लाहिड़ी महाशय की शिक्षाओं में एक हनुमान चालीसा और क्रिया योग का तांत्रिक ज्ञान प्रयोग Lahidi Mahashay

लाहिड़ी महाशय की शिक्षाओं में एक हनुमान चालीसा और क्रिया योग का तांत्रिक ज्ञान प्रयोग
क्रिया योग में श्वास को नियंत्रित कर प्राण को मेरुदंड में ऊपर उठाया जाता है। हनुमान चालीसा में “भूत पिशाच निकट नहि आवै, महावीर जब नाम सुनावै” जैसे श्लोक
प्राणतत्व को शुद्ध करते हैं जब साधक क्रिया योग करते हुए हनुमान चालीसा का जप करता है, तब श्वास और मंत्र-शब्द मिलकर “प्राणिक तरंगें” उत्पन्न करते हैं।

इससे शरीर में नाड़ी-शुद्धि होती है और मन तुरंत स्थिर होता है।
हनुमान चालीसा जैसी साधारण दिखने वाली चीज नहीं है इसमें कितना गहरा रहस्य और अनोखी शक्ति छुपी हो सकती है जब पूजा के समय मंद-मंद स्वर में चालीसा पढ़ी जाती है। असल में क्या चल रहा है? आमतौर पर लोग इसे भगवान हनुमान की स्तुति, भक्ति और रक्षा का गीत मानते हैं। परंतु लाहिड़ी महाशय ने इसका एक अनोखा और गहरा रूप दिखाया है। ऐसा जो ना केवल मन को बल्कि जीवन के हर स्तर को झकझोर सकता है। अगर इसका अर्थ समझा जाए। लाहिड़ी महाशय का जीवन स्वयं एक उदाहरण या साधना, प्रेम और अद्भुत गहराई का।
बनारस की गलियों में शांत साधक के रूप में रहने वाले इस क्रांतिकारी योगी ने कभी शोर नहीं मचाया ना प्रचार किया। बस चुपचाप हजारों को गहरे योग और तंत्र के रहस्य दिए। 

🔹वे कहते थे हनुमान चालीसा कोई साधारण भजन नहीं। 

यह असल में तंत्र और क्रिया योग की रहस्यमय किताब है। जिसमें हर शब्द, हर पंक्ति, हर नाम और बिंब के पीछे एक छिपा हुआ संकेत है आत्मा की ऊंचाइयों तक जाने का। हनुमान चालीसा की पंक्तियां साधक के लिए बाहरी आरती नहीं, बल्कि अंतर की यात्रा का नक्शा है। लाहिड़ी महाशय समझाते थे। यहां हर देवता हर राक्षस हर कथा दरअसल हमारे अपने अंदर की ही बात कर रही है। जो दैवी शक्तियां हैं वे हमारे अंदर की ऊर्जा है। जो असुरी शक्तियां या राक्षस है वे हमारी खुद की कमजोरी आलस्य अशुद्ध विचार या बेचैनी है और सबसे बड़ी रणभूमि जहां यह युद्ध चलता है वह बाहर नहीं हमारी रीढ़ की हड्डी के भीतर है जहां प्राण मन और चेतना का असली नाटक चलता है।

हनुमान चालीसा की सबसे पहली पंक्ति पर ही ठहर जाना चाहिए।
🔹 श्री गुरु चरण सरोज रज साधारण अर्थ में यह गुरु के चरणों की पूजा है। पर वास्तव में लाहिड़ी महाशय कहते हैं। यह चरण कोई मिट्टी के पैर नहीं बल्कि हमारी दोनों भौंहों के बीच स्थित आज्ञा चक्र के दो पंखुड़ियां है। वही जहां तीसरी आंख मानी जाती है। जब कोई पूरी नम्रता से अपना अहं, अपनी जिद, अपनी अपेक्षाएं छोड़कर अंतर्मन के गुरु के सामने झुकता है तो समझो उसकी भीतर की अग्नि जगने लगती है। जिस प्रकार सोनार सोने को बार-बार आग में गलाता है और सारी अशुद्धियां बाहर निकल जाती है। वैसे ही विनम्रता की अग्नि में अहंकार जलकर राख होने लगता है और यही सच्चा योग आरंभ होता है। सच्चे तंत्र का द्वार है जहां साधक का मन शांत और दृष्टि भीतर की ओर हो जाती है। फिर चालीसा में आता है महावीर विक्रम बजरंगी। हनुमान को महावीर कहने के पीछे सिर्फ ताकत या साहस नहीं। बल्कि वह गुप्त संकेत है। वॉरियर ब्रीथ यानी योद्धा जैसा प्राणायाम। योग में हनुमान ही असली प्राण श्वास के अधिपति माने गए हैं। जैसे गाड़ी को चलाने के लिए इंजन चाहिए। वैसे ही आत्मा को शरीर से जोड़ने वाला द्रव्य है प्राण श्वास।

हनुमान का असल अर्थ है हन यानी मारना। मान यानी मन अर्थ हुआ मन का बंधन समाप्त करने वाला। जब साधक नियमित गहरे श्वास प्रवाह द्वारा अपनी बिखरी हुई सोच जिसे चंचल बंदर मन भी कहते हैं को शांत लेता है तब असली हनुमान अपने भीतर प्रकट होता है। जैसे हनुमान जी ने लंका जाने के लिए विशाल सागर पार किया। वैसे ही साधक अपनी बेचैनियों के समुद्र को पार कर शांत प्रकाशमय तट तक पहुंचता है। जहां राम यानी चेतना का सूर्य उसका स्वागत करता है। भूत पिशाच निकट नहीं आवे। कितनी सरल पंक्ति लगती है। मगर देखिए इसमें कितना रहस्य है। लोग समझते हैं भूत पिशाच कोई डरावनी आत्माएं होंगी। मगर लाहिड़ी महाशय का कहना है यह हमारे मन की नकारात्मक तरंगे, गलत आदतें, अंदर की चुपचाप गूंजती अशुद्धियां है जो परिस्थितियां बिगाड़ती है। जब साधक नित्य साधना करता है, प्राणायाम का अभ्यास करता है और श्वास को धीरे धीरे रीढ़ की सीध में ऊपर ले जाता है। तब यह सारी नकारात्मक चीजें भीतर की अग्नि में जलकर खाक हो जाती है। जैसे प्रमुख नदी में गंदगी फेंक दी जाए तो वह पानी की धारा सबको बहा ले जाती है। वैसे ही युक्त प्राण शक्ति सारी खींचतान और मन के विष को जलाकर शुद्ध कर देती है। हनुमान चालीसा में जब हनुमान के कंचन वरण सुंदर जैसे शरीर की बात आती है तो यह केवल ताकत या सुंदरता का गुणगान नहीं। लाहिड़ी महाशय कहते हैं वह असल में सूक्ष्म शरीर का प्रतीक वर्णन है।

ऐसा सूक्ष्म शरीर जो शुद्ध प्राणधाराएं नाड़ियां द्वारा चमक रहा हो। कंठल सुबेसा यहां वे उज्ज्वल तारों जैसी भीतर बहने वाली ऊर्जा की धारा को ठीक वैसे ही बताया गया है। जैसे कोई राजसी पोशाक पहने हो। जैसे सोने को अग्नि में डालने पर उसकी धातु ज्यादा सुशुद्ध और चमकीली होती जाती है। वैसे ही जब साधक आंतरिक प्राण शक्ति से बार-बार रीढ़ और चक्रों को शुद्ध करता है तो अनदेखी अनसुनी बेचैनियां जलने लगती है। तब भीतर नई ऊर्जा, ठंडी, गर्म उत्तेजना, नीला, स्वर्ण प्रकाश या अनोखा आनंद अपने आप खींचने लगता है। हनुमान को शंकर सुवन केसरी नंदन कहा गया है। यह सांसारिक अर्थ से ऊपर उठकर देखना जरूरी है। शंकर यानी शिव। शिव का अर्थ होता है मौन। एकदम शांत अवस्था। लाहिड़ी महाशय कहते हैं योग में जब सांस प्रवाह बेहद सूक्ष्म हो जाती है। तब श्वास की यह सूक्ष्मता चुप्पी की गोद में उत्पन्न होती है। यही है शिव का पुत्र यानी हनुमान। केसरी नंदन सिंह के समान पिता का पुत्र यानी वह विशाल शक्ति जो सूक्ष्म प्राण का जागृत रूप है।

कुंडलिनी का लहराता ज्वार है। इस तरह असली हनुमान, मौन, शिव और अग्नि, कुंडलिनी की संगत है। जिस साधक के भीतर असली मौन और जागृत ऊर्जा की मित्रता हो जाए। उसी के भीतर असली हनुमान का जन्म होता है ना कि सुनहरे रंग या बड़ी पूंछ से। जय हनुमान ज्ञान गुण सागर साधारण जयकारा नहीं। यह आंतरिक संकेत है। ज्ञान और परम गुणों का सागर अंदर चल रही श्वास है जो हर बार रीढ़ के सहारे ऊपर जाती है और हर नए चक्र, हर नए तंतु को छूकर नई चेतना, नई बुद्धि और नए सत्कर्मों को जगा सकती है। जब साधक भाव से चालीसा पढ़ता है। असल में उसे अपनी संपूर्ण एकाग्रता आज्ञा चक्र यानी दोनों भौंहों के बीच बसानी होती है। भाषिक उच्चारण मुख से हो लेकिन सूक्ष्म श्वास रीढ़ के अंदर ऊपर चढ़े यह जिंदा अभ्यास है। इसी को लाहिड़ी महाशय लिविंग क्रिया कहते हैं। ऐसा अभ्यास जिसमें मंत्र सांस और एकाग्रता एक सीध में बहती है।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता असर लोग सोचते हैं हनुमान जी आठ प्रकार की चमत्कारी शक्तियों और नौ प्रकार की संपत्तियां दे सकते हैं। परंतु सच में यह संकेत है। आठ प्रमुख प्राणायामों पर सिद्धि प्राप्त संभाव नियंत्रण हासिल करने पर साधक को समय, मन, जगह, प्राण और चेतना का जबरदस्त अधिकार मिल सकता है। वही नौ निधियां यानी शरीर के वह नौ द्वार जहां से प्राण आमतौर पर बाहर निकल जाता है। दोनों आंख, दोनों कान, दोनों नाक, मुंह, गुप्तांग और गुदा। अगर साधक का अभ्यास इतना गहरा हो जाए कि यह सभी लीक बंद हो जाए तो समझो भीतर की ऊर्जा शरीर में ही सहेज रहती है। तब कांपते हुए आनंद दिव्य रस की अनुभूति भीतर ही भीतर एक अनोखी मिठास बनने लगती है। जैसे किसी बर्तन का सारा दूध बाहर बह जाए तो उसका क्या लाभ? मगर उस दूध की एक एक बूंद ठहर जाए तो उससे घी बन सकता है। कड़ी साधना से जब प्राण का एक एक कतरा संभाल लिया जाए तो वही ऊर्जा साधक का अनुभव बदल देती है।
तभी अमृत का स्वाद ऊपरी गले के पास बिंदु बिंदु स्थान पर बनने लगता है। हनुमान चालीसा के आखरी हिस्से में एक गहरा संदेश छुपा है। जो यह पढ़े हनुमान चालीसा लाहिड़ी महाशय बार-बार कहते थे केवल पंक्तियां पढ़ते रहना या गाना काफी नहीं। पढ़ना यानी तन्मय होकर आज्ञा के केंद्र में ध्यान से और हर सांस को रेशमी धागे की तरह रीढ़ की गहराई में बहने देना। तब साधक के सभी पुराने बंधन, दुख, रुकावटें अपने आप ढह जाती है। वह सीताराम का सेवक बन जाता है। इसका रहस्य देखिए। सीता यानी कुंडलिनी ऊर्जा, राम यानी परम चेतना। अपने अंदर इस दो के मिलन की सेवा करना यानी सांस प्रवाह को ऐसा साध लेना जैसे पल पल उस बैठक शिव शक्ति के समर्पण में हो तब सहस्रार सर के ऊपर का हजार पंखुड़ियों वाला कमल अचानक प्रकाश से झलमलाने लगता है। चालीसा का अंतिम रत्न पवन तनय संकट हरना मंगल मूर्ति रूप पवन तनय यानी श्वास की संतान संकट हरना यानी श्वास का सही नियंत्रण साधने पर रीढ़ में जो कर्म बीज पुराने जन्म मरण के संस्कार हैं वे अपने आप जल जाते हैं हट जाते हैं मंगल मूर्ति रूप यानी शुभता की मूर्ति कोई पत्थर की मूर्ति नहीं बल्कि जिंदा धड़कता अनुभव है जो सुषुमना रीढ़ की सीध में साधना करतेकरते एक शांत व्यापक दिव्य कंपन में रूपांतरित हो जाता है। तब सिंपल आरती पूजा जप सब एक जिंदा खेल बन जाते हैं। जिसमें सांस ही देवी है। साधना ही प्रार्थना और श्वास प्रवाह की प्रक्रिया ही असली पूजा बन जाती है।
लाहिड़ी महाशय कहते थे हनुमान चालीसा को धीरे-धीरे गहरे ध्यान और सत्कर्म प्राण संचालन के साथ पढ़ो जिससे सांस रीढ़ के मध्य सुषुमना नाड़ी मुख्य चैनल से ऊपर जा सके। यही वही तांत्रिक अभ्यास है जिसमें सांस और मंत्र एक धागे में पिरोए जाए। वे कई बार बोलते थे सच्चा मंदिर बाहर नहीं रीढ़ के मध्य सुषुमना है। रोज वहां जाओ। सांस ही असली हनुमान है। बाहरी मूर्ति नहीं। उसे बाहरी रूप में नहीं भीतर के प्राण में पूजो। जब कोई साधक इस प्रक्रिया में लगन और श्रद्धा के साथ जुड़ जाता है तब उसका विश्वास केवल विश्वास नहीं रहता बल्कि प्रत्यक्ष अनुभूति में बदल जाता है। कभी हलका कमल या चंदन की खुशबू आ सकती है। कभी आंखों के सामने अनोखे दृश्य उभर सकते हैं। कभी मन से ऐसा प्रेम और आनंद की धारा फूट सकती है। यह संकेत है कि भीतर का हनुमान जाग रहा है। साधक को भ्रम के महासागर के पार ले जाकर राम यानी परम आत्मा के पास पहुंचा रहा है। हनुमान चालीसा जब लाहिड़ी महाशय की दृष्टि से देखा जाए तब यह साधारण भजन रह ही नहीं जाता।

यह बन जाता है भीतर की आग, सांस, प्रक्रिया की जादू, आात्मिक जागरण और अद्भुत वीरता का संक्षिप्त गहन ग्रंथ। इसे गाना मतलब समूची ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ झूम उठना। इसका ध्यान करना मतलब साधना के राजपथ पर दौड़ना। इसका जीवन में उतारना मतलब खुद को हनुमान की तरह निडर, निश्चल ऊर्जा से लबालब, भगवान के प्रति समर्पित और जीवन रहते ही मुक्ति के समीप लाकर खड़ा करना। अब सोचिए आम जीवन में इसका क्या अर्थ है? उसकी अनुभूति रीढ़ के भीतर की जाए तो देखेंगे भीतर एक अद्भुत शांति ऊर्जा एक हलकी हलचल पैदा होने लगती है। जैसे तेज धूप में पसीना पसीना आदमी अचानक छांव में बैठ जाए और ठंडी हवा लगे उतनी ही राहत अंदर आती है। रोज रोज यही अभ्यास करने पर वही सांस जीवन का सबसे बड़ा सहारा बन जाती है। तब डर, तनाव, फिक्र, लालच, ईर्ष्या जैसी भूत पिशाचे पास भी नहीं फटक पाती।

हनुमान जी का जीवन ही इसकी सबसे सुंदर मिसाल है। जब जब संकट आया, हनुमान जी ने कभी अपने बल का अभिमान नहीं किया। ना डर में डगमगाए। हमेशा अपने राम नाम, अपने भीतर की शक्ति और सेवा पर विश्वास रखा। चित्र विचित्र परिस्थितियां हो या रावण जैसे दुष्ट से आमना-सामना वह डरते नहीं। बस अपने प्राण शक्ति का सदुपयोग किया। ठीक वैसे ही जब आम इंसान को लगा कि काम का पहाड़ टूट पड़ा। पारिवारिक उलझने हो या मन निराश हो। तब केवल हनुमान जी की तरह सांस पर फोकस करना। राम नाम का स्मरण मन के अशांत विचारों को जलाना ही असली समाधान है। देखा जाए लाहिड़ी महाशय का सारा जीवन बाहर भीतर का योग था। परिवार नौकरी समाज सभी निभाया। साथ ही अद्भुत योगिक साधना की गहराइयां भी छुई। ना उन्होंने संन्यास लिया ना वे जंगल गए ना ही अलौकिक शक्तियों का दिखावा किया। वे बस साधारण परिवार के व्यक्ति थे। उनके लिए श्वास प्रवाह की साधना ही हनुमान जी की तरह वीरता थी।
नम्रता ही असली शक्ति थी और प्रेम ही असली पूजा। ऐसा समझा जाए कि हर बार जब हनुमान चालीसा पढ़ी जाती है तो वह ना केवल मुसीबतों से बचाती है बल्कि भीतर के सोए हुए हनुमान को जगाकर हर समस्या के सामने खड़ा कर देती है। जैसे अद्भुत साहस संयम, ऊर्जा का भंडार और सेवा की भावना का विस्फोट। यही सच का असली हनुमान, वही वीरता जो हर बच्चे, हर स्त्री पुरुष की नींव में छपी रहती है। साधारण जीवन में भी कोई बच्चा बार-बार फेल हो जाए। कोई मजदूर रोज कमाते कमाते थक जाए। या किसी मां को बच्चों के जीवन की चिंता सताए। अगर विश्वास, धैर्य और अपनी सांस की लय से एक नया रिश्ता बना लिया जाए तो असंभव भी संभव बन जाता है। ठीक जैसे हनुमान जी ने पर्वत उड़ाकर संजीवनी लेकर आए वैसे ही साधक अपने सांस रूपी पर्वत को पकड़कर जीवन की हर मुश्किल में से संजीवनी खोज सकता है। कभी बस अनुभव के रूप में, कभी नए समाधान में, कभी शांति के रूप में। हनुमान चालीसा का असली लाभ ही शब्दों की गणना या आवाज के जोर से नहीं बल्कि उस भीतर की रोशनी और सरल अनुशासन से है। जो दिन रात हर सांस के साथ बहती है। जिसे अपने जीवन के टुकड़ों में जोड़ना है। डर को हराना है। कष्ट को जलाना है। भीतर एक धधकती यह ज्वाला जगानी है।

वह बस मुक्त होकर पूरे मन और प्राण के साथ हनुमान चालीसा को अपने भीतर उतार ले। सिर्फ बोलना, गायन करना या माला फेरना ही काफी नहीं। असली राज है। सच में उस ऊर्जा, उस प्राण धारा, उस ज्ञान, वीरता को तहे दिल से महसूस करना और हर क्षण सांस की धड़कन के साथ उसमें रम जाना। इस पूरे खेल में सबसे सुंदर बात है। कोई उम्र, जात, धर्म, अमीरी, गरीबी की बंदिश नहीं। यह साधना हर किसी के लिए है जो सच्चे हृदय से अपने भय, चिंता और अशांति के जाल को काटना चाहता है। एक बच्चा, बुजुर्ग, गृहिणी, ऑफिस जाने वाले, मजदूर, व्यापारी, हर कोई जब अपने मन के डर, निराशा और असंतुलन से तंग हो जाए तो अपनी सांस, प्रक्रिया और सरलता को ही अपना सबसे बड़ा औजार बना ले। और हनुमान चालीसा को पूरे प्रेम, ध्यान और श्वास, प्रश्वास की संगत से पढ़े और जिए।

आखिर में वही जीवन असली है जिसमें डर के आगे चमकती है उम्मीद की किरण जिसमें निराशा के अंधेरे में भी प्राण की ऊर्जा, वीरता और प्रेम की रोशनी झलमलाती है। हनुमान चालीसा जब इस नजरिए से अपनाई जाए तो जीवन खुद ब खुद बदलने लगता है। हर सांस एक मंत्र है। हर आशंका एक विजय और हर साधक अपने भीतर के हनुमान को पहचान ले। यही सच्ची साधना यही विजय यही मुक्ति है। तो आज से हनुमान चालीसा का गायन सिर्फ उपासना नहीं भीतर के राजपथ पर चलना है। भीतर की अद्भुत वीरता को पहचानना है और सांस के लय में राम के नाम में उस अजस्त्र ऊर्जा का अनुभव करना है जो हर बार असंभव को संभव बनाने चली आती है। हर डर को मिटा देती है और जीवन को परम आनंद की ओर ले जाती है। यही हनुमान का भेद, यही चालीसा की जादू और यही सच्ची तांत्रिक साधना है जो हर घर, हर जीवन, हर सांस में सकती है।

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