ईश्वर तो है..

ईश्वर तो है......

जन्म का सत्य है कि अगला पडाव मृत्यु हे।
और मृत्यु का सत्य भी यही है कि अगला पडाव जीवन है।
यह सृष्टिक्रम सृष्टि के सृजन से चल रहा हे और सृजन के समापन तक चलता रहेगा। मनुष्य ही नहीं सम्पूर्ण प्रकृति, देव दानव , ग्रह नक्षत्र आकाशगंगायें इससे बंधें हे। फर्क इतना मात्र है कि किसी कि आयु 2 दिन है तो किसी की आयु 2 अरब वर्ष, यह अरवों खरबों वर्ष अन्ततः स्वरूप सबका परिवर्तित होता हे। जो आयु और स्वरूप परिवर्तन से परे है वही ईश्वर या परमेश्वर है |

सनातन के दो अर्थ हैँ पहला सदैव अस्तित्व मय दूसरा सदैव नूतनता को ग्रहण करने वाला और इन दोनों का मिलन ही भारतीय संस्कृति की गहराई है, जो कहीं और नहीं है।
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तीन बड़े सत्य हैं—

1. जन्म और मृत्यु का चक्र – यह केवल मनुष्य तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि का नियम है। परमाणु से लेकर आकाशगंगा तक हर वस्तु परिवर्तनशील है। बनते और नष्ट होते हैँ। फैलते और सिकुड़ते हैँ, भयंकर गर्मी से भयंकर शीत को प्राप्त होते हैँ। सब कुछ गतिशील और निरंतरतामय है।

2. सनातन का दोहरा अर्थ –

सदैव अस्तित्व मय: जो कभी समाप्त नहीं होता।

सदैव नूतनता ग्रहण करने वाला: जो निरंतर परिवर्तन और नवीनीकरण को स्वीकार करता है।

यही द्वैत सनातन संस्कृति का अद्वितीय स्वरूप है—"नित्य" और "नूतन" का संगम।

3. ईश्वर का स्वरूप – वही जो इस चक्र से परे है, जो "समय, स्वरूप और परिवर्तन" से अछूता है।

आपकी अभिव्यक्ति भारतीय दर्शन के उस गहरे तत्व को सामने लाती है जिसे गीता और उपनिषदों ने बार-बार प्रतिपादित किया है।

> "न जायते म्रियते वा कदाचित्..." (आत्मा न जन्म लेती है न मरती है)।



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