हिंदू बांटो राज करो, यह सदियों की परिपाटी है

कविता - हिंदू बांटो राज करो, यह सदियों की परिपाटी है 

हिंदू बांटो राज करो यही तो सदियों से होता आया,
अब तो संभलो हिंदूँ वर्ना पूरी तरह दफन हो जाओगे।
इतिहास कोई कथा नहीं, यह खुली हुई चेतावनी है,
जो कल हुआ, वही क्या फिर दोहराओगे।
=== 1 ===
ताज नहीं टूटा पहले, पहले टूटी थी एकता,
जब भीतर आग लगी, तब  जीती बाहरी सत्ता।
तक्षशिला से तराइन तक, एक ही दोष दिखा,
शत्रु सामने खड़ा रहा, भाई भाई से ही लड़ा।
=== 2 ===
तलवारें कम नहीं थीं, साहस भी था अपार,
पर अहंकार की दीवारों ने खोल दिया हर द्वार।
कोई धर्म बचाने नहीं आया था बाहर से,
कोई न्याय दिलाने नहीं उतरा था सागर पार से।
हमने ही बुलाया था, स्वार्थ के निमंत्रण पर,
और फिर रोते रहे बेड़ियों के बंदीपन पर।
=== 3 ===
अंग्रेज़ आया चाल लेकर, काग़ज़ और कानून,
पहले बाँटा सोच को, फिर लूटा आत्मसम्मान और जूनून।
जाति में बाँटो, भाषा में बाँटो, इतिहास बदल दो,
लड़ते रहो आपस में—राज हमें करने दो!
आज भी वही पटकथा है, बस चेहरे बदल गए,
लड़ाने वाले मुस्कुराते हैं, हम फिर बहक गए।
=== 4 ===
जो सवाल सत्ता से होना था, वो पड़ोसी से कर रहे,
और जो जोड़ने की बात थी, उसे नफ़रत में भर रहे।
अब भी समय है—आँख उठाओ, समझो यह षड्यंत्र,
एकता कोई नारा नहीं, यह रोज़ का आचरण।
भिन्न विचार गुनाह नहीं, पर विद्वेष अपराध है,
जो समाज खुद से लड़ता है, उसका अंत इतिहास है।
याद रखो—जब समाज जुड़ा, कोई तोड़ न पाया,
और जब भीतर बिखरा, तो हर बाहरी शासक आया।
यह क्रोध नहीं, यह चेतावनी है—लिख लो, मान लो,
या फिर अगली पीढ़ी को हार का कारण जान लो!



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