कविता - काश कोई, फिर से आदि शंकर बन जाता,

कविता - काश कोई, फिर से आदि शंकर बन जाता,

काश कोई, फिर से आदि शंकर बन जाता,
सत्य सनातन की ध्वजा को फिर लहराता।
ज्ञान से विज्ञान, आध्यात्म से शास्त्रार्थ सिखलाता,
हिंदू मानवता का मान फिर बढ़ाता,
काश कोई फिर से आदि शंकर बन जाता।

मिथ्या के अंधकार में विवेक का दीप जलाता,
अद्वैत का अमृत जन-जन को पिलाता।
जाति, पंथ, भेद की दीवारें गिराता,
एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति समझाता,
काश कोई फिर से आदि शंकर बन जाता।

वेदों की वाणी को नव युग से मिलाता,
उपनिषदों का सार सरल कर सुनाता।
तर्क से भ्रम, श्रद्धा से अहं मिटाता,
मनुष्य को स्वयं से साक्षात्कार कराता,
काश कोई फिर से आदि शंकर बन जाता।

जहाँ धर्म कर्मकांड में सिमट सा गया है,
जहाँ अर्थ में ही जीवन उलझ सा गया है।
वहाँ त्याग, तप और तत्वज्ञान सिखलाता,
जीवन को ब्रह्म पथ की ओर मोड़ लाता,
काश कोई फिर से आदि शंकर बन जाता।

भारत की आत्मा को फिर से जगाता,
विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम् सिखलाता।
शब्द नहीं, आचरण से धर्म दिखलाता,
मानव में नारायण का दर्शन कराता,
काश कोई फिर से आदि शंकर बन जाता।



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