कविता - कुर्सी पाने की खातिर

कविता - कुर्सी पाने की खातिर 

आजादी के कतरे-कतरे पर लिखा है बलिदान,
क्यों अब भी भरमाते हो लेकर अहिंसा का नाम।
इक तरफ़ा हिन्दुओं का हुआ था कत्लेआम,
लाखों लोगों को नसीब नहीं हुआ था शमशान।
सारे महानायक तब मौन थे, ज़ख्मी था हिंदू और हिंदुस्तान थे।
===1===
कुर्सियों की भूख में , इंसान नहीं दिखे,
महलों के सौदे हुए, गाँव-शहर खूब जले ।
नक्से पर एक लकीर से,ख़ून की नदियाँ बहाईं,
सत्ता पाने की ख़ातिर असंख्य अनंत जानें गँवाईं।
===2===
वोट दिया बँटवारे को, पर गये नहीं देश बंटवा कर!
यह अधम पाप पाखंड तुम्हारे ही सर पर,
हिंसा बेपरवाह हुई , पर कोई बोला नही, 
ना लाशों की गिनती हुई,
जो कट गया निर्दोष, उसकी कीमत का किसी को होश नहीं ।
===3===
ट्रेनें लाशों से भरीं, फिर भी रूह नहीं काँपी,
माताओं की चीख़ों पर भी अंतरात्मा नहीं जागी।
जो बचा वो शरणार्थी, जो मरा वो मात्र आँकड़ा था ,
और जो ज़िम्मेदार थे, वो कहलाए देश के अधिपती।
===4===
अहिंसा का पाठ पढ़ाकर, भारत को संघर्ष विहीन किया ,
दया और करुणा के भारत को लहूलुहान खड़ा किया ।
ये बँटवारा नहीं था, ये सत्ता के लिए हुआ नरसंहार था,
कुर्सी पाने की खातिर, जिम्मेदारी से बलात्कार था।
===5===
कैसे कायर हो, आज भी इतिहास के सच को लिखने से डरते हो,
किसने तुम्हे इंसान बनाया, जानवरों से बदतर हो।
क्योंकि सच उँगली उठाता है तब के सिंहासन पे।
ये आज़ादी अत्याचार था अंग्रेजों का, तब के नेताओं के समर्पण से।
===6===
ये सवाल अभी ज़िंदा है, क्या भारत टूटा था मजबूरी में,
या नेताओं की कुर्सी पानें के लालच में पग चंपी थी। 
जबाब तुम खुद दे लेना, बतला देना हिंदुस्तान को,
तब जो भूल हुई अब नहीं करनें देंगे सिंहासन को।
=== समाप्त ===



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