धूमावती माता
धूमावती माता (जिन्हें धूमावती भी कहा जाता है) दस महाविद्याओं में से सातवीं उग्र महाविद्या हैं। उनके संबंध में कुछ प्रमुख जानकारियां नीचे दी गई हैं: -
उत्पत्ति की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ धूमावती की उत्पत्ति से जुड़ी दो मुख्य कथाएं प्रचलित हैं:
शिव को निगलना: एक बार माता पार्वती को तीव्र भूख लगी। उन्होंने महादेव से भोजन मांगा, लेकिन महादेव के ध्यान में मग्न होने के कारण भोजन में देरी हुई। भूख से व्याकुल होकर माता ने स्वयं शिवजी को ही निगल लिया। चूँकि शिवजी के कंठ में विष था, इसलिए माता के शरीर से धुआं निकलने लगा और उनका स्वरूप विकृत हो गया। महादेव ने उनके भीतर से बाहर आने के बाद उन्हें शाप दिया कि वे अब से 'विधवा' रूप में जानी जाएंगी।
सती का देह त्याग: जब देवी सती ने पिता दक्ष के यज्ञ कुंड में अपनी आहुति दी, तो उस अग्नि से उठे धुएं (धूम्र) से धूमावती प्रकट हुईं।
स्वरूप और प्रतीक
दिखावट: वे एक वृद्ध, कुरूप और विधवा स्त्री के रूप में श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हैं।
वाहन और आयुध: वे एक ऐसे रथ पर सवार हैं जिस पर कोई घोड़ा नहीं है और उनके ध्वज पर कौआ विराजमान है। उनके हाथ में अनाज साफ करने वाला सूप (सूपड़ा) होता है।
महत्व: वे अभाव, दरिद्रता और संघर्ष की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं, लेकिन वे साधक को भौतिक मायाजाल से मुक्त कर परम ज्ञान प्रदान करती हैं।
पूजा और मंत्र
प्रमुख मंत्र: "ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा"।
भोग: उन्हें मीठा नहीं, बल्कि कचौड़ी, पकौड़े और नमकीन पदार्थ अधिक प्रिय हैं।
सावधानी: सुहागिन महिलाओं को माता की मूर्ति का स्पर्श करने या उनके अत्यंत निकट जाने की मनाही होती है; वे केवल दूर से दर्शन कर सकती हैं।
प्रमुख मंदिर और तिथि
मंदिर: धूमावती माता का सबसे प्रमुख मंदिर मध्य प्रदेश के दतिया में स्थित पीताम्बरा पीठ परिसर में है।
धूमावती जयंती: वर्ष 2026 में धूमावती जयंती 24 जून को मनाई जाएगी (जबकि 2025 में यह 3 जून को थी)।
उनकी साधना विशेष रूप से गुप्त शत्रुओं पर विजय, रोगों से मुक्ति और तांत्रिक बाधाओं को दूर करने के लिए की जाती है।
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