कविता - लोकतंत्र अब सिर्फ नाम है
कविता - लोकतंत्र अब सिर्फ नाम है
सुख सुविधा में डूबी दुनिया,
लोकतंत्र अब सिर्फ नाम है।
पूँजीवाद का कब्ज़ा इसपे,
गरीब दर्शक मात्र है।
==1==
सपनों की भी कीमत लगती,
इंसान अब इक माल है।
सच बिकता है बोली में,
झूठ यहाँ बेमिसाल है।
==2==
सत्ता सुनती कुबेरों की,
भूख में कहाँ आवाज़ है ।
महलों में नीति लिखी जाती,
झोपड़ियाँ को बचे खुचे की आस है ।
==3==
फिर भी उम्मीद साँस लेती है,
टूटा नहीं विश्वास है।
आज न सही,कल तो बदलेगा,
इतिहास इसी का गवाह है।
==समाप्त ==
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