कविता - अपनों का सच



कविता : अपनों का सच

✍️ अरविन्द सीसौदिया
        9414180151

जिन्हें अपना माना जाना , वही पराये निकले,
मुस्कुराते चेहरे ही, ज़हर पिलाने वाले निकले।
जिन्हें हाथ थाम कर, हमने राह दिखाई,
वही अंधेरों में हमें, धकेलने वाले निकले ।

जिनके आंसुओं को, हमने मुस्कान बना दिया,
जिनकी ग़रीबी को, 
हमने अपने जीवन समर्पण से सम्पन्न बना दिया,
वही हमें लूट कर निर्धन बनाने वाले हुये,
जिन्हें दिल से पूजा, जिनसे उम्मीद थी तमाम ,
वही हमारी रूह को जला कर खाक में मिलाने वाले निकले ।

हर रिश्ते की डोर अब सवाल बन गई है,
हर अपनापन अब एक जंजाल बन गई है।
क्या सचमुच "विश्वास" में "विष" ही छुपा होता है ?
क्या हर दुआ का जवाब दर्द ही हुआ करता है ?
हमारी जिंदगी उन सचों का गवाह बन गईं है।

टूटे भरोसों की आवाज़ अब दिल में गूंजती है,
हर मुस्कान के पीछे गहरी खामोशी ही दबी रहती है।
फिर भी दिल कहता है, ये हार नहीं है पर्दाफाश है,
यह वह सच्चाई , जो पहले छुपी रही ।


क्या शिकवा करें किसी से, अब गिला भी नहीं,
दुश्मन से भी कोई झगड़ा-झंझट नहीं।
अपनों ने ही दुश्मनी को  ताज बना दिया ,
गैरों की क्या औक़ात थी मगर अपनों नें हर कहर ढहाया है 

हम जियेंगे उसी जोश से, उसी जज्बे से,
हर चोट को अपनी ताक़त बनाकर मज़बूत बनेंगे ।
आख़िरी साँस तक ये तूफान जारी रहेगा,
ये हौसला हर दर्द पर भारी रहेगा।

अब हमें कोई झुका नहीं सकता,
हमारे जज़्बात कोई लूटा नहीं सकता।
अपनों का धोखा ही हमारी जीत बनेगा,
उनके वारों से ही हमारा हर इरादा फौलाद बनेगा।
------------




टिप्पणियाँ

इन्हे भी पढे़....

छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश

25 वर्षों में जनसेवा से वैश्विक नेतृत्व तक, मोदीजी की स्वाभिमानी राष्ट्र निर्माण की ऐतिहासिक यात्रा — अरविन्द सिसोदिया

सेंगर राजपूतों का इतिहास एवं विकास

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहे।

कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

राजस्थान के व्याबर जिले में देवमाली गांव,कैंसर का 'झाड़ा'

India's 'Path of Peace' Amid Global Conflicts: The Historic Success of the BRICS Summit

भजनलाल शर्मा सरकार पर जनता की संतुष्टि की मोहर — अरविन्द सिसोदिया

जगाया तुमको कितनी बार jgaya tumko kitni bar

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, मास्को जेल में..?