सब में राम - सब के राम
" सब में राम सब के राम"
- डॉ गीताराम शर्मा सह आचार्य-संस्कृत
राम लोकाभिराम हैं । अर्थात जो सम्पूर्ण लोक में अभिरमण शील हैं,व्याप्त हैं या सम्पूर्ण चराचर लोक जिनमें व्याप्त है ,वे हैं राम ।राम अभिव्यापक आधार हैं| ।लोक शब्द व्यापक अर्थ में समस्त जड़ चेतनमय अस्तित्व का द्योतक है। लोक का अभिप्राय केवल चर्मचक्षुओं से दृश्य मान जगत मात्र ही नहीं है अपितु दिव्य और आर्ष चक्षुओं से विभाव्यमान ,अणोरणीयान् महतोमहीयान् ज्ञात अज्ञात समस्त आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक रुपों में पाया जाने वाला ,ब्रह्म से लेकर तृण पर्यन्त वेदान्तादि दर्शन में पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक रुपों में स्वीकृत शुद्ध चैतन्य और उसका विवर्तभूत समस्त जगत लोक है।ऐसे लोक के सार्वकालिक और सार्वभौमिक अधिष्ठान राम हैं,या सरल भाषा में कहें तो यह कि "सब में राम हैं,सब के राम हैं। गोस्वामी तुलसीदास राम के इसी लोकाभिराम स्वरुप की वन्दना करते हुए कहते हैं कि-
"जड़ चेतन जग जीव सब,सकल राममय जानि।
वन्दहुं सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि।।"
राम शब्द की व्युत्पत्ति यह है कि " रमन्ते अस्मिन् सर्वे इति राम:"अर्थात् जिसमें सब रमण करें ,वह राम है।संस्कृत में" रम्" धातु आनन्द दायी क्रीड़ा अर्थ में आती है।रम् धातु के इसी अर्थ को ध्यान में रखते हुए श्रीरामचरितमानस में वशिष्ठ श्रीराम का नामकरण इसी रुप में करते हैं-
"जो आनंद सिंधु सुख राशी।
सीकर तें त्रैलोक सुपासी ।।
जो सुख धाम राम अस नामा।
अखिल लोकदायक विश्रामा।।
ऐसे लोकाभिराम श्रीराम का काव्यात्मक आद्यस्तवन महर्षि वाल्मीकि "रामो रमयताम् वर: " कहकर करते है। राम मनुष्य मात्र के हृदय में विराजित हैं। उन का चरित्र आधिभौतिक,आधिदैविक,और आध्यात्मिक लोक में समुल्लसित है। इसलिए राम सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक लोक नायक हैं। उनके शाश्वत अस्तित्व को देश,काल,वंश,वृत्त, व्यक्तित्व,जाति,पन्थ, जैसी लघु सीमाओं में बांधा जाना असंभव है।वे योगियों के हृदय में रमणशील मुक्तिदाता प्रभु राम हैं,सन्तों के परित्राणार्थ दुष्ट दमनार्थ कृत संकल्प त्रेतादि युगों में धृतावतार दशरथ अजिर विहारी ऐतिहासिक राम हैं , मोहरुपी रावण का विनाश कर हर समय हर निर्बल के बल राम हैं। " एक भरोसौ एक बल एक आस विश्वास ।एक राम घनश्याम हित चातक तुलसी दास " जैसे सगुण राम की कीर्ति गायक तुलसी के सगुण राम हैं तो दूसरी ओर " राम मोरे पिउ ,मैं राम की बहुरिया "का गायन करने वाले निर्गुणी सन्त कबीर के रहस्यमय राम हैं।"कोउ नहिं दुखी ,दरिद्र नहिं दीना।" जैसे समता ममता बन्धुता पूर्ण ध्येय मूलक रामराज्य के संस्थापक रघुपति राघव राजा राम हैं।भक्तों के एकमात्र शरण्य शरणागत वत्सल भगवान राम हैं।चिरकाल से पाषाणवत् नीरस और सुप्त अहिल्या रुपी स्त्री चेतना को अपने स्पर्श मात्र से पुनर्जाग्रत करने वाले नारी उद्धारक राम हैं। सभी मुनियों के आश्रम में भुजा उठा कर आततायी राक्षसों के विनाश की प्रतिज्ञा कर धर्मसंस्थापना के लिए संकल्प बद्ध राम हैं।शबरी,गुह,जटायु,तथा गहन गिरि ,गह्वर,कन्दराओं में अतुलित शक्तिशाली किन्तु सदियों से उपेक्षित रहे वनवासियों का हृदय जीत कर उनकी ही शक्ति स्फुरण द्वारा संगठित राष्ट्र शक्ति से राष्ट्र के दुर्धर्ष और अजेय शत्रु रावण को जीतकर सामाजिक एकात्म के संस्थापन में सुदक्ष राम हैं।सदियों से हीनता, दीनता के बोझ से दबे राष्ट् के सत्व को जगाकर राष्ट्र जीवन में नयी चेतना नयी ऊर्जा भरने वाले राष्ट्रोद्धारक राष्ट्र नायक राम है।
विश्वभर के साहित्य ,संस्कृतियां,धार्मिक मत,पन्थ,सम्प्रदाय,समाज व्यवस्था,राजनीति,अर्थनीति, और जीवन पद्धतियां रामचरित से प्रभावित हैं। विश्वभर में राम सर्वजन प्रिय और प्रेरक पुरुषोत्तम सर्वकालिक एव, सार्वभौमिक सदा प्रासंगिक विश्वप्रिय राष्ट्र नायक के रुप में प्रतिष्ठित हैं। भारत का राष्ट्रवाद तो वस्तुत:विश्ववाद है, इसलिए श्रीराम को ब्रह्माण्डीय लोक नायक कहना अतिशयोक्ति नहीं है।राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त कहते हैं कि रामचरित है ही इतना उदात्त कि उनके चरित्र का गायन कर आदि कवि महर्षि वाल्मीकि या अन्य किसी कवि के लिए महाकवि या विश्व कवि का विरुद स्वाभाविक है-
"राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है।
कोई कवि बन जाय यह सहज सम्भाव्य है।।"
राम और रामचरित के सम्मोहन का ही चमत्कार है कि प्रगतिशील बुद्धिजीवियों में अग्रणी माने जाने वाले डॉ राम मनोहर लोहिया तक ने भी राम को उत्तर से दक्षिण तक पैदल भ्रमण कर भारत को एक सूत्र में बांधने वाला राष्ट्रपुरुष बताया। अज्ञतावश राम के सार्वजनीन चरित्र को झुठलाने वाले दुराग्रहियों को भी सत्य दर्शन कराने वाले भी श्री राम ही हैं।
राम राष्ट्र नायक हैं।सम्पूर्ण राष्ट्र के जन जीवन में घुल मिल कर क्षण क्षण नवीन चेतना, जीवन रस और सुव्यवस्था देने वाला शासक ही राष्ट्र नायक हो सकता है।राम ने अपने सदाचार से जन जन का हृदय जीता।घायल जटायु को देखकर वे व्यथित होकर कह उठते हैं कि मुझे सीता हरण से भी अधिक दुख जटायु के मरण का है-
"सीता हरणजं दु:खं न में सौम्य तथागतम्।
यथा विनाशो गृद्धस्य मत्कृते च परन्तप:।।"
राम के उद्गागार पशु-पक्षियों और मनुष्यों की परस्परपूरकता ,राम की कृतज्ञता,पिता के मित्र के प्रति आदर भाव आदि अनेक उदात्त सन्देश देते हैं।शबरी से भेंट कर उसे उपदेश देना यह संकेत देता है कि राम का अभिमत है लिंग अथवा जाति ज्ञान विज्ञान की पात्रता का आधार नहीं बन सकती। रामचरित मानस में श्रीराम के चरित्र का यह पक्ष बहुत उदारता के साथ अभिव्यक्त हुआ है-
"कह रघुपति सुनि भामिनि बाता
राखहुं एक भगति कर नाता।।
जाति पांति कुल धर्म बढ़ाई।
धन बल परिजन गुन निपुनाई।।
भगति हीन नर सोहत कैसे।
बिनु जल वालिद देखिय तैसे।।
राम सदा राष्ट्र समाज परिवार में सौमनस्य तथा उर्जा भरने के लिए प्रतिबद्ध हैं। किसी भी दुर्धर्ष शत्रु का मुकाबला वे मजबूरी में नहीं अपितु मजबूती से अपना कर्तव्य समझकर करते हैं। राम सचमुच अनुदात्ताओं के विरुद्ध उदात्ताओं के संघर्ष द्वारा "सत्यमेव जयते" की आर्य घोषणा को साकार करने वाले अग्रदूत हैं।
यही कारण है कि राम का सर्वस्वीकार्य पावन चरित्र सर्वदा और सर्वत्र प्रासंगिक है और क्षण क्षण क्षीयमान जीवन मूल्यों के संकट से शंकित करने वाले भविष्य के लिए आशादीप है।आज के समाज में ईर्ष्या, द्वेष, संघर्ष, हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। जीवन के प्रति व्यापक दृष्टिकोण का प्रचार प्रसार आवश्यक है ।प्रांत भाषा संप्रदाय क्षेत्र और राजनीति को लेकर विभाजन की प्रवृत्तियां बहुत तीव्रता से बढ़ रही हैं, जिससे कभी कभी समाज के टूटने और बिखरने की गहरी आशंकाएं भी होती हैं। ऐसी स्थिति में राम का उदार और उदात्त चरित्र समाज में समरसता और सहिष्णुता का भाव जगाने में आशादीप की तरह प्रकट होता है|राम धरती पर धर्म राज्य की स्थापना के लिए सदा संघर्ष करते हैं|
राम का संघर्ष निजी सुखादि की खोज न होकर राष्ट्र की दीनता, दरिद्रता, अन्याय और अत्याचार मिटाकर समता, ममता और बन्धुतापूर्ण रामराज्य की स्थापना के रुप में फलित होकर विश्वभर का वरेण्य बन जाता है।
राम केन्द्रित साहित्य में लोक नायक राम के व्यक्तित्व के दो रुप प्रमुखता से उभरते हैं। एक है- सत्याग्रही राम तथा दूसरा शस्त्राग्रही राम ।
राम राज्य की आधारशिला वे अपने वनगमन के समय रखते हैं। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में उनका सत्याग्रही रुप दिखाती देता है। ऐसा लगता है कि स्थायी रामराज्य के लिए उस समय राज्य त्याग आवश्यक था अर्थात रामराज्य की स्थापना राम ने राज्य त्याग कर की। किसी भी योग्य शासक के लिए यह आवश्यक है कि वह बाहरी शत्रुओं को जीतने से पहले घर के मोर्चे पर विजयी हो। वाल्मीकि रामायण के प्रसंगों से पता चलता है कि अयोध्या के राजमहलों में चुपके चुपके कोई ऐसा विष बीज पल रहा था जो राम राज्य में फलित होकर रामराज्य को स्थायी नहीं होने देता ।अयोध्या कांड में राम के समस्त व्यवहार राजपरिवारों में स्वाभाविक रुप से प्रचलित वैमनस्य,अन्तर्कलह तथा उनके समाधानों की दृष्टि से पथ प्रदर्शक हैं,इसमें राम ने जो भूमिका निभायी उसने कैकेयी सहित समस्त परिवार का हृदय जीत लिया।राम यह जानते थे कि स्थायी रामराज्य की नींव राज्य त्याग कर ही रखी जा सकती है। राम जानते हैं कि मूलत:सज्जन किन्तु क्षणिक परिस्थितियों के कारण भटके या भटकाए गये स्वजनों के कलुष को सत्याग्रह से हटाया जा सकता है। रामायण के अयोध्या काण्ड से चित्रकूट सभा तक यही सत्याग्रह का मार्ग अपनाया।विश्व में बन्धुप्रेम का ऐसा अद्भुत उदाहरण नहीं मिलता जहां दो भाई राम और भरत के बीच राज्य प्राप्ति के लिए नहीं अपितु एक दूसरे के लिए राज्य त्याग करने की प्रतिस्पर्धा है।दोनों ने अवध के साम्राज्य को गेंद जैसा बना दिया है एक दूसरे से जीतना नहीं उसको जिताना चाहता है। सचमुच अयोध्या के पारिवारिक संघर्ष को राम ने वन गमन द्वारा समाप्त कर अयोध्या नाम को सार्थक किया।अयोध्या अर्थात् जहां कोई युद्ध नहीं हो।अवध अर्थात् जहां कोई वध नहीं हो। विश्व में पारिवारिक सौमनस्य के लिए ऐसे अद्भुत त्याग का उदाहरण सत्याग्रही राम के कारण संभव हुआ। राम के इसी सत्याग्रह से राम सबके हुए और अयोध्या भी सबकी हो गयी।राम यह जानते हैं कि बाह्य शत्रु शस्त्राग्रह के बिना अनुशासित हो नहीं हो सकते लेकिन इसके लिए आन्तरिक मोर्चे पर दृढ़ता,धीरता,निश्चलता,निश्छलता, निरहंकारिता,निर्लोभ,निर्मोह,कौशल और सौमनस्य स्थापित करना ही होगा। अर्थात् घरेलू आन्तरिक पारिवारिक मोर्चे पर सत्याग्रह और बाह्य शत्रु के मोर्चे पर शस्त्राग्रह ,ये दो राम प्रवर्तित मार्ग सभी के जीवन के लिए प्रेरक जीवन मार्ग हैं।
इसी नीति के व्यावहारिक पक्ष को रामायण के अरण्यकाण्ड में वे सीता को तब समझाते हैं जब सीता राम द्वारा ऋषियों के समक्ष राक्षसों के संहार की प्रतिज्ञा को हिंसा से जोड़कर उसे तपस्वी जीवन के विरुद्ध मानती हैं ।राम कहते हैं कि-" धर्म कर्म में हिंसकों की हिंसा की समाप्ति ही वास्तविक आहिंसा है।" वे कहते हैं कि-सज्जनों को क्षति अर्थात् पीड़ा से बचाने के कारण ही हमारा क्षत्रिय होना सार्थक होता है।
"क्षत्रियै धार्यते चापो नार्त शब्दो भवेदिति।"
अत: सात्विक स्वभाव वाले ऋषि समुदाय को इन क्रूर और तामसी राक्षसों से बचाने के अपने प्रण को पूरा करना ही होगा।इस सम्वाद में यह राम नीति या यों कहें कि राष्ट्र नीति उभर कर आती है कि -"सिद्धान्तत हिंसा नहीं करना ही अहिंसा नहीं, अपितु निरपराधों की हिंसा नहीं होने देना क्षत्रियों के लिए अहिंसा है।इसलिए सात्त्विक स्वभावी सज्जनों को बचाने के लिए राक्षसों की हिंसा भी अहिंसा ही है।
राम का मन्तव्य है कि हिंसा -अहिंसा,सत्य- असत्य ,धर्माधर्म आदि का निर्णय व्यापक हित देख कर किया जाना चाहिए।लगता है स्वतन्त्रता आन्दोलन में स्वतन्त्रता सेनानियों ने व्यापक राष्ट्र हित के लिए हिंसा अहिंसा,धर्म अधर्म तथा सत्यासत्य ,की ऐसी ही व्याख्या की होगी।
पूरे कथ्य का सारांश यह है कि राम भारत के लिए एक ऐतीहासिक व्यक्ति या हिन्दुओं के आराध्य मात्र नहीं हैं अपितु राष्ट्र की अस्मिता,स्वाभिमान और सत्व के प्रतीक हैं। वे राष्ट्र के सामूहिक अवचेतन में अपार श्रद्धाके साथ व्याप्त हैं।इसलिए अनेक अवसर साक्षी हैं कि उचित उद्दीपन पाकर समय समय पर हृदय में विराजित उनकी छवि राष्ट्र के जनमानस को सत्व,स्वाभिमान और राष्ट्रीय अस्मिता के समग्र चैतन्य से झकझोर देती है।भावनाओं का अतिवेग पूर्ण ज्वार पैदा कर देती है।जैसा कि माननीय श्री दन्तोपन्त ठेंगड़े जी कहते हैं
"लोकनायक राम के जीवन का प्रभाव न केवल भारत अपितु समग्र विश्व के जनजीवन पर स्पष्ट रुप से दिखाई देता है । भारतीयों के लिए पितृ पूजन के, बंधु भावना के ,यती,सती के, धर्म , तप त्याग लोक सेवा समाज संगठन लोक संग्रह जाति देश हित तथा सर्वोत्तम शासन के आदर्श श्री राम ही है ।इसलिए राम न केवल धार्मिक दृष्टि से केवल हिन्दुओं के आराध्य हैं अपितु अपने महान आदर्शों और चरित्रसे लोक नायक बन कर विश्व मानस को सद्कर्मों की ओर प्रेरित करते है । "
विश्वास है लोकाभिराम राम की प्राकट्यभूमि अयोध्या में निर्माणाधीन भव्य राम मन्दिर निश्चित ही पूरे विश्व को कर्तव्याकर्तव्य की ओर प्रेरित करता हुआ चिरकाल तक राममय राष्ट्र राष्ट्रमय राम के संकल्प को पूरा करेगा।अस्तु-
"आपदामपहर्तारं,दातारं सर्व सम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूतों भूयो नमाम्यहम्।
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