कविता - मानवता को कर्तव्य पथ बनाएं

कविता - मानवता को कर्तव्य पथ बनाएं

बछड़े के हक़ का दूध पीते,
गौ को माता कहते हैं,
कैसे हैं निर्लज्ज हम,
पापकर्म को जीते हैं,
और धर्म–धर्म कहते हैं,
अधर्म को ही पीते हैँ।
==1==
सच यही है कि
हम अपने स्वार्थ को जीते हैं,
भगवान से भी,
मनोरथ-पूर्ति का काम लेते हैं।
जग को उजाला देते फिरते,
पर अंतर्मन को खोते हैँ।
बाहर दीप जलाते हैं हम,
पर मन का अँधियारा जीते हैँ।
==2==
सुविधाओं की पूजा में डूबकर,
संवेदना को मार देते हैं,
संपत्ति को हड़पने में,
न्याय को भी ताड़ देते हैँ।
अपने ही हाथों से हम,
मानवता को हार देते हैं।
धर्म से कर्तव्य को खाली कर,
हम स्वार्थ की महामारी हैँ।
==3==
अरे ईश्वर कहता है,
पुरुषार्थ करो, इतिहास रचो,
दया-करुणा को जगाओ,
ईश्वर की असली इच्छा,
प्रेम को अपनी पूँजी बनाओ।
ईश्वर तो हर पीड़ा में दर्द हरता,
हर भूखे की आवाज़ आश बनता,
जिस दिन यह समझ लिया हमने,
उस दिन वह हर इंसान, इंसान है।
==4==
आओ अब तो जाग जगाएं,
यह प्रण लें, स्वार्थ से हट जाएँ ,
दया, करुणा और प्रेम से,
मानवता को कर्तव्य पथ बनाएं ,
अपना धर्म बनाएं  अपना मर्म बनाएं।
== समाप्त==

टिप्पणियाँ

इन्हे भी पढे़....

छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहे।

सेंगर राजपूतों का इतिहास एवं विकास

विष्णु के अवतार ' नरसिंह भगवान '

संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को अपमानित करने वालों पर रासुका जैसा कठोर एक्शन हो - अरविन्द सिसोदिया

कविता - युगों युगों में एक ही मोदी आता है - अरविन्द सिसोदिया

कविता - हम हिंदू वीर संतानें हैँ

कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

'परिसीमन' और 'जाति जनगणना के नाम पर महिला आरक्षण अटकाये रखना चाहती है कांग्रेस

योगिराज श्यामा चरण लाहिरी महाशय Yogiraj Shyama Charan Lahiri Mahasaya