23 जून : डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी बलिदान दिवस 23 June: Dr. Shyamaprasad Mukherjee Sacrifice Day

राष्ट्रहित पर पहला बलिदान
- अरविन्द सिसोदिया
डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी बलिदान दिवस


नेहरू ज्यों ज्यों गरजेगा ,
जनसंघ त्यों त्यों बरसेगा |

( नेहरू का रोष जितना बढेगा ,जनसंघ उतना ही मजबूत होगा और यही हुआ !! )

लाखों भारतवासियों  के प्रेरणा पुंज और पथ प्रदर्शक ,  डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी महान शिक्षाविद, चिन्तक और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे, जो की भारतीय जनता पार्टी का प्रारंभिक नाम था  । भारतवर्ष की जनता उन्हें एक प्रखर राष्ट्रवादी के रूप में युगों युगों तक स्मरण करती रहेगी। राष्ट्र सेवा की प्रतिव्धता में उनकी मिसाल दी जाती रहेगी . एक प्रखर  राष्ट्र भक्त के रूप में, भारतीय इतिहास उन्हें सम्मान से स्वीकार करता है , उनका बलिदान स्वतंत्र भारत में, राष्ट्रहित पर पहला बलिदान था , आज जो जम्मू और कश्मीर भारत का अंग है। वह उनके ही संघर्ष के कारण हे, उनके बलिदान के कारण हे, भारतीय राजनीती में उन्होंने , एक जुझारू, कर्मठ, विचारक और चिंतक के रूप में, भारतवर्ष के करोड़ों  लोगों के मन में उनकी गहरी छबि अंकित है। वे एक निरभिमानी देशभक्त थे । बुद्धजीवियों और मनीषियों के वे आज भी आदर्श हैं।  जब तक यह देश रहेगा तब तक उन्हें सम्मान के साथ २३ जून को हमेशा याद  किया  जायेगा !

- डा मुखर्जी देश के विभाजन के खिलाफ थे , उनकी धारणा थी की जब हमारी सांस्क्रतिक पृष्ठ भूमि एक है तो दो टुकड़े क्यों ?
- देश के सबसे कम उम्र के कुलपति रहे , मात्र 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्व विद्यालय में कुलपति बनें।
- वे अनेक बार  विधायक रहे , बंगाल  में मंत्री रहे , संविधान सभा में थे , देश की प्रथम केंदीय सरकार में भी वे केविनेट मंत्री रहे . बाद में त्यागपत्र दे कर जनसंघ की स्थापना की , जनसंघ की और से लोकसभा में संसद सदस्य रहे. वे पंडित नेहरु के समक्ष वक्ता थे। उन्हें संसद का शेर कहा जाता था, नेहरूजी उनसे कन्नी काटते थे ।
- जब जवाहरलाल नेहरु की केंद्र सरकार नें जम्मू और कश्मीर को सहराष्ट्र का दर्जा दे रखा था , जीससे जम्मू और कश्मीर  को अलग झंडा , अलग निशान और अलग संविधान  का अधिकार मिला हुआ था और वहां कोई विना परमिट प्रवेश नही कर सकता था ......! तब डा. मुखर्जी ने न केवल विरोध किया बल्कि पूरे देश में एक बड़ा आन्दोलन खड़ा किया , गर्जना की एक देश  में दो प्रधान, दो निशान और दो विधान नही चलेंगे...!!

डॉ मुकर्जी जम्मू काश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उन्होंने सह राष्ट्र जैसा अधिकार देने वाली धरा 370 का खुल कर विरोध किया, एक विशाल सभा में डा मुखर्जी ने घोषणा की में जम्मू और कश्मीर में बिना परमिट प्रवेश करूंगा, क्योंकि यह देश का अभिन्न अंग है। वहीं क्यो यह भारत का अभिभाजित अंग हे।

संसद में अपने ऐतिहासिक भाषण में डॉ मुकर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की थी। वे 1953 में बिना परमिट लिए जम्मू काश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। जहाँ उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबंद कर लिया गया। 23 जून, 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। वे भारत के लिए शहीद हो गए, सही मायने में उनकी हत्या हुई थी, मगर उनके रास्ते पर भारतीय  जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी चली ,लम्बे सघर्ष के बाद वहां भारत का झंडा मान्य हुआ , फिर जो पहले प्रधानमंत्री था वह मुख्यमंत्री हो गया , भारत का निशान मान्य हुआ , सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र पहुंचा , अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी की सरकार के द्वारा, वही जम्मू और कश्मीर जो सह राष्ट्र जैसा था, अब भारत में पूर्ण विलीन किया जा चुका है। इसके दो संघ राज्य क्षैत्र है। जम्मू और कश्मीर एवं लद्धाख ! यह सब राष्ट्र को प्रथम मानने वाली भाजपा सरकार से संभव हुआ।

23 जून को कश्मीर पर मुखर्जी के बलिदान से भारत ने एक ऐसा व्यक्तित्व खो दिया जो हिन्दुस्तान को नई दिशा दे सकता था। उन्हें सच्ची श्रधांजली  यही होगी की हम सभी सतत सतर्कता से  राष्ट्र सेवा करें , राष्ट्रहित को सर्वोपरी रखें !!!. 

- राधा क्रष्ण मन्दिर रोड ,
  ड़डवाडा , कोटा 2 , राजस्थान .




टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय अरविन्द सिसोदिया जी...इस आलेख के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद...डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसी हस्ती इस देश के लिए हीरा है...इन्हें खो देने का हमें दुःख है...
    डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को कोटिश नमन:

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