“देश को बड़ा बनाने के लिए संवैधानिक नागरिक कर्तव्यों का पालन जरूरी"- डॉ. धर्मेंद्र सिंह Anbedkar


कृषि विश्वविद्यालय, कोटा में डॉ. आंबेडकर की 135वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम 

“देश को बड़ा बनाने के लिए संवैधानिक नागरिक कर्तव्यों का पालन जरूरी"- डॉ. धर्मेंद्र सिंह 

14 अप्रैल कोटा । कृषि विश्वविद्यालय, कोटा में डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की 135वीं जयंती बड़े ही गरिमामय एवं प्रेरणादायी वातावरण में मनाई गई। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के मानव संसाधन विकास निदेशालय द्वारा किया गया, जिसमें शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कृषि विश्वविद्यालय, कोटा की कुलगुरु डॉ. विमला डूंकवाल ने की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. बी. पी. सारस्वत, कुलगुरु कोटा विश्वविद्यालय उपस्थित रहे। वहीं विशिष्ट अतिथियों के रूप में डॉ. निमित रंजन चौधरी, कुलगुरु, राजस्थान तकनीकि विश्वविद्यालय, कोटा तथा डॉ. प्रताप सिंह कुलगुरु, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। कार्यक्रम में कार्यक्रम मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के डॉ. धर्मेन्द्र सिंह सह प्रांत प्रचारक चित्तौड़ प्रांत ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखे।

कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा डॉ. अंबेडकर के चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इसके पश्चात मानव संसाधन विकास निदेशालय के सहायक निदेशक डॉ. बी. एल. ढाका ने स्वागत उद्बोधन देते हुए अतिथियों का स्वागत किया तथा कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की।
मुख्य वक्ता डॉ. धर्मेन्द्र सिंह सह प्रांत प्रचारक चित्तौड़ प्रांत ने अपने व्याख्यान में डॉ. अंबेडकर के जीवन, उनके संघर्षों तथा भारतीय समाज पर उनके प्रभाव का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने बताया कि डॉ. अंबेडकर के जीवन का मर्म समझने की आवश्यकता है। समाज में समरसता या बंधु भाव को जीवन में उतारने की आवश्यकता हैं और यह आचरण समाज के अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति के साथ भी होना चाहिए। और यह समाज परिवर्तन के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में से एकत्व भाव चला गया है इस कारण पराभूत हुआ है।

उन्होंने कहा बाबा साहब ने देश को ग्रन्थ संविधान दिया है। संविधान के माध्यम से देश को नागरिक को कर्तव्य और अधिकार प्रदान किए। और देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए और आचरण में लाना चाहिए। देश में अधिकारों की बात तो होती हैं परन्तु कर्तव्य की बात नहीं होती है। भारत को बड़ा बनाने के लिए नागरिक कर्तव्य प्रामाणिकता से पालन करना चाहिए़।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. विमला डूंकवाल ने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर का जीवन संघर्ष, शिक्षा के प्रति समर्पण एवं सामाजिक न्याय के लिए उनका अथक प्रयास हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि डॉ. अंबेडकर ने अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में जन्म लेने के बावजूद शिक्षा के माध्यम से स्वयं को सशक्त बनाया और समाज के वंचित वर्गों के उत्थान के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया।
उन्होंने आगे कहा कि भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार के रूप में डॉ. अंबेडकर ने देश को एक ऐसी संवैधानिक संरचना प्रदान की, जो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों पर आधारित है। उनके विचार आज भी समाज में समावेशिता, महिला सशक्तिकरण एवं सामाजिक न्याय की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं।

मुख्य अतिथि डॉ. बी. पी. सारस्वत ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. अंबेडकर का जीवन युवाओं के लिए प्रेरणादायक है और शिक्षा ही समाज में परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे डॉ. अंबेडकर के विचारों को आत्मसात करें और समाज के विकास में अपनी भूमिका निभाएं।

विशिष्ट अतिथि डॉ. निमित रंजन चौधरी ने कहा कि डॉ. आंबेडकर ने सामाजिक असमानताओं के खिलाफ संघर्ष करते हुए एक समतामूलक समाज की परिकल्पना की। वहीं डॉ. प्रताप सिंह ने उनके योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि उनका जीवन हमें निरंतर सीखने और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा देता है।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. चिराह गौतम ने प्रभावी ढंग से किया। अंत में डॉ. आर. के. बैरवा ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं आयोजकों का आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे, जिनमें श्रीमती मनीषा तिवारी, कुल सचिव, डॉ. एम. सी. जैन, डॉ. एम. सी. गोयल, डॉ. वीरेन्द्र सिंह, महेश चंद मीणा तथा डॉ. एस. के. जैन प्रमुख रहे। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय के समस्त संकाय सदस्य, कर्मचारी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का समापन राष्ट्र निर्माण में डॉ. अंबेडकर के योगदान को स्मरण करते हुए उनके आदर्शों को अपनाने के संकल्प के साथ हुआ। यह आयोजन न केवल एक श्रद्धांजलि था, बल्कि सामाजिक समरसता, शिक्षा और समानता के मूल्यों को पुनः स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी सिद्ध हुआ।

भवदीय 

अरविन्द सिसोदिया 
9414180151




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