साथ बहुत अलग व्यवहार करते। राजनीति में पंचशील के लिए कोई जगह नहीं है।”

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बीआर. अंबेडकर आज भी भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे सम्मानित हस्तियों में से एक हैं। महाराष्ट्र के नागपुर से लेकर बिहार के नालंदा तक, उनकी नीले रंग की पोशाक वाली प्रतिमा दिखाई देती है, जिसमें वे एक हाथ में संविधान पकड़े हुए हैं और दूसरी उंगली आगे की ओर इशारा कर रही है, जो कुछ लोगों के लिए एक उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। यह मात्र एक भौतिक ढांचा नहीं है, बल्कि पूरे देश के दलितों की आकांक्षाओं का प्रतीक है। यह हाशिए पर रहने वाले लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो आज भी जीवन-मरण की चुनौतियों से जूझ रहे हैं।

संविधान का मसौदा उनकी अध्यक्षता वाली एक समिति द्वारा तैयार किया गया था। संविधान में अवसरों की समानता के प्रावधान को देखकर उनकी महानता अतुलनीय हो उठती है। अंबेडकर को अपने जीवनकाल में बुनियादी सम्मान और गरिमा से वंचित रखा गया था। इसके बावजूद, वे बिना किसी प्रतिशोध की भावना के और सभी के प्रति सहानुभूति रखते हुए सत्ता में आसीन हुए।

अंबेडकर संविधान से परे 
अंबेडकर अपने समय से कहीं आगे थे। विभिन्न अकादमिक विषयों पर उनकी असाधारण विद्वत्ता उनकी बौद्धिक प्रतिभा का प्रमाण थी। उनके प्रभाव को कम करके आंका गया और उन्हें केवल शोषित वर्गों के नेता के रूप में ही सीमित कर दिया गया। यह उनकी विरासत के साथ किया गया सबसे बड़ा अन्याय था। स्वतंत्रता के बाद के इतिहासकारों ने उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को क्यों नजरअंदाज किया? उदाहरण के लिए, अंबेडकर एक कुशल राजनयिक के रूप में वर्तमान पीढ़ी के लिए अपरिचित हैं। चीन पर उनके विचार दर्शाते हैं कि वे एक दूरदर्शी राजनयिक थे, जो स्वयं को अंतर्राष्ट्रीयवादी घोषित करने वाले जवाहरलाल नेहरू से कहीं बेहतर थे।


1951 में लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों की एक सभा को संबोधित करते हुए अंबेडकर ने चेतावनी दी थी, “सरकार की विदेश नीति भारत को मजबूत बनाने में विफल रही है। भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट क्यों नहीं मिलनी चाहिए? प्रधानमंत्री ने इसके लिए प्रयास क्यों नहीं किया? भारत को संसदीय लोकतंत्र और कम्युनिस्ट तानाशाही के बीच चुनाव करना होगा और अंतिम निर्णय पर पहुंचना होगा।”

चीन के मुद्दे पर, अंबेडकर तिब्बत नीति से पूरी तरह असहमत थे। उन्होंने कहा, “अगर माओ को पंचशील में जरा भी विश्वास होता, तो वे निश्चित रूप से अपने देश में बौद्धों के साथ बहुत अलग व्यवहार करते। राजनीति में पंचशील के लिए कोई जगह नहीं है।”

अंबेडकर और कांग्रेस 
1952 के लोकसभा चुनाव और 1954 के उपचुनावों में, नेहरू के नेतृत्व में अंबेडकर के खिलाफ प्रचार करने वाली कांग्रेस ने बॉम्बे के दादर में उन्हें हरा दिया। अन्य राजनीतिक दलों, जिनमें जनसंघ भी शामिल था, की बदौलत अंबेडकर राज्यसभा पहुंचे । नेहरू बाबासाहेब को मंत्रिमंडल से बाहर करने के लिए जिम्मेदार थे। अंबेडकर ने 1951 में कांग्रेस सरकार छोड़ दी थी, और जनसंघ, ​​समाजवादी पार्टी और अनुसूचित जाति संघ (एससीएफ) ने मध्य प्रांत में संयुक्त रूप से चुनाव लड़ा था।

अंबेडकर को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान उन्हें 1990 में जनता दल के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय मोर्चे द्वारा प्रदान किया गया था। सरकार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का समर्थन प्राप्त था।

“उनकी एक भी किताब दोबारा प्रकाशित नहीं हुई। उनकी कोई भी रचना, जिसे गुप्त रखा गया था, सार्वजनिक नहीं की गई। अंबेडकर के जीवनकाल में उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय कांग्रेस ने किया,” बाबासाहेब के पोते प्रकाश अंबेडकर ने कहा। कांग्रेस द्वारा अंबेडकर के प्रति निर्देशित शत्रुता के ऐसे अनगिनत किस्से हैं।

अंबेडकर और भाजपा 
2014 के बाद राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार द्वारा लिए गए शुरुआती निर्णयों में से एक पंचतीर्थ का विकास था - अंबेडकर से संबंधित पांच स्थानों को 'स्मृति स्थल' में परिवर्तित किया गया। जनपथ पर स्थित लुटियंस दिल्ली के केंद्र में स्थित डॉ. अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय केंद्र दलितों की कल्पना में एक विशेष स्थान रखता है। 26 नवंबर को प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला संविधान दिवस, अंबेडकर के स्मरणोत्सव का एक और उदाहरण है जो केवल प्रतीकात्मकता से परे है।

सबको सम्मान, सबको प्रतिनिधित्व
भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार नरेंद्र मोदी सरकार के महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले पदों में सामाजिक न्याय की झलक दिखाई दे रही है। केंद्रीय मंत्रिपरिषद में बारह दलित सदस्य हैं और उत्तर प्रदेश मंत्रिपरिषद में तीन दलित महिलाएं - बेबी रानी मौर्य, विजय लक्ष्मी गौतम और गुलाबो देवी - शामिल हैं। संगठनात्मक पदानुक्रम में भी, भाजपा पहली राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी थी जिसके अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण थे, और यह पहली पार्टी दलित अध्यक्ष बनी। लोकसभा के पहले दलित अध्यक्ष, जीएमसी बालायोगी, एनडीए-आई के कार्यकाल में नियुक्त किए गए थे।

अंबेडकर की विरासत पर अब कहीं भी कोई विवाद नहीं है। अंबेडकर की सेवा ही उनकी जनता की सेवा है। अब जनता को नेतृत्व नहीं दिया जाता, बल्कि वे सत्ता संरचनाओं में नेतृत्व के पदों की आकांक्षा रखते हैं। यही उस महान व्यक्ति की विरासत को सच्ची श्रद्धांजलि है।
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राजनीति में आंबेडकर और कांग्रेस
डॉ आंबेडकर की आज़ादी के संघर्ष में भूमिका को लेकर आज भी सवाल उठाए जाते हैं और आलोचना की जाती है.

साल 1942 से लेकर 1946 तक जब स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम पर था, तब आंबेडकर वायसराय की काउंसिल में श्रम मंत्री थे.

जब संविधान सभा का गठन हो रहा था तब आंबेडकर ने मुंबई से चुनाव लड़ा था और हार गए थे. इसमें कांग्रेस के दक्षिणपंथी नेताओं ने अहम भूमिका निभाई थी. ब्रिटेन से आज़ादी मिलने के बाद संविधान सभा के सदस्य ही पहली संसद के सदस्य बने थे.

इसके बाद जुलाई, 1946 में आंबेडकर बंगाल से संविधान सभा के सदस्य बने थे. तब बंगाल के एक महत्वपूर्ण दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल और मुस्लिम लीग के नेता हुसैन शहीद सोहरावर्दी की मदद से आंबेडकर ने खुलना से उप-चुनाव लड़ा और जीतकर संविधान सभा पहुंचे.

आंबेडकर को संविधान सभा में पहुंचाने के लिए मुस्लिम लीग ने अपने जीते हुए उम्मीदवार को इस्तीफ़ा दिलवाया और फिर हुए उप-चुनाव में मुस्लिम लीग के समर्थन से उनको वहां से खड़ा करवाया.

विभाजन के बाद आंबेडकर का निर्वाचन क्षेत्र खुलना पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में चला गया और आंबेडकर के सामने संविधान सभा में पहुंचने की चुनौती थी.

वरिष्ठ लेखक रावसाहब कसबे बताते हैं कि बाबा साहेब दोबारा संविधान सभा में गांधी जी की इच्छा से गए थे.

रावसाहब कसबे कहते हैं, "कांग्रेस और बाबा साहेब के बीच मतभेद जगजाहिर थे लेकिन फिर भी गांधी चाहते थे कि आंबेडकर संविधान सभा में रहें. उन्होंने राजेंद्र प्रसाद और वल्लभभाई पटेल को बुलाया और कहा कि मुझे हर हाल में आंबेडकर संविधान सभा में चाहिए. दोनों ने फिर बाबा साहेब को खत लिखे और फिर बाबा साहेब को मुंबई प्रांत से चुनकर भेजा गया."

कांग्रेस ने मुंबई में अपने एक नेता एम आर जयकर को इस्तीफ़ा दिलवाकर वहां से आंबेडकर को खड़ा करवाया और सदन में भेजा.

इसके बाद डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान निर्माण समिति के अध्यक्ष के रूप में उल्लेखनीय योगदान दिया.

हिन्दू कोड बिल और आंबेडकर का इस्तीफ़ा
भारत को आज़ादी मिली लेकिन बहुसंख्यक हिन्दू समाज में पुरुष और महिलाओं को समान अधिकार नहीं थे.

पुरुष एक से ज़्यादा शादी कर सकते थे लेकिन विधवा महिला दोबारा शादी नहीं कर सकती थी. विधवाओं को संपत्ति से भी वंचित रखा जाता था और महिलाओं को तलाक़ का अधिकार नहीं था.

आंबेडकर इन समस्याओं से भली-भांति परिचित थे, इसलिए उन्होंने 11 अप्रैल 1947 को संविधान सभा के सामने हिंदू कोड बिल पेश किया था. इसमें संपत्ति, विवाह, तलाक़ और उत्तराधिकार संबंधित क़ानून शामिल थे.

आंबेडकर ने इस क़ानून को अब तक का सबसे बड़ा सामाजिक सुधार उपाय बताया था लेकिन इस बिल का जमकर विरोध हुआ. आंबेडकर के बिल के पक्ष में तर्क और नेहरू का समर्थन काम न आया और 9 अप्रैल 1948 को सेलेक्ट कमिटी के पास भेज दिया गया.

बाद में 1951 में इस बिल को फिर से संसद में पेश किया गया लेकिन फिर से विरोध हुआ. संसद में जनसंघ और कांग्रेस का एक हिंदूवादी धड़ा इसका विरोध कर रहा था. विरोध करने वालों के मुख्य रूप से दो तर्क थे.

पहला- संसद के सदस्य जनता के चुने हुए नहीं हैं, इसलिए इतने बड़े विधेयक को पास करने का नैतिक अधिकार नहीं है. दूसरा- इन क़ानून को सभी पर लागू होना चाहिए यानी समान नागरिक आचार संहिता.

आंबेडकर कहते थे, "भारतीय विधानमंडल द्वारा अतीत में पारित या भविष्य में पारित होने वाले किसी भी क़ानून की तुलना इसके (हिंदू कोड) महत्व के संदर्भ में नहीं की जा सकती है. समुदायों के बीच और लिंग के बीच असमानता हिंदू समाज की आत्मा है. इसे अछूता छोड़कर आर्थिक समस्याओं से संबंधित क़ानून पारित करना हमारे संविधान का मज़ाक बनाना और गोबर के ढेर पर महल बनाना है."

लेकिन यह बिल आंबेडकर के क़ानून मंत्री रहते हुए पास नहीं हो सका और आंबेडकर ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
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तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहे।

10 मई, 1857 की क्रांति की वर्षगांठ के अवसर पर : जनक्रांति: 1857

पराक्रमी महाराणा प्रताप Mighty Maharana Pratap

सेंगर राजपूतों का इतिहास एवं विकास

गोरक्षा आन्दोलन 1966 जब संतों के खून से नहाई थी दिल्ली, इंन्दिरा गांधी सरकार ने की थी गोलीबारी

कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

असम में अब मुस्लिम लीग जैसी बन गई है कांग्रेस- AIUDF

सर्वप्रथम 27 दिसम्बर 1911 को गाया गया था राष्ट्रगान जन गण मन अधिनायक जय है jan-gan-man

जनता के सामने झुकना ही लोकतंत्र का सम्मान — अरविन्द सिसोदिया

बंगाल में भाजपा को जमाने में कैलाश विजयवर्गीय और दिलीप घोष का महत्वपूर्ण योगदान रहा....