कविता - वीर शिरोमणि राणा सांगा




कविता - वीर शिरोमणि राणा सांगा

तन पर अस्सी घाव सजे थे, पर मन में डर का नाम न था,
कट गया हाथ, गईं एक आँखें, फिर भी रण से विराम न था।
लहू बहा पर तेज न टूटा, सिंह गर्जना गरजती थी,
राणा सांगा के नाम मात्र से, शत्रु की काया कंपती थी।

जहाँ-जहाँ तलवार उठी, स्वाभिमान का दीप जला,
तोपों से नहीं, साहस से युद्धों का मोल बढ़ा।
अपने ही लहू से उसने मातृभूमि को तौल दिया,
वीरता ही उसकी रणभूमि थी, राष्ट्रधर्म ही उसकी बलिवेदी थी ।

खानवा की धरा साक्षी है, लहू से लिखे इतिहास की,
एकाकी सिंह डटा रहा, आँधी आई विश्वासघात की।
देह भले ही टूट गई, पर वचन नहीं टूटा आन का,
राणा सांगा नाम नहीं था, वह प्रतीक था स्वाभिमान का।

राष्ट्रधर्म मेवाड़ की आन था, सूर्यवंशी तेज की शान था,
राजपूताना  स्वाभिमान था, हर रण जिसका इम्तिहान था।
मर कर भी जो अमर हुआ, वह सच्चा सपूत महान था ,
राष्ट्रधर्म के पथ पर चलकर, इतिहास में वह देदीपयमान था.

आओ शीश झुकाएँ आज, उस रणबांकुरे के चरणों में,
प्रेरणापाएं मातृभूमि के लिए मर मिटने की,
वही ज्वाला फिर जीवित हो, हर युवा के मन मस्तिष्क में।
शौर्य को हो जागरण ,फिर उठे सिंह समान समाज,
राणा सांगा अमर रहें, यह भारत का उद्घोष आज।
वीर प्रसूता भारत माँ को, तुम पर सौ-सौ नाज़।

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