कविता - राजनीती बेजार, निर्लज्जता की हदें पार

कविता - राजनीती बेजार, निर्लज्जता की हदें पार
- अरविन्द सिसोदिया 

क्या बीमारी आई है,
राजनेताओं में अय्याशी छाई है,
पहले भी थे गुण और दोष पर ,
मगर अब निर्लज्जता आई है।
===1===
अमरीका में खूब फ़ज़ीहत,
मी-टू की है सख़्त ज़रूरत,
निर्लज्जता भी हदें पार,
बड़े बड़े बेशर्म और बेज़ार..!
===2===
अब सच के पन्ने खुलते जाते,
पाखंड के चेहरे उजागर आते,
गुनाह जो दबे थे ताक़त से,
न्याय की मेघा में बेनक़ाब सारे।
===3===
सोचो कैसा शर्म का दौर था,
जहाँ इज़्ज़त पर थी राजनीती की खार,
जोर जबरदस्ती की इच्छा से,
अपराधी दिख रही थी सरकार !
===4===
पर आँखों से पर्दा हटा है,
सच का सूरज रोशन खड़ा है,
जिन्हें था भरोसा अँधेरे पर,
उन्हें उजाले ने जा पकड़ा है।
===5===
ये मी-टू का साहस था,
जिससे आग भड़कनी थी,
साहस की चट्टानों नें 
शोषण की अति खोली थी।
===6===
चुप्पी के मुंह से ताले टूटे,
अपराधी जंजीरों में जकडे,
कानून सही जागा मगर,
बचे हुये अनेकों हैँ।
===7===
समाज उन्हें पहचानें,
जो रिश्वत में इज्जत देतें हैँ,
मनमाफिक पद पानें को,
बेटियों को बेंच देते हैँ।
इतिहास तुम्हारी कालिख को,
भूल नहीं सकता !
काला नाम तुम्हारा है,यही सजा से बहुत ऊँचा!
यही सजा से बहुत ऊँचा!! 
==== समाप्त ====

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