कविता - कैसा राष्ट्र बना अमरीका,जहां तेल वहाँ टपकी लार है

कविता - 
कैसा राष्ट्र बना अमरीका,जहां तेल वहाँ टपकी लार है 

अमरीका ने फिर से अत्याचार ढ़हाया है।
स्वतंत्र राष्ट्र पर जुल्म और प्रहार दोहराया है।
तानाशाह बनकर मानवता रौंदी गई,
कार्यवाही की आड़ में डकैती बोई गईं,
तेल हड़पने का सारा जाल बिछाया है।
अमरीका ने फिर से अत्याचार ढ़हाया है।
===1===
वेनेज़ुएला की संप्रभुता पर, सैन्यशक्ति से किया वार,
जोरजबरदस्ती बदला, मतपेटी से चुनी गईं सरकार,
जनादेश कुचला, लोकतंत्र की की हत्या,
कैसा राष्ट्र बना अमरीका, जहां तेल वहाँ टपकी इसकी लार।
===2===
किस कानून ने दिया दूसरे देश का ताज तय करने का अधिकार ?
किस नैतिकता ने दी संप्रभुता कब्जानें का अधिकार ?
जो ताक़त से सरकार गिराए, वह मानव नहीं शैतान कहाये।
तानाशाही की यह तस्वीर, तुम्हे खलनायक ठहराती है।
===3===
कंपनियों की मेज़ पर जनता का भविष्य लिखा जाता है,
दूतावासों के कमरों में सत्ता से षड्यंन्त्रों का दृश्य दिखता है,
“स्वतंत्र चुनाव” को प्रभावित करने डालर डलता है।
इतना बड़ा शैतान,भगवान बना फिरता है।
===4===
ख़ुफ़िया तंत्र और पूँजी का यहाँ अजब संयोग,
अस्थिरता,भय और विघटन को बोया जाता है।
दक्षिण एशिया भी इससे न रहा कभी अछूता,
पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल यही खेला आता है।
===5===
वेनेज़ुएला ही नहीं, यह हर ओर यही छाया जाल,
जहाँ मुनाफ़ा पुकारे, वहीं दबती संप्रभुता की चाल।
क्यूबा से ईरान तक, फ़िलिस्तीन से वेनेज़ुएला तक,
दमन की एक ही भाषा है, षड्यंत्र का एकसा खेल।
===6===
भूख को हथियार बनाओ, दवा भी उसकी रोको,
संकट रचकर फिर “मानवता” की बोली बोलो,
पहले घर-आँगन में जाकर अर्थव्यवस्था जलाई,
फिर कैमरों के आगे करुणा की धुन सुनाई।
===7===
कहीं परदे में सत्ता बदली, कहीं कर्ज़ की डोर डाली,
कहीं संकट रचकर “सहायता” की शर्तें थमाईं,
जो झुके वे “मित्र” कहे गये, जो न झुके उन पर तानाशाह की तोहमत लगाई।
लोकतंत्र की बातें ही हैँ , पूँजी के इशारों पर फ़ैसलों नें लीं जंहाई।
===8===
जहाँ बमों की भाषा को “मानवाधिकार” कहा जाता है ।
कर्जो की ज़ंजीरों से राष्ट्रों की गर्दन को बाँधा जाता हो,
अपनी मनमर्जी की सत्ता बनाने, झूठे विद्रोह कराये जाते हों।
यशे षड्यंन्त्रों में फंसी दुनिया, किसको दुहाई दे।
===9===
अन्याय पर चुप रहना भी अन्याय का साथ है,
हर राष्ट्र का हक़ है अपनी संप्रभुता, अपना स्वर, अपनी आवाज है।
विदेशी ताक़त से थोपी सत्ता अत्याचार है, उसे बदलना जनमत का अधिकार है।
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