कविता - शासन बना दुसाशन



कविता - "शासन बना दुसाशन"

शासन बना दुसाशन, कैसा है ये प्रशासन,
गरीब डोळ्या फिरता, अमीर खाये राशन।
===1===
जनता कतारों में, पसीने से तर-बतर,
अफ़सर गिनते नोट, दफ्तर एयरकंडिशन ।
न्याय की आँखों पर पट्टी कस के बाँध दी,
सच की आवाज़ को, नौकरशाही नें दफ़न कर दी।
===2====
कहते हैं "विकास", पर दिखता कहाँ है,
सड़कें टूटीं, पर सत्ता का जहाज़ उड़ा है।
अन्नदाता भूखा, पर नेता मस्त भाषण,
शासन बना दुसाशन, कैसा है प्रशासन।
====3====
माँगों पर लाठी, सवालों पर केस,
सिस्टम की कुर्सी पर बैठा अब ।
गरीब की थाली में सूखी पड़ी कहानी,
अमीर की थाली में चमके विदेशी पानी।
====4===
कब तक चलेगा ये छल का विधान,
जनता पूछे — कहाँ है संविधान ?
उठे अगर फिर जनता की आहट का गान,
बदल जाएगा ये शासन, बनेगा नया विधान।
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