कविता - देश का मस्तिष्क है संसद,हुडदंग का दंगल मत बनाओ
कविता - देश का मस्तिष्क है संसद,हुडदंग का दंगल मत बनाओ
देश का मस्तिष्क है संसद,हुडदंग का दंगल मत बनाओ,
गरिमा बाँटो, गरिमा अपनाओ और गरिमा बढ़ाओ !
शांतचित्त और सत्यनिष्ठ इसे बना कर,देश की क्षमता बढ़ाओ।
विश्व के आँगन में समन्वय की अनुकरणीयता बनाएं।
===1===
यहाँ शब्द हों सेतु, शस्त्र नहीं,
तर्क हो दीप, अंधड़ नहीं,
विचार टकराएँ, मर्यादा न टूटे,
लोकतंत्र कहीं शर्मसार न हो जाए।
जन-आकांक्षाओं की यह चौपाल है,
हर आवाज़ का हक सवाल है,
हर सवाल का जबाब जायज अधिकार है,
किन्तु, निज स्वार्थ छोड़, राष्ट्र को देखा जाये।
===2===
शोर नहीं, समाधान गूंजे,कटुता नहीं, संवाद सहेजें,
राजनीती नीति हो, आपस में न कुनीति हो,
राष्ट्र एक परिवार है, इसमें सिरफुटब्बल नहीं,
आपस में एक बनों, मधुर रिश्ते रखो,
संसद एक परिवार है, कोई घात प्रतिघात नहीं,
देश का वर्तमान रचें और भविष्य गढ़े।
यही जनसेवा का असली कमाल है।
राष्ट्र चिंतन की मिशाल बनें।
=== समाप्त ===
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