कविता - भारत मां शर्मिंदा है,राजनीती भी धंधा है

 कविता - भारत मां शर्मिंदा है,राजनीती भी धंधा है
- अरविन्द सिसोदिया 
    9414180151

भारत मां शर्मिंदा है, राजनीती भी धंधा है।
धंधा है हां धंधा है, राजनीती भी धंधा है।
--1--
टूटा स्कूटर, फ़टी पेंट, मांगे की शाल,
जनता ने जिता दिया, तो होग्यो मालामाल।
कोठी बनगी, बंगला बनग्यो, फैक्ट्री खुलगी,
महंगी गाड़ियों में घूमे,आडा तेड़ा आमचा चमचा साथ ।
--2--
वोट मांगण आवे, झूठा वादो कर कर जावे,
“स्वप्न स्वर्ग से रोज़ बाँटे , गप्पो में रोज़ डुवावे ” 
लोक लुभावन बातें करता करता गुजरे कई कई साल,
कुर्सी मिलती गईं, कार्यकर्ता भूलो, ठेकेदार जी आवे याद,
--3--
नेताजी फोन घुमावे, संविधान हल जावे,
शासन प्रशासन सब दुशासन बन जावे,
गुंडा छूट आवे, सत्य जेल में जावे, 
कमीशन के धर्म पर, भ्रष्टाचार पूजा जावे,
--4--
गरीब तो गरीब रओ, अमीर बनग्यो गरीब नेता,
झोंपड़ी को  महल बनो, रोज़ हुल्ल्ड हुल्ल्ड होए।
जनता ऊबे, देश डूबे, पर कुर्सी ना डूबे,
इसी चिंता में, आधी आधी रात न सोये।
--5--
दल बदले, गुट बदले,झंडा बदले, पर नीयत ना बदली,
टीवी पे भाषण, मंच पे नारा, नीचे से ऊपर तक खेल सारा।
कागज़ पर योजनाओं का ढेर, मीडिया में सभी स्वा सेर,
जब धरती जाकर ढूंढो, तो मिले न कोय।
--6--
जनता ने नेता बदलो, पर नियती न बदली,
जो जो जीते, कुछ दिन बीते, सब लक्ष्मीपति होये।
अपना उत्थान किया,अपना विकास किया,
गलत क्या किया, जगरीती सो होय।
--- 7----
भारत मां देखे और रोये,
आंख में पानी, मन में ज्वाला,
पर कर न पाये कछु कोय,
जगती के भरोशायां छोडां या हुंकार भरयां?


भारत मां शर्मिंदा है, राजनीती भी धंधा है...
धंधा है हां धंधा है, राजनीती भी धंधा है।
---समाप्त ---





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