कविता - हम हिंदू वीर संतानें हैँ

कविता - हम हिंदू वीर संतानें हैँ 

हम हिंदू वीर संतानें हैँ,विजयी सुदर्शन स्वयं बन जाते हैँ।
हम काल से टकराने वाले, शौर्य पुत्र कहलाते हैं,
मृत्यु की आँखों में झाँककर, प्रचण्ड अट्टहास लगाते हैं।
रग-रग में धधकती ज्वालाएँ, प्रलय का तूफ़ान उठाते हैँ,
हम हिंदू वीर संतानें हैँ , विजयी सुदर्शन स्वयं बन जाते हैँ।
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जब-जब कोई ललकारे, हम वज्र-विनाशक बन जाते हैं,
रणचंडी के चरणों में, हँस हँस कर शीश चढ़ाते हैं।
खड्ग उठे, बिजली कड़के, गगन भी कांप उठे,
शत्रु के हर दंभ को, क्षण भर में धूल चटाते हैँ।
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केसरिया रक्त उफनता, आँखों में अंगार लिए ,
धर्म हेतु जीना सीखा, क्षत्रिय धर्म निभाते हैँ।
हिमगिरि सा अटल इरादा, सागर तक फैलाते है ,
जो हम से टकराये , उसका अस्तित्व मिटाते है ।
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धरा दहाड़े, गगन पुकारे, जब रण का आह्वान उठे,
आत्मबल से इतिहास नया, हर संकट में रचाते है।
लहू हमारा ज्वाला बनकर, अन्यायों को ध्वस्त करे,
हिंदू वीरों का शौर्य , विजय पथ ही दिखलाता है।
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शंखनाद जब गूँज उठे, सिंहनाद भी, साथ चले,
धर्मध्वजा ऊँची लेकर, हम आगे, हर बार बढ़े।
अंधकार की हर सत्ता को, प्रकाश में, लाते हैं,
सत्य की रक्षा में हँसकर, अग्नि-पथ, अपनाते हैं।
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विपदा चाहे पर्वत बनकर, राहों में अड़ जाती हो,
हमारी एक हुंकार से ही, चट्टानें भी हिल जाती है,
अटल विश्वास हृदय में लेकर, रण में उतर जाते हैं,
सत्यनिष्ठा के चरणों में, जीवन अर्पित कर जाते हैं।
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ना झुके हैं, ना झुकेंगे, ये संकल्प हमारा है,
हर युग में वीरों ने ही, तेजश्वी इतिहास सँवारा है।
बलिदानों की ज्योति से, युग-युग दीप जलाते हैं,
हम काल के भी काल हैँ , विजय ध्वज फहराते हैं।
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गर्जे रण, दहके तन-मन, शौर्य धधकता रक्त में,
हर अन्यायी थर्राता है, हमारे तेजश्वी संकल्प से ।
धर्म, सत्य, स्वाभिमान हेतु, प्राणों की आहुति चढ़ाते हैँ,
हम हिंदू वीर संतानें हैँ , विजयी सुदर्शन स्वयं बन जाते हैँ।
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