कविता - गिरेवान में जब झाँकोंगे तब खुद को पहचानोगे

कविता - गिरेवान में जब झाँकोंगे तब खुद को पहचानोगे 

धर्म से देश तोड़ा,जाति से समाज बाँटा,
वंश को सत्ता सौंपकर, लोकतंत्र को ठेंगा दिखाया।
सभ्यता, संस्कृति और संविधान की उपेक्षा की,
स्वतंत्रता के नाम पर, देश को नाकाम किया।
गिरेवान में जब झाँकोंगे,तब खुद को पहचानोगे।
===1===
आपातकाल में आज़ादी कुचली,
सरकारें गिरा गिरा कर जनादेश को रौंदा,
मनचाहों को कुर्सी बाँटकर
योग्यता का गला घोंटा।
इतना सब करने के बाद भी शर्म नहीं,
हर करतूत काली और नैतिकता का पाठ वो पढ़ाते,
गिरेवान में जब झाँकोंगे,तब खुद को पहचानोगे।
===2===
अपने इतिहास से मुँह मोड़कर जा नहीं सकते,
दुश्मन गठजोड़ की 
गुनाहों की लंबी फेहरिस्त लिए फिरते हो,
सत्ता गई तो शोर मचाया, लोकतंत्र खतरे में बताया,
जब सत्ता थी तब कभी संविधान याद नहीं आया 
गिरेवान में जब झाँकोंगे,तब खुद को पहचानोगे।
===3===
अपने ही वतन को दुनिया में नीचा दिखाया,
जाती खुद की छिपाई, धर्म खुद का छिपाया,
पूरे देश में दशकों तक़ तुष्टिकरण चलाया,
गद्दारों से भी बढ़ कर, शत्रुता निभाई,
जनमत से चुने हुओं को भी, गालियां दिलवाईं,
मत भूलिए आपको समाज भी सजा देगा।
गिरेवान में जब झाँकोंगे,तब खुद को पहचानोगे।
===समाप्त===

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