लोकतंत्र की सुचिता और गरिमा के लिए 130वाँ संविधान संशोधन स्वीकार करें


लेख 

लोकतंत्र की सुचिता और गरिमा के लिए 130वाँ संविधान संशोधन स्वीकार करें  

– अरविन्द सिसोदिया 9414180151

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि केवल जनता का प्रतिनिधि होता है, स्वयं कुछ नहीं। यदि उसका आचरण जनभावनाओं के विपरीत है तो उसे जनप्रतिनिधित्व का अधिकार नहीं है। जनता उन्हें इस भरोसे पर चुनती है कि वे पद पर रहते हुए कानून की रक्षा करेंगे, व्यवस्था बनाएंगे और नैतिक आचरण करेंगे। शासन का मूल कर्तव्य अपराधों पर नियंत्रण, अपराधियों को दंड और जनता को न्याय देना है— न कि अपराधी स्वयं शासन करें। 

चुने हुए प्रतिनिधि का पहला धर्म है कि वह तय प्रक्रिया से राजकाज चलाए, हर निर्णय जनता के हित में ले और चौबीसों घंटे अपने कर्तव्य पर खड़ा रहे। परंतु हाल के वर्षों में लोकतंत्र ने विचित्र और शर्मनाक दृश्य देखा— दिल्ली के मुख्यमंत्री और मंत्री गिरफ्तारी के बाद भी जेल में बंद रहते हुए सत्ता संचालन पर अड़े रहे। न्यायपालिका तक इस पर लगभग मौन रही, जबकि कानून साफ है कि कोई साधारण लोकसेवक भी 48 घंटे जेल में रहे तो पद से हटना पड़ता है। जब संविधान में “समता” का निर्देश है तो वही नियम जनप्रतिनिधियों पर भी लागू होना चाहिए। लेकिन इसके विपरीत, जेल से शासन की कोशिश का हास्यास्पद और लज्जाजनक तमाशा होता रहा। पद लोलुपता की हद यह कि आरोपी नेता बेशर्मी से कहते रहे— “मैं जेल से ही सरकार चलाऊँगा।” यह लोकतंत्र का खुला मज़ाक और संविधान की हत्या थी, इस प्रश्न पर न्यायलय को स्वविवेक आगे बढ़ना चाहिए था।
इस तरह प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए मोदी सरकार ने महत्वपूर्ण पहल की है। संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने संविधान का 130वाँ संशोधन विधेयक, 2025 प्रस्तुत किया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री किसी गंभीर अपराध के आरोप में लगातार 30 दिन जेल में रहता है, तो 31वें दिन वह स्वतः पद मुक्त हो जाएगा। लोकतंत्र की पवित्रता की रक्षा के लिए यह स्वागतयोग्य कदम है। विपक्ष का इसका विरोध करना भी उतना ही शर्मनाक है।

सत्ता सेवा है, विशेषाधिकार नहीं

भारतीय परंपरा में सत्ता को सेवा और धर्म पालन का माध्यम माना गया है। अयोध्या के राजा श्रीराम ने राजधर्म निभाने के लिए निजी जीवन का त्याग किया। महाभारत के भीष्म पितामह ने कहा था— “राजा का सुख प्रजा के सुख में है।” श्रीमद्भगवद्गीता कहती है— “श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करेगा, जनता वैसा ही अनुसरण करेगी।” अर्थात सत्ता का आचरण ही प्रजा का मार्गदर्शन करता है।

स्पष्ट है कि सत्ता व्यक्तिगत पतन का कवच नहीं, बल्कि कर्तव्य पथ है। किंतु जब नेता जेल से भी सत्ता संचालन का विशेषाधिकार जताने लगें, तब लोकतंत्र और नैतिकता दोनों की रक्षा के लिए कठोर उपचार आवश्यक हो जाता है।

जनअपेक्षाओं की हत्या 

जनता सरकार इसलिए चुनती है कि वह हर क्षण राजकाज की व्यवस्था संभाले। पर जब कोई प्रतिनिधि जेल पहुँच जाता है, तो उसका कर्तव्य स्वतः बाधित हो जाता है। फिर यह कहना कि संविधान में इस्तीफा लिखित रूप से अनिवार्य नहीं है, केवल बेशर्मी है। क्योंकि जेल में वही व्यक्ति जाता है, जो कानून तोड़ने का प्रथमदृश्यता आरोपी है और न्यायालय ने उसे वहाँ भेजा है। जब तक़ न्यायालय उसे दोषमुक्त न करदे तब तक़ वह इस दायरे में है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि वे जेल से भी सरकार चलाएँगे। उनके मंत्री सत्येंद्र जैन 18 महीने जेल में रहे, फिर भी 9 महीने तक पद से चिपके रहे। ये उदाहरण बताते हैं कि नेताओं ने “कर्तव्यभाव की स्वस्फूर्त नैतिकता” को तिलांजलि दे दी। इसलिए संविधान को अब और सख्त बनाना पड़ेगा।

समानता का प्रश्न भी 

जब एक सामान्य सरकारी कर्मचारी गिरफ्तारी के 48 घंटे बाद ही निलंबित हो जाता है, तो उसे शासित करने वाले मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को विशेषाधिकार नहीं दिया जा सकता। जनता ने उन्हें जेल से शासन करने के लिए नहीं चुना है।

इसलिए प्रस्तुत यह संशोधन केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि लोकतंत्र को गंदगी से बचाने की आवश्यकता है। यह जनप्रतिनिधियों को साफ संदेश देता है कि सत्ता जनसेवा का माध्यम है, न कि निजी लाभ की ढाल। अब समय आ गया है कि राजनीति में नैतिकता , कर्तव्यनिष्ठा और श्रेष्ठता की परंपरायें लौटे और जेल से शासन की हठधर्मिता पूरी तरह अस्वीकार हो।

संविधान बनते समय बहुत से विषय कल्पना में भी नहीं थे, अब वे नैतिकपतन के दौर में सामने आरहे हैँ। उन्हें ठीक करने के लिये ही तो संसदीय सदन की व्यवस्था है, प्रस्तावित संविधान संसोधन पक्ष विपक्ष के लिये नहीं बल्कि लोकतंत्र की सुचिता और गरिमा के निर्माण के लिये है। इसे सभी भेदभाव भूल कर लोकतंत्र की सुचिता और गरिमा के लिये स्वीकार करना चाहिए।

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प्रेषक 

अरविन्द सिसोदिया 
9414180151

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