कविता - देश लूट तंत्र में समाया है

लोकतंत्र की अभिलाषा थी,
जग के आंसू पोंछू,
हर घर में सुख समृद्धि हो ,
हंसी ख़ुशी से सबकी झोली भरदूँ।
बीत गये दसकों इसके,
पर ये होना पाया !
रामराज्य की कल्पना थी,
पर देश लूट तंत्र में समाया है ।

फूलों-सी कोमल आशाएँ,
काँटों में ही उलझी हैं,
नेताओं के वायदों की नावें
अक्सर बीच भंवर में अटकी हैं।

जनता की थकी निगाहें
अब भी उम्मीदें टटोलती हैं,
किसे पुकारे न्याय हेतु,
जब चौखटें ही डगमग बोलती हैं।

पर फिर भी मन के भीतर
एक दीप अडिग जलता है,
अधकारों के अँधेरे में
सत्य का पथ ही पलता है।

हम ही बदलेंगे जग को,
ये संकल्प हृदय में गुंजाए,
लोकतंत्र तभी खिलेगा
जब जन-जन कर्तव्य निभाए।



टिप्पणियाँ

इन्हे भी पढे़....

कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

भक्त प्रहलाद : Bhagat Prhlad

दशा माता पूजन Dasha Mata Puja

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहे।

‘फ्रीडम टु पब्लिश’ : सत्य पथ के बलिदानी महाशय राजपाल

सेंगर राजपूतों का इतिहास एवं विकास

कविता - हिन्दु सनातन जिसे कहते है वह मानवता का मान है

राजस्थान के व्याबर जिले में देवमाली गांव,कैंसर का 'झाड़ा'

आपातकाल : लोकतंत्र की प्रथम हत्या Emergency: The First Murder of Democracy

‘‘भूरेटिया नी मानू रे’’: अंग्रेजों तुम्हारी नहीं मानूंगा - गोविन्द गुरू