अंग्रेजों का षड्यंत्रकारी गठजोड़, भारत को सावचेतना रहना बेहद ज़रूरी है - अरविन्द सिसोदिया
अंग्रेजों का षड्यंत्रकारी गठजोड़,
भारत को सावचेतना रहना बेहद ज़रूरी है - अरविन्द सिसोदिया
आलेख – अरविन्द सिसोदिया
(वरिष्ठ लेखक एवं विश्लेषक)
पिछले एक दशक में भारत की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक स्थिति में उल्लेखनीय सकारात्मक वृद्धि के साथ पोजोटिव परिवर्तन आया है। आज भारत केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर निर्णायक भूमिका निभाने वाला परमाणुशक्ति सम्पन्न राष्ट्र भी है। किंतु इतिहास साक्षी है कि जब भी कोई राष्ट्र सशक्त होता है, तो उसके विरुद्ध प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों प्रकार की चुनौतियाँ भी अन्य दुराग्रही ताकतों के कारण जन्म लेती हैं। वर्तमान परिदृश्य में भारत को ऐसी ही चुनौतियों का सामना अंतरराष्ट्रीय प्रभाव रखने वाले समूहों, सांम्प्रदायिक विस्तारवादियों, वैचारिक नेटवर्कों और आर्थिक दबावों के रूप में करना पड़ रहा है। भारत को उदीयमान गति देनें वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी और भाजपा को रोकने और प्रभावहीन करने के सेंकड़ों षड्यंत्र चल रहे हैँ, जो मूलतः भारत की संप्रभुता, लोकतंत्र और संविधानत्व को प्रभावित करते हैँ।
अमेरिका और यूरोप में सक्रिय कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों और व्यापारिक संस्थानों, विशिष्ट संस्थाओं द्वारा भारत की सरकार, नीतियों और सांस्कृतिक पहचान को निरंतर आलोचना के केंद्र में रखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय निवेशक जॉर्ज सोरोस द्वारा सार्वजनिक मंचों से भारत सरकार और नेतृत्व के विरुद्ध दिए गए बयान इसी क्रम का हिस्सा हैँ । उनके द्वारा समर्थित नेटवर्क का इतिहास विभिन्न देशों में राष्ट्रवादी सरकारों और आंदोलनों के विरुद्ध वैचारिक हस्तक्षेप से जुड़ा रहा है। इस कारण भारत के संदर्भ में भी इन टिप्पणियों को केवल व्यक्तिगत राय न मानकर, व्यापक वैचारिक दृष्टिकोण और उसके लिए कर्ता होने के स्वरूप में परोक्ष व प्रगटतः देखा जा रहा है।
इसी कड़ी में अमेरिका की बेहद मामूली ब्लेकमेलर जैसी कंपनी हिंडनबर्ग की रिपोर्ट द्वारा भारत के प्रमुख औद्योगिक समूह अडानी समूह के साथ साथ उसके निवेशकों को निशाना बनाए जाने की घटना भी उल्लेखनीय है। जिसके द्वारा भारत को बड़ी आर्थिक क्षति दी गईं और दुर्भाज्ञवश उसके साथ विपक्ष का होना प्रश्नचिन्हित करता है। इस रिपोर्ट के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की अर्थव्यवस्था और कॉरपोरेट प्रणाली को लेकर जिस प्रकार का नकारात्मक वातावरण बनाया गया, उस पर अनेक अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों ने प्रश्न उठाए। रिपोर्ट का समय और उसका वैश्विक प्रचार भारत की आर्थिक प्रगति को क्षति पहुंचाने के एक निर्णायक चरण से मेल खाता था, जिससे यह आशंका और गहरी हुई कि क्या यह केवल कॉरपोरेट विश्लेषण था या भारत की आर्थिक साख को प्रभावित करने का प्रयास षड्यंत्रपूर्वक हुआ?
इससे पूर्व में भी वैचारिक स्तर पर भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चुनौती दी गईं । अमेरिका में आयोजित “Dismantling Global Hindutva” नामक अकादमिक सम्मेलन ने व्यापक विवाद को जन्म दिया। इस आयोजन में अमेरिका के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के कुछ विभागों और शोध समूहों की सहभागिता बताई गई। आयोजकों ने इसे हिंदुत्व नामक राजनीतिक विचारधारा पर अकादमिक विमर्श बताया, यही सब दक्षिण भारत के तमिलनाडु में सत्तारुढ़ डी एम के दल के द्वारा भी किया गया। यही बात बार बार दूसरे तरीके से कांग्रेस नेता राहुल गाँधी सहित अनेकों ने कहीं। यह सिर्फ संयोग नहीं बल्कि सोचा समझा गठजोड़ी प्रयोग है। किंतु अनेक हिंदू-अमेरिकी संगठनों और भारतीय विश्लेषकों ने इसे हिंदू पहचान और भारतीय सांस्कृतिक चेतना को नकारात्मक रूप से प्रस्तुत करने वाला अभियान माना। इस आयोजन ने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या अकादमिक स्वतंत्रता के नाम पर किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक अस्मिता को निशाना बनाना उचित है? मगर यह हुआ है।
इन अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के समानांतर भारत की आंतरिक राजनीति से जुड़े कुछ चेहरों की विदेशों में सक्रियता भी चर्चा में रही। राहुल गांधी द्वारा बार-बार विदेशों में ऐसे मंचों और व्यक्तियों से संवाद करना, जो भारत सरकार, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं के मुखर आलोचक रहे हैं, राजनीतिक असहमति और राष्ट्रीय हितों की सीमा को लेकर बहस को जन्म देता है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना स्वाभाविक है, किंतु विदेशी मंचों पर अपने ही देश भारत की संस्थाओं और व्यवस्थाओं को कमजोर दिखाना देश की छवि को प्रभावित करता है। या यूँ कहें कि अंतर्राष्ट्रीय षड्यंन्त्रों को मदद करना या गठजोड़ करना है।
इसी संदर्भ में सोनिया गांधी का नाम Forum of Democratic Leaders in Asia-Pacific (FDL-AP) नामक संस्था से जोड़ा गया, जिसे लेकर राजनीतिक विवाद सामने आया। यद्यपि यह संस्था आधिकारिक रूप से कश्मीर की स्वतंत्रता का समर्थन करने वाली घोषित नहीं है, फिर भी इससे जुड़े कुछ वैचारिक वक्तव्यों और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्कों को लेकर भारत में आशंकाएँ व्यक्त की गईं। यह प्रसंग इस बात को रेखांकित करता है कि भारत जैसे संवेदनशील और विविधतापूर्ण राष्ट्र के मामलों में किसी भी अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव को अत्यंत सावधानी से परखा जाना चाहिए था?
आर्थिक मोर्चे पर भी भारत को दबाव का सामना करना पड़ा। ट्रंप प्रशासन द्वारा अपनाई गई रेसिप्रोकल टैरिफ नीति के तहत भारत पर लगाए गए अतिरिक्त टैरिफ को कई विशेषज्ञों ने अप्रत्यक्ष चेतावनी और दबाव के रूप में देखा। इन टैरिफों का प्रभाव भारतीय निर्यात पर पड़ा और भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में तनाव उत्पन्न हुआ। वही अचानक से अमरीकी रणनीति में बदलाव कई अन्य प्रश्नों को उत्पन्न करता है। क्या भारत में मिशनरीज को बढ़ावा देनें के लिए मोदीजी की सरकार को दबाया, धमकाया जा रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि आज वैश्विक राजनीति में आर्थिक नीतियाँ और पंथ विस्तारवाद भी रणनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा हैं।
इन सभी घटनाओं को यदि अलग-अलग न देखकर समग्र दृष्टि से देखा जाए, तो एक ऐसा परिदृश्य उभरता है जिसमें अंतरराष्ट्रीय प्रभाव समूह, वैचारिक मंच, आर्थिक दबाव और कुछ राजनीतिक गतिविधियाँ एक साथ भारत के विरुद्ध वातावरण बनाती प्रतीत होती हैं। यह आवश्यक नहीं कि यह सब किसी एक केंद्र से संचालित हो, किंतु इनका संयुक्त प्रभाव भारत की छवि, स्थिरता और आत्मनिर्भरता पर पड़ता है।
अपरोक्ष आक्रमण के ऐसे समय में भारत की जनता, मीडिया और बौद्धिक वर्ग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में प्रश्न पूछना आवश्यक है, परंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि हम यह पहचानें कि कौन-सा विमर्श रचनात्मक आलोचना है और कौन-सा विदेशी एजेंडों को जान बूझ करके बल देता है। राष्ट्रहित और राजनीतिक विरोध के बीच की रेखा को धुंधला नहीं होने दिया जाना चाहिए।
भारत एक प्राचीन सभ्यता, सशक्त लोकतंत्र और उभरती वैश्विक शक्ति है। उसकी संप्रभुता, सांस्कृतिक पहचान और विकास को प्रभावित करने वाले किसी भी आंतरिक या बाहरी प्रयास को समझदारी, तथ्यों और विवेक के साथ परखना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। सावचेतना ज़रूरी है।
यह भी स्पष्ट है कि भारत के प्रधानमंत्री मोदीजी बहुत मज़बूत नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरे हैँ, उन्हें कमतर करने की हर कोशिश होगी, किन्तु राष्ट्र के रूप में भारत को उनकी ताकत बन कर सभी धड़यंन्त्रों को परास्त करना है। जय हिंद।
====समाप्त==
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