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ईश्वर में भी मातृशक्ति को बराबरी का दर्जा देता है हिंदुत्व — अरविन्द सिसोदिया

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ईश्वर में भी मातृशक्ति को बराबरी का दर्जा देता है हिंदुत्व — अरविन्द सिसोदिया भारतीय सभ्यता की पहचान केवल उसके प्राचीन ग्रंथों, मंदिरों और अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है; बल्कि उसकी वास्तविक पहचान उस जीवन-दृष्टि से होती है, जिसमें मनुष्य, प्रकृति, परिवार, समाज और सृष्टि को परस्पर संबद्ध एवं एकात्म माना गया है। इस व्यापक दृष्टि में स्त्री केवल परिवार की एक सदस्य नहीं है। वह जीवन की सहयात्री, ज्ञान की साधिका, सृजन की शक्ति, परिवार की धुरी और समाज की चेतना है। भगवान शंकर और भगवती भवानी के एकीकृत स्वरूप ‘अर्धनारीश्वर’ की संकल्पना इसकी सच्ची और सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति के रूप में अनादिकाल से स्थापित है, जो वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण प्रतीक है। यूँ तो संपूर्ण पृथ्वी की सभ्यताएँ परिस्थितियों से मुकाबला करते हुए, अपनी-अपनी व्यवस्थाओं का निर्माण करते हुए आगे बढ़ी हैं। इसलिए समयानुकूल व्यवस्थाओं में भेद हो सकते हैं और स्थिति-परिस्थिति के अनेक स्वरूप हो सकते हैं। किन्तु विश्व की अन्य समकक्ष सभ्यताओं के मुकाबले भारतीय संस्कृति की सनातन हिंदू सभ्यता में नारी की स्थिति हमेशा ...