विविध धर्म : एक ही सत्य के अनेक स्वरूप

विविध धर्म : एक ही सत्य के अनेक स्वरूप
धर्म मूलतः किसी संप्रदाय या परंपरा का नाम नहीं, बल्कि उस एक ही वास्तविकता का विविध रूपों में अभिव्यक्ति और अनुभव है। वह अनंत शक्ति वास्तविकता जो न आरंभ रखती है न अंत, जो न किसी एक भाषा में बंधी है न किसी एक रूप में। किंतु हम मनुष्य—अपनी सीमित बुद्धि और अनुभव के कारण—उसी एक शक्ति को अलग-अलग नामों, प्रतीकों और विधियों में बाँट देते हैं। कोई उसे वाहे गुरु कहता है, कोई ईश्वर, कोई अल्लाह, कोई बुद्ध, कोई जीसस; परंतु सत्य एक ही है—जो सबका आधार है, सबमें विद्यमान है। वही परत सत्य और परमात्मा है।

जब मनुष्य सच्चे भाव से प्रार्थना करता है, तो वह वास्तव में उसी एक अनंत शक्ति से संवाद करता है, चाहे उसके शब्द भिन्न हों या कर्म....। प्रार्थना धर्म की सबसे निर्मल अभिव्यक्ति है—वह मनुष्य को भीतर से मजबूत करती है, संदेह को शांत करती है और साहस का संचार करती है।

खेल के मैदान से लेकर जीवन के हर संघर्ष तक यह तथ्य उजागर होता है कि आस्था हमें केंद्रित, संयमित और अडिग बनाती है। जब  दीप्ती शर्मा हनुमान जी का स्मरण करती है, जय श्रीराम इंस्ट्राग्राम में लिखती है, हरमनप्रीत कौर मैदान में ‘वाहे गुरु’ को याद करती हैं, या जेमिमा रोड्रिग्स बाइबल के वचनों से प्रेरणा पाती हैं, तब वे किसी अलग शक्ति को नहीं, उसी सार्वभौमिक ऊर्जा को पुकार रही होती हैं, जो सबकी है। जो सबमें है।

धर्म हमें यह नहीं सिखाता कि कौन सही है और कौन गलत—बल्कि यह समझने की दृष्टि देता है कि सभी मार्ग एक ही केंद्र की ओर जाते हैं। जब यह दृष्टि विकसित होती है, तब मतभेद समाप्त हो जाते हैं और मनुष्य की चेतना विस्तृत होकर करुणा, सहयोग और आत्मबल में परिवर्तित हो जाती है।

वास्तव में ईश्वर अनेक नहीं, एक ही है जो अनेक रूपों में प्रकट होता है। हम ही हैं जो उसे सीमित करते हैं, विभाजित करते हैं, पर वह तो हर दिशा में समान रूप से विद्यमान है—असीम, विराट, निराकार, आदि और अनंत।

इस सत्य को स्वीकार करना ही धर्म का सार है। और जब मनुष्य उस एकत्व को समझ लेता है, तो उसके भीतर का भय मिट जाता है, उसका हृदय दृढ़ हो उठता है, और उसकी प्रार्थना—चाहे किसी भी भाषा में हो—सीधे उस परम सत्य तक पहुँच जाती है।

धर्म का वास्तविक उद्देश्य विभाजन नहीं, एकत्व का अनुभव है।
यही वह अनुभूति है जो मनुष्य को उसकी आंतरिक शक्ति से जोड़ती है, जहाँ कोई सीमाएँ नहीं, केवल एक ही वास्तविकता है जो सबमें समाई है।

इसलिए कहा गया है उसकी कृपा पाने के लिए निर्मल मन होना चाहिए।

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