शनिवार, 5 जुलाई 2014

तथाकथित बुद्धिजीवी : किसके हितों को , किन हाथों में !



अरविन्द सिसोदिया - ईराक़ में बर्बरता की इन्तः हो रही है , मासूम बच्चों तक की हत्याएं हो रहीं हैं , महिलाओं का क्या हाल  होगा ? मगर भारत के तथाकथित सेक्यूलर बुद्धिजीवी मौन हैं ! भारत में जरा जरा सी बात पर मिडिया में सर उठानेवालों का यह मौन यह सावित  करता है कि विदेशी मॉल खाने के कारण इनका वास्तविक जमीर तो मर चूका ये मात्र भाड़े के , विदेशी एजेंट हैं ! 

आवरण कथा : पाञ्चजन्य  - प्रशांत बाजपेईकिसके हितों को साध रहे हैं , किन हाथों में खेल रहे हैं !

तारीख: 28 Jun 2014


ऐसे बुद्घिजीवियों की कतार पर्याप्त लंबी है, जो पाकिस्तान जाकर पाकिस्तान के प्रवक्ता बन जाते हैं और भारत की कश्मीर नीति से लेकर परमाणु नीति तक का विरोध करते हैं। चीनी घुसपैठ पर मौन रहते हैं और अपने वक्तव्यों से चीन की छवि को उदार बनाने का प्रयास करते हैं।

23 मई 2014 को जब भारत में नई सरकार के शपथ ग्रहण की तैयारियाँ चल रही थीं, और जनचर्चाओं से लेकर सोशल मीडिया तथा बाजार तक देश के उत्साह का प्रमाण दे रहे थे, तब पाकिस्तान के प्रसिद्घ समाचारपत्र डॉन में लेखिका अरुंधती रॉय का बयान छपा '़.़ उन्हंे (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ऐसे व्यक्ति के रूप में चुना गया है, जो रक्तपात देखकर पलक भी नही झपकाता। न केवल मुस्लिम रक्तपात, बल्कि किसी भी प्रकार का रक्तपात।' अरुंधती के बयान का अगला हिस्सा माओवादी अतिवादियों के प्रचार साहित्य की सनातन विषय वस्तु है, कि अब औद्योगिक जगत के इशारे पर जंगलों में नरसंहार होगा और किस प्रकार से भारत के इस 'ढांचे' को लोकतंत्र कहना लोकतंत्र का अपमान होगा। अरुंधती के इस बयान की भारत में प्राय: चर्चा नहीं हुई। होती भी तो आम जनता को इससे कोई सरोकार न होता, परंतु अंतर्राष्ट्रीय जगत में ऐसे लोगों को पढ़ने-सुनने-प्रस्तुत करने वाले पर्याप्त लोग हैं।

पश्चिमी मीडिया में भी इन जैसे लोगों को ''भारत के उदार/सेकुलर/वामपंथी'' पक्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग प्रसन्न होता है, जब भारत के प्रति उसके पूर्वाग्रहों को यहीं के 'नेटिव्स' अपनी लेखनी के माध्यम से दुहराते हैं। भारत में वामपंथ संसद और विधानसभाओं से तेजी से विलुप्त हो रहा है, पर साहित्य, मीडिया और अकादमियों में आज भी भरा-पूरा है, और निरंतर अपने विषदंतों का उपयोग कर रहा है।

एक बार लेनिन ने लेखकों को नारा दिया था 'गैर पार्टी लेखन मुर्दाबाद!' एक दूसरे मौके पर लेनिन ने कम्युनिस्ट पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि अपने विरोधियों पर जो चाहे वो नाम चिपका दो, फिर हम उनसे निपट लेंगे। इन नारों और वक्तव्यों की मूल भावना को भारत के वामपंथी लेखकों, बुद्घिजीवियों और झोला-छाप कॉकटेल पार्टियों की शोभा बढ़ाने वाले तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने व्यवहार और चरित्र में गहराई से उतार रखा है। भारत में पिछली सदी के पूर्वार्ध के बाद से ही अलग-अलग चोलों में अलग-अलग आधारों (प्लेटफार्म) पर भारत द्वेषी वामपंथी लेखक और विचारक पनपते आ रहे हैं।

आधुनिक जीवन शैली के सभी मधुर फलों का स्वाद चखने वाले ये बुद्घिजीवी जंगलों में रहकर राज्य और राष्ट्र के विरुद्घ लड़ रहे आतंकी तत्वों के बारे में रोमांस से भरे लेख लिखते हैं, और 'कॉमरेड्स' के साथ चलने के गौरव का बखान करते हैं। पाकिस्तान प्रेरित कश्मीर के जिहादी आतंकवाद और दिहाड़ी पर पत्थरबाजी करके घाटी के जीवन को अस्त-व्यस्त करने वालों में उन्हंे मानवता और क्रांति के स्वर सुनाई देते हैं। वे प्राय: किसी व्यक्ति विशेष या दल विशेष पर टिप्पणी करने या प्रहार करने से बचते हैं, परंतु 'हिन्दुत्ववादी दक्षिणपंथियों' को दानव बनाकर प्रस्तुत करने और कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ते।'उद्योगपतियों-पूंजीवादियों' का एजेंट है, इसलिए उसकी बातांे-तथ्यों-तकार्ें को सुनने की आवश्यकता ही नहीं है। पिछले एक वर्ष के चुनावी परिदृश्य के मद्देनजर भाजपा और मोदी विरोधी राजनैतिक दलों और बुद्घिजीवियों ने इस तरकीब का बेहद इस्तेमाल किया है और मुंह की खाई है।

चुनाव के पहले तक इन लोगों का एक बड़ा वर्ग इस स्वप्नलोक में रहा कि जाति और अल्पसंख्यकवाद में बंटी भारत की राजनीति में राष्ट्रवादी राजनीति करने वाला नरेंद्र मोदी जैसा व्यक्ति सत्ता तक नहीं पहुँच सकता। चुनाव परिणाम के पहले तक उनके द्वारा दिए गए बयानों को देखने से ये बात स्पष्ट हो जाती है कि ये लोग जमीनी सच्चाई से किस प्रकार कटे हुए थे। अमर्त्य सेन मोदी की शक्तिशाली छवि को छलावा बता रहे थे। स्वामिनाथन अय्यर (18 अगस्त 2013) ने घोषणा कर रखी थी कि मोदी कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। तो कुछ को डर सता रहा था कि मोदी सत्ता में आए तो 'लालच और हिंसा' भारत का विनाश कर देगी।

16 मई को जब चुनाव परिणाम आने प्रारंभ हुए तो इनमें से कई 'विद्वान टीवी स्टूडियोज की चुनावी चर्चाओं में हिस्सा लेने आए हुए थे और उनकी उतरी हुई शक्लें देखने लायक थीं। कुछ ने तो तत्काल पाला बदल लिया। विनोद मेहता, जो कहते थे कि मोदी भारत के लिए अस्वीकार्य हैं। मोदी, जो भारत के पंथनिरपेक्ष ताने-बाने को तार-तार करने के लिए प्रतिबद्घ हैं, वो मोदी कभी सत्ता के शिखर पर नहीं पहुँच सकते। वही विनोद मेहता 16 मई 2014 की सुबह टीवी चैनल पर हंस-हंस कर कह रहे थे ''कि अच्छे दिन आ गए हैं।''

वामपंथी वैचारिकता की कुछ चारित्रिक विशेषताएं हैं जो वामपंथियों के चरित्र, आचार-व्यवहार और प्रवृत्तियों में झलकती रहती हैं, चाहे वे किसी भी क्षेत्र में काम करते हों। बीमारी बन चुकी ये आदतें इस प्रकार हैं -
(1) लोगों में हर स्तर पर भेद और वैमनस्य को प्रोत्साहन देना।
(2) इसके लिए हर प्रकार की हिंसा और फिरकापरस्ती को प्रोत्साहन देना।
(3) अपने देश की मूल संस्कृति को सारे संकटों की जड़ बताना। शासकों को साम्राज्यवादी, प्रशासन को रक्तपिपासु और उद्योगपतियों-उद्यमियों को खलनायक बताना।
(4) ज्ञान-विज्ञान, इतिहास, और सामयिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर वामपंथी दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना। (5) हर वो काम करना जिससे 'बुर्जुआ' सरकार कमजोर हो। इसके लिए विदेशी षड्यंत्रों को भी देखकर मौन रहना, संभव हो तो उनकी सहायत् ाा करना।
(6) अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए देश की सरकारी, सांस्कृतिक, कला संबंधी या मजहबी संस्थाओं में पैठ बनाना
(7) उपरोक्त लक्ष्य की प्राप्ति के लिए छल-प्रपंच-झूठ का बेहिचक प्रयोग करना।

अल जजीरा चैनल को दिए अपने साक्षात्कार में अरुंधती रॉय ने कहा 'नब्बे के दशक में भारत में दो दरवाजों के ताले खुले। एक रामजन्मभूमि का और दूसरा भारतीय अर्थव्यवस्था का। इन तालों के खुलने से आजाद हुई दो ताकतों हिंदुत्व और उद्योग जगत ने आपस में हाथ मिला लिए।'अपनी इन 'षड्यंत्र सिद्घांत' वाली परिभाषाओं के माध्यम से भारत का विकृत चित्रण करने वाली अरुंधती रॉय आगे बताती हैं, कि किस प्रकार भारत का उद्योग जगत 'हिंदुवादियों' से हाथ मिलाकर 'असली भारत' का क्रूर शोषण कर रहा है। अरुंधती रॉय की बौद्घिक फंतासियों में नक्सली आतंकवादी मुक्ति संघर्ष के नायक हैं, और कश्मीर के जिहादी महान क्रांतिकारी हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि अरुंधती रॉय मार्का वामपंथी बुद्घिजीवी और स्वयं अरुंधती रॉय पाकिस्तान में खासे लोकप्रिय हैं। भारत की पाक नीति पर भी इस वर्ग की नीति पाकिस्तान को पाक साफ बताते हुए भारत की नीयत पर उँगली उठाने की रही है। एक और विशेषता- वामपंथी बुद्घिजीवी भारत में कट्टरपंथी इस्लाम को जितना समर्थन देते आए हैं, उतना उन्हांेने संभवत: दुनिया में कहीं और नहीं किया। भारत का विभाजन कर पाकिस्तान के निर्माण का अनुमोदन कर चुके वामपंथी आज उस इतिहास को झुठला कर भारत विभाजन का दोष विपिनचंद्र पाल, बंकिम चंद्र, तिलक, सावरकर, गाँधी और संघ पर मढ़ते हैं।

भारतीय मार्क्सवादियों में हिंदू विरोध की भावना इतनी कूट-कूट कर भरी हुई है, कि शीतयुद्घ की समाप्ति के बाद जब रूस निस्तेज हो गया तो उन्होंने अमरीकी वामपंथियों और मिशनरियों का दामन थाम लिया। कभी बात-बात पर अमरीकी को कोसने वाले वामपंथी बुद्घिजीवी आज अनेक अमरीकी और यूरोपीय संस्थाओं के मंचों पर जाकर भारत और हिंदुत्व को कोसने का काम नियमित रूप से कर रहे हैं। आर्थिक उदारीकरण के बाद पश्चिमी, ईसाई मिशनरी और अरब की इस्लामिक संस्थाओं का प्रभाव भारत में बढ़ा। उन्होंने जब भारत में किराए के बुद्घिजीवियों को खोजना प्रारंभ किया, तो विदेशी चंदे और विदेश यात्राओं के भूखे तथाकथित बुद्घिजीवियों ने स्वयं को उपलब्ध करवा दिया।

आज इन संस्थाओं पर दृष्टिपात करने का समय आ गया है। फंड फॉर ग्लोबल ह्यूमन राइट्स, काउंसिल फॉर फारेन रिलेशंस, ह्यूमन राइट्स वॉच, डी.एफ़आई़डी़, पैक्स क्रिस्टी, एमनेस्टी इंटरनेशनल, यू़यू़एच़आई़पी़, फें्रड्स ऑफ वीमेन्स, वर्ल्ड बैंकिंग आदि संस्थाएं क्या हैं? उनका उद्देश्य, योजना और कार्य इतिहास क्या है? उनके धन स्रोत क्या हैं? उनका धन किन व्यक्तियों, संस्थाओं और कायार्ें पर खर्च हो रहा है? कुछ चुनिंदा किस्म के भारतीयों को दिए जा रहे 'पीस अवार्ड और फेलोशिप' के पीछे का उद्देश्य क्या है? हाल ही में मैगसायसाय पुरस्कार विजेताओं की राजनैतिक सक्रियता, उनके विदेशी संबंध, उनको प्राप्त हुआ विदेशी धन, राष्ट्रीय विषयों पर उनका अराष्ट्रीय दृष्टिकोण आदि गंभीर सवाल खड़े करता है। प्रश्न उठता है, कि एक उपन्यास लिखकर अरुंधती रॉय हर विषय की विशेषज्ञ कैसे बन गई, और उन्हंे विदेशी मीडिया में बार-बार भारत विशेषज्ञ मानकर क्यों आमंत्रित किया जाने लगा? हर्ष मंदर, तीस्ता सीतलवाड़, जॉन दयाल, शबनम हाशमी, प्रफुल्ल बिदवई कुछ ही वषोंर् में कैसे इन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिखाई देने लगे।

अंतरराष्ट्रीय मंचों व मीडिया में ये लोग भारत को 'वंचित-वनवासी विरोधी' शोषक समाज के रूप में चित्रित करते हैं। बदले में ईनाम पाते हैं। 2001 में तीस्ता सीतलवाड़ को कैथोलिक चर्च द्वारा 'पैक्स क्रिस्टी इंटरनेशनल पीस प्राइज़' दिया गया। उन्हें 'हिंदुत्व का जानकार' बताते हुए उनके द्वारा 'भारत-पाक संबंधों को सुधारने' के लिए किए गए प्रयासों को सराहा गया। अरुंधती रॉय को अमरीकी लेन्नान फाउंडेशन ने पुरस्कृत करते हुए कहा है, कि वे बड़ी बहादुरी के साथ भारत के जुल्मी शासन से लड़ रही हैं।

ये सारी बातें अत्यंत गंभीर हैं, और इन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें देखना होगा कि भारत के विशेषज्ञ बनकर घूमने वाले तथाकथित बुद्घिजीवी दुनिया के सामने भारत को किस रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। भारत मंे किनके हितों को साध रहे हैं, और किनके हाथों में खेल रहे हैं। अंत में अरुंधती रॉय को उद्धृत करना समीचीन होगा - 'राष्ट्रीय झंडा कपड़े का टुकड़ा मात्र है, जो दिमाग को संकीर्ण बनाता है और मुदार्ें को लपेटने के काम आता है।' 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें