बाबा साहब विभाजन, तुष्टिकरण और 370 के घोर विरोधी थे, उन्हें वोट चोरी से कांग्रेस नें हराया था - अरविन्द सिसोदिया
14 अगस्त, 1931 को मुंबई के मणि भवन में दोनों के बीच पहली बैठक तय हुई. यह मुलाक़ात काफ़ी दिलचस्प थी. आंबेडकर ने आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस की दलितों के प्रति सहानुभूति औपचारिकता भर है.
----=---
राजनीतिक अवरोध और हार: ऐतिहासिक रिकॉर्ड और हालिया बयानों के अनुसार, कांग्रेस ने 1952 के पहले आम चुनाव और 1954 के उपचुनाव (भंडारा सीट) में डॉ. अंबेडकर को हराने के लिए सक्रिय रूप से काम किया था। नेहरू जी ने खुद उनके खिलाफ प्रचार किया था।
संविधान सभा में प्रवेश में बाधा: यह कहा जाता है कि कांग्रेस के प्रभाव के कारण, डॉ. अंबेडकर को शुरुआत में संविधान सभा के लिए मुंबई से नहीं चुना गया था। उन्हें अंततः मुस्लिम लीग की मदद से बंगाल से चुना गया था।
कैबिनेट से इस्तीफा: नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद (हिंदू कोड बिल और दलितों के मुद्दों पर मतभेद के कारण), कांग्रेस ने उनके योगदान को कम करके आंका।
भारत रत्न में देरी: डॉ. अंबेडकर को भारत रत्न उनके निधन के 34 साल बाद, 1990 में, वीपी सिंह (भाजपा समर्थित सरकार) के कार्यकाल में मिला, न कि कांग्रेस के शासनकाल के दौरान।
अंतिम संस्कार के बाद उपेक्षा: यह भी आरोप लगाया जाता है कि कांग्रेस ने उनके अंतिम संस्कार के बाद भी उनके स्मारक और विरासतों को सहेजने में रुचि नहीं दिखाई।
दूसरी ओर (ऐतिहासिक संदर्भ):
गांधीजी की भूमिका: यह भी सच है कि कांग्रेस और महात्मा गांधी ने वैचारिक मतभेदों के बावजूद डॉ. अंबेडकर को देश की पहली कैबिनेट में कानून मंत्री के रूप में शामिल करने में भूमिका निभाई थी।
संविधान निर्माण: संविधान सभा में कांग्रेस नेताओं ने अंबेडकर की कानून और संविधान में विशेषज्ञता का सम्मान किया और उन्हें मसौदा समिति (Drafting Committee) का अध्यक्ष नियुक्त किया।
निष्कर्ष:ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि कांग्रेस के साथ डॉ. अंबेडकर के संबंध तनावपूर्ण थे, विशेष रूप से 1950 के दशक में, और कांग्रेस ने उनके राजनीतिक करियर में बाधाएं डाली थीं। यह एक व्यापक राजनीतिक बहस का विषय है कि क्या यह "राजनीतिक हत्या" का मामला था, जैसा कि कुछ लोग मानते हैं, या केवल कड़े राजनीतिक मतभेद थे।
डॉ. भीमराव अंबेडकर की चुनावी हार और अवैध मतों (invalid votes) को लेकर आपका दावा ऐतिहासिक रिकॉर्ड और हालिया चर्चाओं के साथ मेल खाता है। 1952 के पहले आम चुनाव में उनकी हार के पीछे अवैध घोषित किए गए मतों की संख्या एक विवादित और महत्वपूर्ण मुद्दा रही है।
इस विषय से जुड़े मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं:
* अवैध मतों की भारी संख्या: 1952 के चुनाव में बॉम्बे नॉर्थ सेंट्रल सीट पर डॉ. अंबेडकर लगभग 14,500 से 15,000 मतों के अंतर से हारे थे। उपलब्ध आंकड़ों और ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, उस चुनाव में लगभग 74,333 मतों को अवैध (invalid) घोषित कर दिया गया था।
* चुनाव याचिका (Election Petition): अपनी हार के बाद, डॉ. अंबेडकर और अशोक मेहता ने मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष एक संयुक्त याचिका दायर की थी। इसमें उन्होंने चुनाव परिणाम रद्द करने की मांग की थी और तर्क दिया था कि इतनी बड़ी संख्या में मतों को निरस्त किया जाना संदिग्ध था।
* राजनीतिक विरोध: इस हार के लिए अक्सर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आक्रामक चुनाव प्रचार को जिम्मेदार माना जाता है। नेहरू ने डॉ. अंबेडकर के खिलाफ उनके पूर्व सहायक नारायण सदोबा काजरोलकर (कांग्रेस उम्मीदवार) के पक्ष में जमकर प्रचार किया था।
* 1954 का उपचुनाव: इसके बाद 1954 में भंडारा उपचुनाव के दौरान भी डॉ. अंबेडकर को कांग्रेस उम्मीदवार भाऊराव बोरकर से करीब 8,500 मतों से हार का सामना करना पड़ा था।
इन घटनाओं को आज भी कई राजनीतिक विश्लेषक और नेता लोकतंत्र के शुरुआती दौर में डॉ. अंबेडकर को चुनावी राजनीति से दूर रखने के एक प्रयास के रूप में देखते हैं।
-----=-----
. भीमराव अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू के बीच वैचारिक मतभेद और 1952 के चुनावों में उनकी हार भारतीय राजनीति के चर्चित और विवादास्पद विषयों में से एक हैं।
आपके द्वारा उठाए गए बिंदुओं के ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ नीचे दिए गए हैं:
1. देश विभाजन और तुष्टिकरण पर दृष्टिकोण
विभाजन पर कड़ा रुख: डॉ. अंबेडकर ने अपनी पुस्तक 'पाकिस्तान और थॉट्स ऑन पार्टीशन' (1940) में विभाजन के मुद्दे का गहरा विश्लेषण किया था। उन्होंने तर्क दिया था कि यदि विभाजन होना है, तो वह पूर्ण जनसंख्या विनिमय (complete population exchange) के साथ होना चाहिए ताकि भविष्य में सांप्रदायिक संघर्ष न हों।
तुष्टिकरण का विरोध: उन्होंने अक्सर कांग्रेस और गांधीजी की नीतियों की आलोचना की थी। उनका मानना था कि कांग्रेस मुसलमानों को खुश करने के लिए अत्यधिक रियायतें दे रही है, जबकि दलितों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।
धारा 370 और कश्मीर: अंबेडकर कश्मीर को विशेष दर्जा देने (धारा 370) के भी खिलाफ थे। उनका मानना था कि यह भारत की एकता के लिए घातक होगा और उन्होंने नेहरू की इस कूटनीति की आलोचना की थी।
2. 1952 चुनाव: हार और "वोट चोरी" के आरोप
चुनावी धांधली के आरोप: 1952 के लोकसभा चुनाव (बॉम्बे नॉर्थ सेंट्रल सीट) में डॉ. अंबेडकर की हार के बाद, चुनावी शुचिता पर गंभीर सवाल उठे थे।
अवैध मतों का विवाद: उस चुनाव में 74,333 मतों को अवैध (invalid) घोषित किया गया था, जो एक बहुत बड़ी संख्या थी।
डॉ. अंबेडकर केवल 14,561 वोटों के अंतर से हारे थे।
पहली इलेक्शन पिटीशन: डॉ. अंबेडकर और अशोक मेहता ने इस चुनाव परिणाम के खिलाफ 21 अप्रैल 1952 को पहली चुनावी याचिका (Election Petition) दायर की थी, जिसमें उन्होंने चुनाव रद्द करने की मांग की थी।
नेहरू का आक्रामक प्रचार: नेहरू ने अंबेडकर को हराने के लिए उनके पूर्व सहायक नारायण सदोबा काजरोलकर (कांग्रेस उम्मीदवार) के पक्ष में व्यक्तिगत रूप से प्रचार किया था और इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था।
3. राजनीतिक संघर्ष इस्तीफा और मतभेद: 1951 में अंबेडकर ने नेहरू कैबिनेट से कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके मुख्य कारणों में हिंदू कोड बिल पर देरी और विदेश नीति पर मतभेद शामिल थे।
राज्यसभा का रास्ता: लोकसभा में हार के बाद, डॉ. अंबेडकर राज्यसभा के सदस्य बने। कुछ ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, उन्हें जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी और अन्य गैर-कांग्रेसी नेताओं का समर्थन प्राप्त था।
ऐतिहासिक तथ्य यह स्पष्ट करते हैं कि डॉ. अंबेडकर और नेहरू के बीच न केवल व्यक्तिगत बल्कि गहरे नीतिगत मतभेद थे, और 1952 की उनकी हार में भारी संख्या में मतों का खारिज होना आज भी एक विवादित विषय बना हुआ है।
------=------
1951 में लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों की एक सभा को संबोधित करते हुए अंबेडकर ने चेतावनी दी थी, “सरकार की विदेश नीति भारत को मजबूत बनाने में विफल रही है। भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट क्यों नहीं मिलनी चाहिए? प्रधानमंत्री ने इसके लिए प्रयास क्यों नहीं किया? भारत को संसदीय लोकतंत्र और कम्युनिस्ट तानाशाही के बीच चुनाव करना होगा और अंतिम निर्णय पर पहुंचना होगा।”
चीन के मुद्दे पर, अंबेडकर तिब्बत नीति से पूरी तरह असहमत थे। उन्होंने कहा, “अगर माओ को पंचशील में जरा भी विश्वास होता, तो वे निश्चित रूप से अपने देश में बौद्धों के साथ बहुत अलग व्यवहार करते। राजनीति में पंचशील के लिए कोई जगह नहीं है।”
------=-----
बीआर. अंबेडकर आज भी भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे सम्मानित हस्तियों में से एक हैं। महाराष्ट्र के नागपुर से लेकर बिहार के नालंदा तक, उनकी नीले रंग की पोशाक वाली प्रतिमा दिखाई देती है, जिसमें वे एक हाथ में संविधान पकड़े हुए हैं और दूसरी उंगली आगे की ओर इशारा कर रही है, जो कुछ लोगों के लिए एक उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। यह मात्र एक भौतिक ढांचा नहीं है, बल्कि पूरे देश के दलितों की आकांक्षाओं का प्रतीक है। यह हाशिए पर रहने वाले लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो आज भी जीवन-मरण की चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
संविधान का मसौदा उनकी अध्यक्षता वाली एक समिति द्वारा तैयार किया गया था। संविधान में अवसरों की समानता के प्रावधान को देखकर उनकी महानता अतुलनीय हो उठती है। अंबेडकर को अपने जीवनकाल में बुनियादी सम्मान और गरिमा से वंचित रखा गया था। इसके बावजूद, वे बिना किसी प्रतिशोध की भावना के और सभी के प्रति सहानुभूति रखते हुए सत्ता में आसीन हुए।
अंबेडकर संविधान से परे
अंबेडकर अपने समय से कहीं आगे थे। विभिन्न अकादमिक विषयों पर उनकी असाधारण विद्वत्ता उनकी बौद्धिक प्रतिभा का प्रमाण थी। उनके प्रभाव को कम करके आंका गया और उन्हें केवल शोषित वर्गों के नेता के रूप में ही सीमित कर दिया गया। यह उनकी विरासत के साथ किया गया सबसे बड़ा अन्याय था। स्वतंत्रता के बाद के इतिहासकारों ने उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को क्यों नजरअंदाज किया? उदाहरण के लिए, अंबेडकर एक कुशल राजनयिक के रूप में वर्तमान पीढ़ी के लिए अपरिचित हैं। चीन पर उनके विचार दर्शाते हैं कि वे एक दूरदर्शी राजनयिक थे, जो स्वयं को अंतर्राष्ट्रीयवादी घोषित करने वाले जवाहरलाल नेहरू से कहीं बेहतर थे।
1951 में लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों की एक सभा को संबोधित करते हुए अंबेडकर ने चेतावनी दी थी, “सरकार की विदेश नीति भारत को मजबूत बनाने में विफल रही है। भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट क्यों नहीं मिलनी चाहिए? प्रधानमंत्री ने इसके लिए प्रयास क्यों नहीं किया? भारत को संसदीय लोकतंत्र और कम्युनिस्ट तानाशाही के बीच चुनाव करना होगा और अंतिम निर्णय पर पहुंचना होगा।”
चीन के मुद्दे पर, अंबेडकर तिब्बत नीति से पूरी तरह असहमत थे। उन्होंने कहा, “अगर माओ को पंचशील में जरा भी विश्वास होता, तो वे निश्चित रूप से अपने देश में बौद्धों के साथ बहुत अलग व्यवहार करते। राजनीति में पंचशील के लिए कोई जगह नहीं है।”
अंबेडकर और कांग्रेस
1952 के लोकसभा चुनाव और 1954 के उपचुनावों में, नेहरू के नेतृत्व में अंबेडकर के खिलाफ प्रचार करने वाली कांग्रेस ने बॉम्बे के दादर में उन्हें हरा दिया। अन्य राजनीतिक दलों, जिनमें जनसंघ भी शामिल था, की बदौलत अंबेडकर राज्यसभा पहुंचे । नेहरू बाबासाहेब को मंत्रिमंडल से बाहर करने के लिए जिम्मेदार थे। अंबेडकर ने 1951 में कांग्रेस सरकार छोड़ दी थी, और जनसंघ, समाजवादी पार्टी और अनुसूचित जाति संघ (एससीएफ) ने मध्य प्रांत में संयुक्त रूप से चुनाव लड़ा था।
अंबेडकर को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। यह सम्मान उन्हें 1990 में जनता दल के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय मोर्चे द्वारा प्रदान किया गया था। सरकार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का समर्थन प्राप्त था।
“उनकी एक भी किताब दोबारा प्रकाशित नहीं हुई। उनकी कोई भी रचना, जिसे गुप्त रखा गया था, सार्वजनिक नहीं की गई। अंबेडकर के जीवनकाल में उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय कांग्रेस ने किया,” बाबासाहेब के पोते प्रकाश अंबेडकर ने कहा। कांग्रेस द्वारा अंबेडकर के प्रति निर्देशित शत्रुता के ऐसे अनगिनत किस्से हैं।
अंबेडकर और भाजपा
2014 के बाद राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार द्वारा लिए गए शुरुआती निर्णयों में से एक पंचतीर्थ का विकास था - अंबेडकर से संबंधित पांच स्थानों को 'स्मृति स्थल' में परिवर्तित किया गया। जनपथ पर स्थित लुटियंस दिल्ली के केंद्र में स्थित डॉ. अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय केंद्र दलितों की कल्पना में एक विशेष स्थान रखता है। 26 नवंबर को प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला संविधान दिवस, अंबेडकर के स्मरणोत्सव का एक और उदाहरण है जो केवल प्रतीकात्मकता से परे है।
सबको सम्मान, सबको प्रतिनिधित्व
भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार नरेंद्र मोदी सरकार के महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले पदों में सामाजिक न्याय की झलक दिखाई दे रही है। केंद्रीय मंत्रिपरिषद में बारह दलित सदस्य हैं और उत्तर प्रदेश मंत्रिपरिषद में तीन दलित महिलाएं - बेबी रानी मौर्य, विजय लक्ष्मी गौतम और गुलाबो देवी - शामिल हैं। संगठनात्मक पदानुक्रम में भी, भाजपा पहली राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी थी जिसके अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण थे, और यह पहली पार्टी दलित अध्यक्ष बनी। लोकसभा के पहले दलित अध्यक्ष, जीएमसी बालायोगी, एनडीए-आई के कार्यकाल में नियुक्त किए गए थे।
अंबेडकर की विरासत पर अब कहीं भी कोई विवाद नहीं है। अंबेडकर की सेवा ही उनकी जनता की सेवा है। अब जनता को नेतृत्व नहीं दिया जाता, बल्कि वे सत्ता संरचनाओं में नेतृत्व के पदों की आकांक्षा रखते हैं। यही उस महान व्यक्ति की विरासत को सच्ची श्रद्धांजलि है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें