कविता - गणतंत्र को गुणतंत्र बनाओ

कविता - गणतंत्र को गुणतंत्र बनाओ 

गणतंत्र को गुणतंत्र बनाओ,
वर्ना लोकतंत्र बेकार हैँ।
सुख, समृद्धि और न्याय हो घर-घर,
वर्ना ये चुनाव धिक्कार हैँ।

सत्ता सेवा बन जाए जन-जन की,
न हो सिंहासन का व्यापार।
जनता मालिक, नेता सेवक हों,
तभी बचेगा लोकतंत्र का आधार।

भूखे को रोटी, तन को कपड़ा,
हर हाथ मिले सम्मान।
शिक्षा, स्वास्थ्य सबके हिस्से हों,
तभी सच्चा होगा संविधान।

भ्रष्टाचार की जड़ें काटो,
ईमान को दो खुला आसमान।
थोथापन बंद हो , 
ज़मीन पर उतरे सच्चा काम।

जब तक आँसू पोंछे न जाएँ,
जब तक मिटे न डर-भय-भेद,
केवल नारों, वादों से ही,
न बदलेगा भारत का परिवेश ।

बहुत हुआ, बहुत गुजरा ,
आओ बदलें छल बल का खेल,
सत्य सनातन पुण्य धरा को दें अब,
नीति न्याय और परमार्थ का अभिषेक।

समाप्त 


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