शनिवार, 12 जुलाई 2014

प्रथम गुरु हमेशा ही माता होती है




प्रथम गुरु हमेशा ही माता होती है !
कुछ परिस्थितों में पालनहार भी प्रथम गुरु होता है !!

माता-पिता हमारे सर्वप्रथम गुरु हैं

विष्णु महाराज 


शास्त्र कहते हैं कि गुरु वह है, जो हमें अंधेरे से उजाले की ओर ले जाए। जो हमें रोशनी प्रदान करे। तो सबसे पहले ऐसा कौन करता है? सबसे पहले यह रोशनी हमें माँ दिखाती है। उसके बाद पिता। वही हमारे प्रथम गुरु हैं। इसीलिए शास्त्रों में यह भी लिखा है कि माता-पिता का यथायोग्य सम्मान करना चाहिए। जरा सोचो कि अगर हमें हमारे माता-पिता द्वारा कुछ भी सिखाया न जाता तो हमारी क्या स्थिति होती। क्या हम ढंग से चल पाते, बात कर पाते, लिख पाते, व्यवसाय कर पाते! यहाँ तक कि हम अपने जीवन और इस शरीर की रक्षा कैसे करना है, यह भी नहीं जान पाते। मान-अपमान, प्यार और अहंकार जैसी मूल वृत्तियों को पहचानना भी हमें वही सिखाते हैं।

लेकिन जब हम यौवन और सार्मथ्य प्राप्त कर लेते हैं, तब अपने उन्हीं माता-पिता को हम तिरस्कार की निगाहों से देखते हैं। कई महानुभाव तो यह भी सोचते हैं कि अब हमें इनकी क्या आवश्यकता है। बूढ़े माता-पिता यदि किसी कारणवश अस्वस्थ हो जाएं तो वे हमें बोझ लगने लगते हैं। तब हमें यह बात याद भी नहीं रहती कि बचपन में हमारे बीमार होने पर कैसे वे रात-रात जाग कर माथे पर पट्टी करते थे।

आजकल बहुत सारे गुरु और सद्गुरु हो गए हैं। उन्होंने माता-पिता की गुरुता की ओर से हमारा ध्यान हटा दिया है। हम माता-पिता के ही चरणों में बैठे रहेंगे तो उनकी कीर्ति कैसे फैलेगी। इसलिए वे परमात्मा से मिलाने और जीवन का सच्चा ज्ञान दिलाने वाले सद्गुरु का महत्व बता कर असल में अपने महत्व की ओर ध्यान खींचने की कोशिश करते हैं।

यहाँ पर यह मत समझो कि हमें जीवित रखना हमारे माता-पिता का अपना स्वार्थ था, उनकी मजबूरी थी। नहीं, यह उनका प्रेम था हमारे प्रति। जैसे उनके माता पिता ने उन्हें प्रेम किया था, वैसे ही वे हम पर प्रेम उडे़लते हैं। तो यह दूसरे गुरुओं के लिए भी एक सीख है, उदाहरण है। जो सच्चा गुरु है वह भी अपने शिष्य को संतान के ही समान प्यार करता है, उसे जीवन की रोशनी दिखाने के लिए उसी तरह रात-दिन सिरहाने बैठा रह सकता है। लेकिन इधर हमने भी पाश्चात्य संस्कृति की हवा खा ली है और गुरुओं ने भी। इसलिए आजकल जगह-जगह पर अनेक प्रकार के गुरुओं-सद्गुरुओं के आश्रम खुल गए हैं और दूसरी ओर वृद्धाश्रमों की भरमार हो गई है।

एक कहानी है जो हम सब ने सुन रखी होगी- श्रवण कुमार की। वे अपने बूढ़े माता-पिता (जो अंधे थे, चलने में सक्षम नहीं थे) को उठा कर तीर्थ यात्रा पर ले गए थे, उनकी इच्छानुसार। मार्ग में एक जगह जब माता-पिता ने जल पीने की इच्छा व्यक्त की तो वह जल भरने के लिए गए, जहाँ पर दशरथ महाराज के तीर से उसकी मृत्यु हो गई। श्रवण कुमार के पिता के श्राप की वजह से दशरथ को भी पुत्र का वियोग सहना पड़ा और उसी के विरह में तड़पते हुए वे भगवत धाम को गए।

भगवान प्रसन्न होते हैं आपसे, अगर आप अपने माता-पिता की बात मानें, उनकी सेवा करें। भगवान को सबका पिता कहा गया है। लेकिन अगर आप जागतिक माता-पिता को प्रसन्न नहीं कर पाएंगे तो आध्यात्मिक पिता अर्थात भगवान को कैसे प्रसन्न कर पाएंगे? यदि आप माता-पिता को आप प्रसन्न नहीं कर पाते तो कोई गुरु-सद्गुरु आपको सन्मार्ग पर नहीं ले जा सकता। अगर वे प्रसन्न नहीं हैं तो भगवान भी प्रसन्न नहीं होंगे।

धर्मराज युधिष्ठिर ने महाभारत के युद्ध से पहले विपक्ष में खड़े अपने सभी सम्माननीय जनों को प्रणाम कर उनसे आशीर्वाद लिया था। भगवान राम ने भी वनवास पर जाने से पहले माता कैकयी, माता सुमित्रा, माता कौशल्या से आशीर्वाद लिया था। लेकिन माता-पिता का आशीर्वाद तभी फलता है, जब उसे पूर्ण श्रद्धा से लिया जाए। ढोंग से कुछ नहीं होगा, बात बिगड़ेगी ही। स्मरण रखिए पुत्र कुपुत्र हो सकता है, किन्तु माता-पिता कुमाता-कुपिता नहीं हो सकते।


कौन सिखाए संस्कारों का सबक? 


पालक और शिक्षक की साझा जिम्मेदारी
गायत्री शर्मा
स्कूल शिक्षा का वो मंदिर होता है, जिसमें बच्चा संस्कार, शिष्टाचार व नैतिकता का पाठ पढ़ता है। शिक्षा के इस दरबार में विद्यार्थियों को किताबी शिक्षा के साथ-साथ एक जिम्मेदार नागरिक बनने के गुर भी सिखाए जाते हैं। वर्तमान दौर में शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार व आवश्यकता को देखते हुए हर माता-पिता अपने बच्चों को अच्छे से अच्छे स्कूल में तालीम दिलाने का ख्वाब सँजोते हैं।

अपने इस ख्वाब को पूरा करते हुए दिनभर जीतोड़ मेहनत करके वो पाई-पाई बचाकर अपने बच्चों के स्कूल की फीस जुटाते हैं। बच्चे को अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाने के बाद अपने कर्त्तव्यों से इतिश्री करते हुए पालकगण बच्चों को संस्कारवान, जिम्मेदार व सभ्य नागरिक बनाने की सारी जिम्मेदारियाँ शिक्षकों पर थोप देते हैं।

यह सत्य है कि बच्चे की प्रथम पाठशाला उसका परिवार होता है। बच्चा जो कुछ भी सीखता है, वो अपने परिवार, परिवेश व संगति से सीखता है। बच्चों को सुधारने या बिगाड़ने में उसके माता-पिता का भी उतना ही हाथ होता है, जितना कि उसके शिक्षकों व सहपाठियों का।

  बच्चों को संस्कारवान बनाने की सबसे बड़ी व महत्वपूर्ण जिम्मेदारी माता-पिता की है। निश्चित तौर पर पर कुछ हद तक यह जिम्मेदारी शिक्षकों की भी है परंतु विडंबना यह है कि वर्तमान में बच्चों को स्कूल व परिवार दोनों ही जगह संस्कार नहीं मिल पा रहे हैं।    

ऐसा इसलिए क्योंकि बच्चा स्कूल में तो केवल 5 से 6 घंटे बिताता है परंतु अपना शेष समय अपने घर पर बिताता है। ऐसे में माता-पिता व शिक्षक दोनों की बराबरी की जिम्मेदारी होती है कि वे अपने बच्चों को संस्कार व शिष्टाचार का सबक सिखाएँ। अकेले शिक्षकों या स्कूल प्रशासन पर सारी जिम्मेदारियाँ मढ़ना कहाँ तक उचित है?

'बच्चों को संस्कार देने की जिम्मेदारी किसकी है?' इस विषय पर हमने कई ऐसे राजनीतिज्ञों से चर्चा की, जो शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। इस विषय पर उनके मत इस प्रकार हैं -

अर्चना चिटनीस (स्कूली एवं उच्च शिक्षामंत्री) :- बच्चों को संस्कारवान बनाने की सबसे बड़ी व महत्वपूर्ण जिम्मेदारी माता-पिता की है। निश्चित तौर पर कुछ हद तक यह जिम्मेदारी शिक्षकों की भी है परंतु विडंबना यह है कि वर्तमान में बच्चों को स्कूल व परिवार दोनों ही जगह संस्कार नहीं मिल पा रहे हैं।

'चाइल्ड डेवलपमेंट' यह एक ऐसा नाजुक सॉफ्टवेयर है, जो हमारी लाइफ स्टाइल से संचालित होता है। हमारे बच्चे बहुत सारी चीजें औपचारिक व अनौपचारिक तौर पर हमारी लाइफ स्टाइल से ही सीखते हैं।

कल तक संयुक्त परिवारों का प्रचलन था, जिनमें माँ-बाप के द्वारा बच्चों को दिए गए संस्कारों में कमी होने पर घर के बड़े-बुजुर्ग उस कमी को पूरा कर देते थे। उस वक्त छोटी-छोटी बातों के माध्यम से बच्चों को संस्कारों का पाठ पढ़ाया जाता था। यदि हम भारतीय त्योहारों की ही बात करें तो ये त्योहार भी बच्चों को संस्कारों का पाठ पढ़ाने के साथ-साथ उन्हें रिश्तों के प्रति जिम्मेदार बनाते हैं।

यदि हम गौर करें तो हमारे तौर-तरीके व जीवनशैली का बहुत गहरा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। रही बात संस्कारों का सबक सिखाने की जिम्मेदारी थोपने की, तो मेरे अनुसार बच्चों को संस्कार देने की साझा जिम्मेदारी माता-पिता व शिक्षक दोनों की है।

  यदि शिक्षक और पालक एक-दूसरे पर आरोप मढ़ते रहे तो हम कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएँगे और बच्चे संस्कारवान के बजाय संस्कारहीन बनते जाएँगे। अब वक्त आ गया है जब दोनों वर्गों को अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए।  

तुकोजीराव पवार (भूतपूर्व उच्च शिक्षामंत्री) :- बच्चों को संस्कार देने की सबसे पहली व महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उनके माता-पिता व परिजनों की होती है क्योंकि पैदा होने के बाद बच्चा सबसे ज्यादा इन्हीं के संपर्क में रहता है। स्कूल तो वो बड़ा होने के बाद जाता है।

हालाँकि जब बच्चा स्कूल जाता है तब उसके प्रति शिक्षकों की भी जिम्मेदारियाँ होती हैं। निष्कर्ष के तौर पर कहें तो माता-पिता व शिक्षक दोनों को ही अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए बच्चे का भविष्य सँवारकर उसे संस्कारवान बनाना चाहिए।

पारस जैन (भूतपूर्व स्कूली शिक्षामंत्री) :- बच्चों को संस्कारवान बनाने में उसके परिवार का सबसे बड़ा हाथ होता है। वो संस्कार ही हैं, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते हैं। परिवार से संस्कारों का सबक सीखने के बाद विद्यालय की बारी आती है, जहाँ बच्चों को किताबी शिक्षा के साथ-साथ नैतिक शिक्षा का भी पाठ पढ़ाया जाता है। मेरा मानना है कि स्कूल में बच्चों को संस्कारों के साथ-साथ राष्ट्रवाद का भी पाठ पढ़ाना चाहिए, जिससे कि बच्चा एक संस्कारवान संतान व जिम्मेदार नागरिक बने।

इस चर्चा का सार केवल यही है कि यदि शिक्षक और पालक इसी प्रकार एक-दूसरे पर आरोप मढ़ते रहे तो हम कभी किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएँगे और बच्चे संस्कारवान के बजाय संस्कारहीन बनते जाएँगे।

अब वक्त आ गया है जब इन दोनों वर्गों को अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए ईमानदारी से अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए तथा बच्चों के रूप में भावी नागरिकों की एक ऐसी पौध तैयार करना चाहिए, जो समाज व देश को उत्कर्ष व उन्नति के शिखर पर ले जाए।

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