God exists and He is everything - Arvind Sisodia

Three parts of God: knowledge, science and spirituality
Knowledge-Science-Spirituality: The Triveni of God

"Science is the rule, God is eternal."

"Knowledge gives direction, spirituality gives the basis, science gives the means."

"Where science stops, spirituality starts from there."

"Science is discovery, spirituality is experience, the root of both is God."

"The seed explains science, the tree makes one experience spirituality."

"Science is the system of nature, the architect of that system is God."

"Science without knowledge is darkness, spirituality without science is direction."

"The ultimate truth of all discoveries - Sarvam Khalvidam Brahma."

"Knowledge, science and spirituality - not opposition, but a message of co-existence."

"Science is the study of the principle of God, spirituality is the experience of the experience of God."

ईश्वर तो है और वही सब कुछ है

जब मैंने दिल्ली में एक बहुत बड़े ईश्वर विरोधी वैज्ञानिक से पूछा कि ईश्वर के इस सृजन की कोई भी वस्तु लिए बिना..

क्या इनर्जी बना सकते हो... - उत्तर नहीं

क्या मेटर बना सकते हो...- उत्तर नहीं

क्या लाइट / प्रकाश बना सकते हो..

गुरुत्वाकर्षण बना सकते हो

चुंबकत्व बना सकते हो

तापमान बना सकते हो

समय बना सकते हो

गति बना सकते हो

इंटरनेट बना सकते हो

इलेक्ट्रोन, न्यूट्रॉन और प्रोटोन बना सकते हो

रंग बना सकते हो

ध्वनि बना सकते हो

गंध बना सकते हो 

धुल का एक कण भी बना सकते हो....

कुछ भी बना सकते हो...


अर्थात बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी, इस सृष्टि से कुछ लिए बिना कुछ नहीं बना सकता..! तो यह सृष्टि और इसके नियम कोई तो बना रहा होगा। जो इन सारी चीजों को बना रहा है, वही तो ईश्वर और ईश्वर की सरकार या ईश्वर की व्यवस्था है।
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यह विषय अत्यंत गहन और दार्शनिक है। आपके दिए गए आधार पर मैं आपके लिए एक आलेख प्रस्तुत करता हूँ:


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ईश्वर : सृजन, नियंत्रण और संचालन की परम शक्ति

मनुष्य ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अद्भुत प्रगति की है। आज विज्ञान के सहारे हम अंतरिक्ष तक पहुँच चुके हैं, अणु और परमाणु के रहस्य खोज चुके हैं, इंटरनेट जैसी अदृश्य नेटवर्क प्रणाली का निर्माण कर चुके हैं। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या विज्ञान अपने दम पर शून्य से कुछ बना पाया है?

यदि किसी वैज्ञानिक से पूछा जाए कि—

क्या तुम ऊर्जा (Energy) को बिना किसी स्रोत के बना सकते हो?

क्या तुम पदार्थ (Matter) का एक कण भी शून्य से उत्पन्न कर सकते हो?

क्या... प्रकाश, गुरुत्वाकर्षण, चुंबकत्व, समय, गति, ध्वनि या तापमान का निर्माण कर सकते हो?

उत्तर एक ही होगा—नहीं।
विज्ञान खोज कर सकता है, प्रयोग कर सकता है, संयोजन और परिवर्तन कर सकता है; लेकिन मूल तत्वों का निर्माण नहीं कर सकता।

यही इस सृष्टि का अद्भुत रहस्य है। हम चाहे कितना भी आगे बढ़ जाएँ, लेकिन एक धूल का कण भी बिना प्रकृति से लिए नहीं बना सकते। और प्रकृति स्वयं किसने बनाई? कौन है जिसने ऊर्जा, पदार्थ, समय और नियमों का प्रारंभ किया? यही प्रश्न अंततः हमें ईश्वर के अस्तित्व की ओर ले जाता है।

ईश्वर : सृजन कर्ता शक्ति

संपूर्ण ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, चाहे वह आकाशगंगाएँ हों, सूर्य-चन्द्र हों, या सूक्ष्म कण हों—सबकी उत्पत्ति किसी अदृश्य, असीम शक्ति से हुई है। यही शक्ति सृजन कर्ता है। उसी से सब कुछ प्रारंभ हुआ और उसी से सब कुछ निरंतर उत्पन्न होता रहता है।

ईश्वर : नियंत्रण कर्ता शक्ति

यदि केवल सृजन ही होता और कोई नियंत्रण न होता, तो यह जगत अराजकता में बदल जाता। परंतु सृष्टि के प्रत्येक स्तर पर अद्भुत व्यवस्था है—

ग्रह-नक्षत्र निश्चित गति से चलते हैं,

ऋतुएँ समय पर आती हैं,

पेड़-पौधे बीज से अंकुरित होकर जीवन चक्र पूरा करते हैं,

भौतिक नियम कभी विचलित नहीं होते।

यह अदृश्य नियामक शक्ति ही ईश्वर की व्यवस्था है।

ईश्वर : संचालन कर्ता शक्ति

मनुष्य जीवन में जो भी प्रगति करता है, वह इसी विश्व-व्यवस्था का उपयोग कर करता है। बिजली हो या इंटरनेट, दवा हो या तकनीक—सब प्रकृति के नियमों और पदार्थों पर आधारित हैं। मनुष्य केवल उनका संयोजन करता है, परंतु संचालन करने वाली शक्ति वही है जिसने उन्हें जन्म दिया और जिन नियमों से वे चलते हैं।


निष्कर्ष

इस सृष्टि के अस्तित्व और संचालन के पीछे कोई परम शक्ति है, जिसे हम ईश्वर कहते हैं।

वही सृजन कर्ता है,

वही नियंत्रण कर्ता है,

और वही संचालन कर्ता है।

विज्ञान इस परम सत्य तक पहुँचने का एक साधन है, परंतु सत्य वही है जो हर नियम के पीछे, हर तत्व के मूल में, और हर गति की धुरी पर विद्यमान है।

यही शक्ति ईश्वर है—अनंत, अविनाशी और सर्वव्यापी।
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ईश्वर : सृष्टि का मूल और नियंता

मनुष्य अपने ज्ञान और विज्ञान पर गर्व करता है। अंतरिक्ष की गहराइयों को नाप चुका है, परमाणु को तोड़ चुका है, इंटरनेट जैसी अद्भुत खोज कर चुका है। परंतु जब प्रश्न उठता है कि—

क्या शून्य से एक अणु भी उत्पन्न कर सकता है?

क्या समय, प्रकाश, ऊर्जा, गुरुत्वाकर्षण, रंग या ध्वनि का निर्माण स्वयं कर सकता है?

तो उत्तर नकारात्मक ही मिलता है। मनुष्य केवल खोज करता है, संयोजन करता है; लेकिन सृजन नहीं।

उपनिषदों ने हज़ारों वर्ष पूर्व ही उद्घोषणा की थी—

> “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व। तद्ब्रह्म।” (तैत्तिरीयोपनिषद्)

अर्थात्—“जिससे यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न होता है, जिससे उत्पन्न होकर जीवित रहता है और अंत में जिसमें विलीन होता है, वही ब्रह्म है।”
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सृजन कर्ता शक्ति

ग्रह-नक्षत्रों की उत्पत्ति, जल-वायु-अग्नि का प्रादुर्भाव, एक बीज से वृक्ष का विकास—ये सब स्वतः नहीं हो सकते। इसके पीछे कोई अदृश्य सृजन शक्ति कार्यरत है। गीता में भगवान कहते हैं—

> “अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।” (गीता 10.8)
“मैं ही समस्त जगत का उद्गम हूँ, मुझसे ही सब कुछ प्रवाहित होता है।”
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नियंत्रण कर्ता शक्ति

यदि सृष्टि का केवल निर्माण होता और नियंत्रण न होता, तो ब्रह्मांड अराजकता में बदल जाता। लेकिन यहाँ अद्भुत नियम और अनुशासन है।

सूर्य निश्चित समय पर उदय होता है,
चन्द्रमा कलाओं के चक्र में बँधा है,
ऋतुओं का आगमन निश्चित है,
गुरुत्वाकर्षण सदा समान है।

यह सब किसी उच्चतर नियंत्रण शक्ति के बिना असम्भव है। यही ईश्वर की व्यवस्था है।
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संचालन कर्ता शक्ति

मनुष्य विज्ञान के माध्यम से उपकरण और साधन बनाता है, लेकिन वह मूलभूत तत्व प्रकृति से ही लेता है। बिजली का आविष्कार तभी सम्भव हुआ जब आकाशीय विद्युत को देखा गया। इंटरनेट तभी सम्भव हुआ जब तरंगों के नियम ज्ञात हुए।
यह सब पहले से विद्यमान नियमों पर आधारित है। इन्हीं नियमों का संचालन करने वाला तत्व है—ईश्वर।

निष्कर्ष
ईश्वर कोई कल्पना नहीं, अपितु वह परम शक्ति है—
जिससे यह जगत उत्पन्न होता है,
जिसके नियमों से संचालित होता है,
और अंततः जिसमें विलीन हो जाता है।

गीता के शब्दों में—

> “मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।” (गीता 9.10)
“मेरे ही अधीन प्रकृति चल रही है और उसी से चर-अचर जगत उत्पन्न होता है।”

इस प्रकार विज्ञान जहाँ ठहर जाता है, वहीं से अध्यात्म प्रारम्भ होता है। विज्ञान नियमों की खोज करता है और अध्यात्म उस नियंता की ओर संकेत करता है।
यही नियंता, यही सृजनहार, यही संचालक है—ईश्वर।

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 ज्ञान, विज्ञान और आध्यात्मिक.... सभी ईश्वर की व्यवस्था के अंग हैँ। इन्हें एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा न होकर, एक दूसरे में सह अस्तित्व देखना चाहिए। क्योंकि विज्ञान मूलतः ईश्वरीय व्यवस्थाओं का अध्ययन मात्र ही है।

ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म : ईश्वर की एक ही व्यवस्था के अंग

मनुष्य सभ्यता की यात्रा में तीन स्तम्भ हमेशा उसके साथ रहे हैं—

ज्ञान : जो जीवन और जगत के प्रति बोध कराता है।

विज्ञान : जो प्रकृति के नियमों का परीक्षण और प्रयोग करता है।

अध्यात्म : जो उस परम शक्ति, ईश्वर के अस्तित्व और उसके साथ संबंध का अनुभव कराता है।

ये तीनों मार्ग एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक ही ईश्वरीय व्यवस्था के विभिन्न रूप हैं।
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विज्ञान : ईश्वर की व्यवस्थाओं का अध्ययन

विज्ञान का कार्य है—देखना, परखना और प्रमाणित करना।

जब वैज्ञानिक गुरुत्वाकर्षण को खोजता है, तो वह नया नियम नहीं बनाता, बल्कि पहले से ही स्थापित ईश्वरीय नियम को समझता है।

जब बिजली या इंटरनेट का प्रयोग होता है, तो यह सृष्टि में निहित संभावनाओं का उपयोग मात्र है।

विज्ञान हर खोज के साथ यह स्वीकार करता है कि प्रकृति में पहले से ही एक अनुशासन और नियमबद्धता है।

इस दृष्टि से विज्ञान, वस्तुतः ईश्वर की कार्य-प्रणाली का अध्ययन है।
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ज्ञान : सही दिशा देने वाला तत्व

केवल प्रयोग कर लेना पर्याप्त नहीं है। प्रयोग का उद्देश्य, उसका उपयोग और उसका परिणाम क्या होगा—यह तय करना ज्ञान का कार्य है। ज्ञान ही विज्ञान को मानवता और सद्भाव की दिशा में ले जाता है।
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अध्यात्म : मूल सत्ता का अनुभव

अध्यात्म हमें यह सिखाता है कि सृष्टि का यह अद्भुत अनुशासन किसी परम सत्ता से ही संचालित है। वह सत्ता निराकार भी है और साकार भी। उपनिषद् कहते हैं—

> “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।”
ईश्वर सत्य है, ज्ञान है और अनन्त है।

अध्यात्म ही विज्ञान को उसके मूल स्रोत तक पहुँचाता है और बताता है कि हर नियम के पीछे नियंता शक्ति है।
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सह-अस्तित्व की आवश्यकता

यदि विज्ञान को अध्यात्म से काट दिया जाए, तो वह केवल यांत्रिक और कभी-कभी विनाशकारी बन सकता है। और यदि अध्यात्म को विज्ञान से अलग कर दिया जाए, तो वह आस्था मात्र रह जाएगी, प्रमाण और तर्क से दूर।

इसलिए ज़रूरी है कि ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म तीनों का सह-अस्तित्व हो।

विज्ञान साधन देता है।

ज्ञान दिशा देता है।

अध्यात्म आधार देता है।

तीनों मिलकर ही ईश्वर की पूर्ण व्यवस्था का प्रतिबिंब बनते हैं।
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निष्कर्ष

ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म—ये तीनों ईश्वर की ही देन हैं। इन्हें विरोधी मानना अज्ञान है, और इन्हें सह-अस्तित्व में देखना ही सच्चा बोध है।
अंततः विज्ञान भी हमें उसी सत्य की ओर ले जाता है जिसकी घोषणा अध्यात्म पहले ही कर चुका है—
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म” — यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर ही है।

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ज्ञान – विज्ञान – अध्यात्म : ईश्वर की व्यवस्था के अंग

🌱 ज्ञान – जीवन और जगत को समझने की दृष्टि।

🔬 विज्ञान – प्रकृति और ईश्वर की व्यवस्थाओं का अध्ययन।

🕉 अध्यात्म – मूल सत्ता, परम सत्य का अनुभव।
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विज्ञान और ईश्वर
विज्ञान नियम बनाता नहीं, केवल खोजता है।
गुरुत्वाकर्षण, प्रकाश, ऊर्जा आदि सब पहले से ईश्वर की व्यवस्था हैं।
विज्ञान, वास्तव में, ईश्वर की कार्य-प्रणाली का अध्ययन है।
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ज्ञान की भूमिका
विज्ञान को दिशा देता है।
प्रयोग और तकनीक को मानव कल्याण की ओर मोड़ता है।
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अध्यात्म की भूमिका
बताता है कि सृष्टि का मूल कोई परम सत्ता है।
विज्ञान को उसके आधार स्रोत तक पहुँचाता है।
मनुष्य को मूल्य और मर्यादा का बोध कराता है।
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तीनों का सह-अस्तित्व
विज्ञान → साधन देता है।
ज्ञान → दिशा देता है।
अध्यात्म → आधार देता है।
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सूत्र वाक्य

✨ ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म – विरोधी नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व वाले तीन स्तम्भ हैं।
✨ सभी ईश्वर की व्यवस्था के अविभाज्य अंग हैं।
✨ विज्ञान जहाँ नियम खोजता है, अध्यात्म वहाँ नियंता को प्रकट करता है।
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🌟 ज्ञान–विज्ञान–अध्यात्म : ईश्वर की त्रिवेणी 🌟

🔬 “विज्ञान नियम है, ईश्वर नियंता है।”

🕉 “ज्ञान दिशा देता है, अध्यात्म आधार देता है, विज्ञान साधन देता है।”

✨ “जहाँ विज्ञान रुकता है, वहीं से अध्यात्म प्रारम्भ होता है।”

🌌 “विज्ञान खोज है, अध्यात्म अनुभव है, दोनों का मूल ईश्वर है।”

🌱 “बीज विज्ञान समझाता है, वृक्ष अध्यात्म अनुभव कराता है।”

🌞 “प्रकृति की व्यवस्था विज्ञान है, उस व्यवस्था का शिल्पकार ईश्वर है।”

📖 “ज्ञान बिना विज्ञान अंधा है, विज्ञान बिना अध्यात्म दिशाहीन है।”

🕊 “सभी खोजों का अंतिम सत्य – सर्वं खल्विदं ब्रह्म।”

🔗 “ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म – विरोध नहीं, सह-अस्तित्व का संदेश हैं।”

🌏 “विज्ञान ईश्वर के नियमों का अध्ययन है, अध्यात्म ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव।”
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Knowledge-Science-Spirituality: The Triveni of God

"Science is the rule, God is eternal."

"Knowledge gives direction, spirituality gives the basis, science gives the means."

"Where science stops, spirituality starts from there."

"Science is discovery, spirituality is experience, the root of both is God."

"The seed explains science, the tree makes one experience spirituality."

"Science is the system of nature, the architect of that system is God."

"Science without knowledge is darkness, spirituality without science is direction."

"The ultimate truth of all discoveries - Sarvam Khalvidam Brahma."

"Knowledge, science and spirituality - not opposition, but a message of co-existence."

"Science is the study of the principle of God, spirituality is the experience of the experience of God."
















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