कविता — परिश्रम का कर लो तुम ध्यान


कविता — परिश्रम का कर लो तुम ध्यान
- अरविन्द सिसोदिया 

धर्म, नीति, ज्ञान और विज्ञान,
सबमें ईश्वर का वैभव और विधान।
पर विजय उसी की होती है,
जो करता पुरुषार्थ का सम्मान।
परिश्रम का कर लो तुम ध्यान,
परिश्रम का कर लो तुम ध्यान।
==1==
भाग्य स्वयं भी द्वार न खोले,
जब तक श्रम का दीप न जले।
सपने केवल सोच से नहीं,
हाथों की मेहनत से ही फलते।
गिरकर उठना, फिर चल देना,
यही जीवन की पहचान।
परिश्रम का कर लो तुम ध्यान,
परिश्रम का कर लो तुम ध्यान।
==2==
न भय पथ की कठिन डगर से,
न थकना तूफानी राहों में।
जो डटा रहे संकल्प लिए,
वही चमके इतिहासों मेँ ।
श्रम से ही बनता स्वाभिमान,
श्रम से ही मिलता सम्मान।
परिश्रम का कर लो तुम ध्यान,
परिश्रम का कर लो तुम ध्यान।
==3==
राजा हो या जन साधारण,
सफल वही जो कर्म करे।
नियति भी उसका साथ निभाए,
जो हर पल उद्यम धरें।
कर्मठ मन, दृढ़ निश्चय जान,
यही उन्नति की पहचान।
परिश्रम का कर लो तुम ध्यान,
परिश्रम का कर लो तुम ध्यान।
==4==
ईश्वर भी उस हाथ में बसता,
जिसमें श्रम की रेखा हो।
आलस त्याग, उठ आगे बढ़,
यही जीवन का लेखा है।
कर्म ही पूजा, कर्म ही ज्ञान,
कर्म में ही ईश्वर का स्थान।
परिश्रम का कर लो तुम ध्यान,
परिश्रम का कर लो तुम ध्यान।
==समाप्त==

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