कविता - मत भूलो, इतिहास यह गद्दारी भी लिखेगा

कविता - मत भूलो, इतिहास यह गद्दारी भी लिखेगा

दुश्मन खड़ा हो दरवाज़े पर,
उससे लड़ना सबका धर्म है,
तुम कैसे विपक्ष हो,
ऐसे में गृह-क्लेश करते हो।
मत भूलो, इतिहास यह गद्दारी भी लिखेगा,
हर शताब्दी में तुम्हें भी धिक्कार मिलेगा।
===1===
जब दुश्मन ललकारे बार बार ,
तब प्रश्नों की बौछार क्यों,
राष्ट्र जलाने का उसका षड्यंत्र ,
सत्ता और विपक्ष का संघर्ष क्यों,
यह समय नहीं काँओ काँओ का,
न भाषणों की बाज़ी का, न बयानबाजी का,
यह समय है मातृभूमि का चुकाने का,
माँ भारती की रक्षा का, हुंकार उठाने का।
===2===
जो शत्रु को समर्थन देता है, 
जो शत्रु को रेड कारपेट बिछाता हो,
जो शत्रु की भाषा बोले, 
याद रहे वह गद्दार ही कहलाता है।
जो संशय का बीज उगाए,
जो अपने ही शौर्य को झुठलाएं,

वह भीतर बैठा विषधर है,
जो पीठ में छुरा घोंप जाए।
ना झंडा झुकता, ना शीश झुके,
यह वीरों की परंपरा है,
जो आज भी गणना में उलझे,
उनका नाम कल की पराजय है।
याद रखो —
तटस्थता भी अपराध बनेगी,
जब राष्ट्र युद्ध में खड़ा हो,
तब चुप्पी भी गद्दारी गिनेगी।
इतिहास किसी को नहीं छोड़ता,
न तर्क, न चाल, न बहाना,
या तो राष्ट्र के साथ खड़े हो,
या लिख दिए जाओगे — ग़द्दार के नाम से जाना।


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