शनिवार, 12 जून 2010

कांग्रेस-लाशों के डेरों का कोई मायने नहीं हे.....

भोपाल गैस त्रासदी - इंसाफ नही, लाशों का व्यापार
अब बात यह तो तय हो कई क़ी कांग्रेस  क़ी, तत्कालीन प्रधानमंत्री एवं विदेशमंत्री राजीव गाँधी  क़ी केंद्र सरकार ने ही बचा कर भगाया था, राष्ट्रदूत अखवार ने तो यह भी छापा  हे क़ी एंडरसन ने भारत छोड़ने से पहले , तत्कालीन राष्टपति ज्ञानी जेल  सिंह के साथ चाय पी थी . खेर बात सिर्फ इतने पर ख़त्म नही होती क़ी एंडरसन भाग गया , वह इस देश में १५ हजार लाशें छोड़ कर गया था , मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के लाखों निवासी जहरीली गेस से बुरी तरह घायल हुए  थे , सड़कों पर बचने के लिए भागते हुए म़ोत के मुह में समा गये  थे अर्थार्त लाखों घायल अस्पताल में थे , किसी की तो जबाबदेही होगी ही , उनका भी क्या हुआ , इस पूरे मामले में कांग्रेस की चाहे तत्कालीन केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार रही हो , बाजिवतोर पर गंभीरता  से किसने लिया ! सच तो यह हे की इस देश का देशवासी  मरता  हे तो मरता रहे , कांग्रेस को तो सत्ता   और समर्धि चाहिए , लाशों  की गिनती  में क्या रखा हे सत्ता के सुख मिलने चाहिए , मारे हुए लोगों को तो सभी भूल जाते हें , भोपाल बालों को भी किसने दिल से याद किया , याद किया होता तो मुकदमें का यह हाल नही होता ,
१- लाखों लोगों की लाशों पर किया स्वतन्त्रता का सोदा  -
कांग्रेस  ने १९४७ में अव्यवहारिक तरीके से किये जा रहे देश के विभाजन को स्वीकार किया , सत्ता सुख के लिए , भारत के विभाजन से करोड़ों लोग प्रभावित हुए। विभाजन के दौरान हुई हिंसा में करीब ५ /१० लाख लोग मारे गए, और करीब १.४५ /२.००  करोड़ शरणार्थियों ने अपना घर-बार छोड़कर बहुमत संप्रदाय वाले देश में शरण ली। 
 २- बदले की भाबना से हजारों शिखों को मारा -
1984 में प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद 4 हजार से अधिक सिख बंधु मारे गए थे। ३१ अक्टूबर और एक नवम्बर के बीच की रात सिखों के नरसंहार की वारदातें चालू रही। प्रशासन मौन था। ३१ अक्टूबर व 1 नवम्बर के बीच की रात को कांग्रेंस के शीर्ष नेताओं की बैठकों के दौर चलते रहे। समर्थकों को बडे पैमाने पर इस बात के लिए प्रेरित किया गया। कि वे इस नरसंहार को अंजाम दें। न्याय का भी वही हाल हुआ जो भोपाल गैस त्रासदी के केस का ....., 
३- भारतीय सेना ने श्रीलंका में, भारतीय मूल के ५ हजार श्रीलंकाई मारे - 
भारतीय शांति रक्षक सेना ने लिट्टे को तोड़ने का पूरा प्रयास किया। तीन वर्षों तक दोनों के बीच युद्ध चला।   सिंहलियों ने भी अपने देश में भारतीय सैनिकों की उपस्थिति का विरोध करना आरंभ किया। इसके बाद श्रीलंका सरकार ने भारत से शांति रक्षकबलों को वापस बुलाने की मांग की, लेकिन राजीव गांधी ने इससे मना कर दिया। १९८९ के संसदीय चुनाव में राजीव गांधी की हार के बाद नए प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने श्रीलंका से शांति रक्षक बलों को हटाने का आदेश दिया। इन तीन वर्षों में श्रीलंका में ग्यारह सौ भारतीय सैनिक मारे गए, वहीं पांच हजार श्रीलंकाई भी मारे गए थे। .
कुल मिला कर यही कहा जा सकता हे की , कांग्रेस के लिए लाशों के डेरों का कोई मायने नहीं हे . आम नागरिक की जिंदिगी की कोई कीमत होती तो ,एंडरसन के अलावा भी भारत में इस भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेवार लोग थे उनका क्या हुआ , किसी का कुछ हुआ ही नही हे , संदेस यह गया हे की हमारे यहाँ नागरिक की कोई कीमत नही हे ,  आप आइये  जहर  बनाईये , आप नही आये तो हमारे नेतागण भूखों मर जायेगें  ,
अरविन्द सिसोदिया
राधा क्रष्ण   मन्दिर रोड ,
ददवारा, कोटा २
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