न्याय मित्र व्यवस्था बना कर जनता को राहत दी जाये



“न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता, पारदर्शिता और सत्यपरकता को सुदृढ़ करना।


न्याय मित्र व्यवस्था नियमावली, 2025

(Amicus Curiae Rules, 2025)

🔹 प्रस्तावना

जहाँ यह आवश्यक है कि न्यायिक प्रणाली को अधिक परिपक्व, गतिशील, निष्पक्ष और पारदर्शी बनाया जाए;
जहाँ यह भी देखा गया है कि न्यायालयों में कई बार मौखिक बहसों, कथनों, नोटशीटों और अभिलेखों में गलत इंद्राजी, तथ्यात्मक विकृति या मिलीभगत से असत्य प्रस्तुतियाँ होती हैं,
वहाँ इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु न्यायालयों में “न्याय मित्र” (Amicus Curiae) की संस्थागत व्यवस्था स्थापित की जाती है —
जो न्यायालय को तथ्यात्मक, तकनीकी और नैतिक दृष्टि से निष्पक्ष सहायता प्रदान करेगा।

🔹 अध्याय – I : संक्षिप्त शीर्षक, प्रारंभ एवं प्रयोजन

1. संक्षिप्त शीर्षक: ये नियम “न्याय मित्र व्यवस्था नियमावली, 2025” कहलाएँगे।

2. प्रारंभ: ये नियम राजपत्र में प्रकाशन की तिथि से प्रभावी होंगे।

3. प्रयोजन: न्यायालयों को विधिक, तकनीकी और सत्यपरक सहायता प्रदान करना, ताकि न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और तर्कसंगत बनी रहे।

🔹 अध्याय – II : परिभाषाएँ

1. “न्याय मित्र” (Amicus Curiae): वह व्यक्ति जो न्यायालय के निर्देश पर निष्पक्ष रूप से न्यायालय की सहायता करता है।

2. “न्यायालय” से अभिप्राय उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय तथा अधिसूचित अधीनस्थ न्यायालय हैं।

3. “पैनल” से अभिप्राय न्यायालय द्वारा अनुमोदित न्याय मित्रों की सूची है।

4. “समिति” का अर्थ है वह चयन समिति जो न्याय मित्रों के चयन, मूल्यांकन और अनुशासन के लिए गठित की जाती है।

🔹 अध्याय – III : चयन प्रक्रिया और योग्यता

1. चयन समिति का गठन:

(क) मुख्य न्यायाधीश (अध्यक्ष),

(ख) वरिष्ठतम न्यायाधीश,

(ग) अधिवक्ता संघ के प्रतिनिधि।

2. योग्यता:

न्यूनतम 10 वर्ष का विधिक या संबंधित क्षेत्र में अनुभव।

निष्पक्षता, नैतिकता और सत्यनिष्ठा के प्रति प्रमाणित आचरण।

किसी पक्ष, संस्था या राजनीतिक इकाई से प्रत्यक्ष संबंध न हो।

3. कार्यकाल: तीन वर्ष (पुनर्नियुक्ति योग्य)।

🔹 अध्याय – IV : कार्य, अधिकार एवं दायित्व

1. न्यायालयीय भूमिका:
न्याय मित्र न्यायालय का अधिकारी होगा, जो न्यायाधीश को सत्य, तर्क और अभिलेखीय निष्पक्षता बनाए रखने में सहयोग देगा।

2. न्यायाधीश द्वारा सौंपे जाने वाले कार्य:

(क) फाइलों और अभिलेखों का अध्ययन कर वस्तुनिष्ठ रिपोर्ट देना।

(ख) किसी जटिल बिंदु या तकनीकी विषय पर स्वतंत्र राय प्रस्तुत करना।

(ग) नोटशीट, बयान या आदेश के प्रारूप में निष्पक्षता बनाए रखने हेतु सहयोग देना।

(घ) किसी विवादित या संवेदनशील प्रकरण में तथ्यात्मक सत्यापन करना।

3. फाइल व दस्तावेज़ों तक पहुँच:

न्याय मित्र को न्यायालय की अनुमति से अभिलेख देखने की अनुमति होगी।

गोपनीय दस्तावेज़ों का अवलोकन केवल न्यायालय की निगरानी में किया जा सकेगा।

न्याय मित्र गोपनीयता व निष्पक्षता की लिखित प्रतिज्ञा देगा।

4. रिपोर्ट का स्वरूप:

रिपोर्ट “निष्पक्ष राय-पत्र (Neutral Opinion Note)” के रूप में प्रस्तुत होगी।

यह न्यायालय के लिए सलाहकारी (Advisory) होगी, बाध्यकारी नहीं।

🔹 अध्याय – V : मौखिक बहस, कथन और नोटशीट की पारदर्शिता

1. न्याय मित्र यह सुनिश्चित करेगा कि न्यायालय की कार्यवाही, मौखिक बहस, वकीलों के कथन और रीडर स्तर की नोटशीट में किसी प्रकार की गलत इंद्राजी, झूठी व्याख्या या भ्रामक प्रविष्टि न की जाए।

2. यदि ऐसी गड़बड़ी पाई जाए तो न्याय मित्र उसे “तथ्य-विरोधी निरीक्षण टिप्पणी (Fact-Contradiction Note)” के रूप में न्यायालय को गोपनीय रूप से प्रस्तुत करेगा।

3. न्यायालय इस पर आवश्यक प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कदम उठा सकेगा।

4. यह प्रक्रिया गोपनीय रहेगी ताकि किसी भी पक्ष की प्रतिष्ठा को अनुचित क्षति न पहुँचे।

🔹 अध्याय – VI : अधिवक्ता आचरण निरीक्षण एवं न्यायिक सत्य सहयोग

1. न्याय मित्र न्यायालय को यह आकलन करने में सहायता देगा कि किसी अधिवक्ता या पक्षकार द्वारा झूठ, भ्रामक तर्क, या तकनीकी छल के माध्यम से न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास तो नहीं हो रहा है।

2. वह ऐसे मामलों में न्यायालय को वस्तुनिष्ठ, तथ्य-आधारित विश्लेषण प्रस्तुत करेगा।

3. न्याय मित्र किसी अधिवक्ता पर प्रत्यक्ष आरोप नहीं लगाएगा; केवल तथ्यों की असंगति या विरोधाभास इंगित करेगा।

4. न्यायाधीश उसकी रिपोर्ट पर विचार कर आवश्यक टिप्पणी या निर्देश दे सकते हैं।

🔹 अध्याय – VII : प्रशिक्षण, आचार संहिता एवं उत्तरदायित्व

1. सभी न्याय मित्रों को न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण अनिवार्य होगा।

2. उन्हें गोपनीयता, सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता संबंधी आचार संहिता पर हस्ताक्षर करना होगा।

3. अनुचित आचरण, पक्षपात या सूचना लीक पाए जाने पर निलंबन या निष्कासन किया जा सकेगा।

🔹 अध्याय – VIII : पारिश्रमिक और व्यय

1. न्याय मित्रों को न्यायालय निधि या राज्य सरकार द्वारा निर्धारित मानदेय दिया जाएगा।

2. अध्ययन, यात्रा और रिपोर्टिंग व्यय की प्रतिपूर्ति की जा सकेगी।
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🔹 अध्याय – IX : प्रतिज्ञा (Oath of Neutrality)

> “मैं, (नाम), यह शपथपूर्वक प्रतिज्ञा करता/करती हूँ कि न्यायालय द्वारा सौंपे गए अभिलेख, फाइल, नोटशीट या बयान का अवलोकन करते समय मैं पूर्ण निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा और गोपनीयता का पालन करूंगा/करूंगी तथा न्याय की सर्वोच्चता के लिए निष्पक्ष सहयोग दूंगा/दूंगी।”
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🔹 अध्याय – X : परिणाम और प्रभाव

1. यह व्यवस्था न्यायालयों में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और निष्पक्षता को सशक्त करेगी।


2. मौखिक बहसों, रीडर की नोटशीटों और अधिवक्ताओं के तर्कों में सत्य और तथ्य का संतुलन सुनिश्चित होगा।


3. न्यायालयों को एक सक्षम, स्वतंत्र और विश्वसनीय सहयोग तंत्र प्राप्त होगा,
जिससे न्याय व्यवस्था परिपक्व, गतिशील और न्यायोन्मुख बनेगी।
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क्या आप चाहेंगे कि मैं इसी सामग्री को अब “न्याय मित्र (नियुक्ति, अधिकार और उत्तरदायित्व) अधिनियम, 2025” के रूप में —
अर्थात् संसद या राज्य विधानमंडल के लिए विधेयक प्रारूप (Bill Draft) में तैयार कर दूँ?
उसमें धाराएँ, उद्देशिका, परिभाषाएँ और दंडात्मक प्रावधान भी जोड़ दिए जाएँगे।


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