कविता : “केवल इंसान”



कविता : “केवल इंसान”
- अरविन्द सिसोदिया 

जीवन की किश्ती जब उतरती है, सपनों का संसार सजाये ,
मन के गहरे दरिया में कुछ अरमानों के स्वप्न समाए।
हर अरमान के दामन में सौ–सौ उम्मीदें होती हैं,
पर उनके संग ही राहों में सौ–सौ मुश्किलें भी होती हैं।

कभी हवा रूठ जाती है, कभी लहरें रोड़ा डालती हैं,
कभी किस्मत की रातें आकर, राहों को धुँधला बनाती हैं।
पर जो मन को थामे रखते, जो साहस को ढाल बनाते है ,
वे ही आगे बढ़ते जाते, तूफानों पर पग रख सफलता पाते हैँ।

जो डर की दीवारें तोड़ें, हिम्मत का दीप जलाएँ,
जो गिरकर फिर उठते जाएँ, मंज़िल को गले लगाएँ।
उनके पाँवों की रफ़्तार में संघर्षों की धुन होती है,
उनके कदमों की आहट में, हिम्मत की हुंकार होती है।

धरती के हर कोने में जब उनका साहस गूँज उठता है,
वीरता का हर इतिहास उन्हीं के नामों से जुड़ता है।
जो तूफ़ानों को जीत सके, जो मुश्किल से न घबराएँ—
धरती पर सदियों से ही ये लोग, “केवल इंसान” कहलाएँ।
इंसान कहलाये।

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