चंद्रशेखर आजाद बनाम नेहरू जी

नोट - यह आलेख वाट्सएप पर ब्रजेश शर्मा के एकाउन्ट से कट पेस्ट है.....।


भयानक हिन्दू द्रोही, समाज द्रोही और देश द्रोही जवाहर लाल नेहरू द्वारा कानपुर के महान क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद के साथ विश्वासघात करके उन्हें अपने आनंद भवन,, इलाहाबाद ( अब प्रयागराज ) के पास स्थित अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों द्वारा मरवा देना !
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महान क्रांतिकारी अमर हुतात्मा स्व. चन्द्रशेखर आज़ाद देश को स्वतंत्र कराने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। इसके लिए वे पहले कानपुर में क्रांतिकारी गणेश शंकर विद्यार्थी के पास गए। वहाँ उनसे और अन्य क्रांतिकारी साथियों से विचार विमर्श करते हुए यह तय हुआ कि हमें रूस के राष्ट्रपति स्टालिन की मदद लेनी चाहिए, क्योकि स्टालिन ने स्वयं ही चंद्रशेखर आजाद को रूस बुलाया था। सभी साथियों को रूस जाने के लिए उस समय बारह सौ रुपये की आवश्यकता थी, जो उनके पास नहीं थे। इसलिए आजाद ने प्रस्ताव रखा कि जवाहरलाल नेहरू से पैसे माँगे जायें, क्योंकि नेहरू के पास बहुत पैसा था और वे बाहर से देशभक्ति की बातें भी बहुत करते थे। इस प्रस्ताव का सभी ने विरोध किया और कहा कि नेहरू तो अंग्रेजों का भयानकतम एजेंट और दलाल है। लेकिन आजाद ने कहा कि कुछ भी हो , आखिर उसके सीने में भी तो एक भारतीय दिल है, वो मना नहीं करेगा।

फिर आज़ाद अकेले ही कानपुर से इलाहाबाद चले गए और आनंद भवन में जाकर नेहरू से मिले। उनको सामने देखकर नेहरू चौंक उठे, क्योंकि उस समय अंग्रेजी सरकार आजाद को पकड़ने के लिए अत्यधिक बैचेन थी। आजाद ने नेहरू से निवेदन किया कि भगत सिंह की फांसी की सजा को उम्र कैद में बदलवा दें, क्योंकि वायसराय लार्ड इरविन से नेहरु के अच्छे सम्बन्ध है । पर नेहरू ने आजाद की बात नहीं मानी। दोनों में इस पर बहस भी हुई। फिर आजाद ने नेहरू को बताया कि हम सब स्टालिन के पास रूस जाना चाहते हैं, क्योंकि उन्होंने हमें बुलाया है और आजादी के आन्दोलन में मदद करने का प्रस्ताव भेजा है। हमें वहाँ जाने के लिए रुपयों की आवश्यकता है। 

यह जानकर नेहरू बहुत क्रोधित हुए और आर्थिक सहायता करने से साफ मना कर दिया। फिर कुछ सोचकर वे मान गये और आजाद से कहा कि तुम अल्फ्रेड पार्क में जाकर बैठो। मेरा आदमी तीन बजे तुम्हे वहीं पर पैसे दे देगा। चन्द्रशेखर आजाद नेहरू की कुटिलता को नहीं समझ सके और उस महानीच और कमीने आदमी पर विश्वास करके अल्फ्रेड पार्क में जाकर बैठ गये। 

वह दिन था- 27 फरवरी 1931, जिस दिन क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद की मृत्यु हुई थी। इस दिन वे आनंद भवन से निकलकर अपनी साइकिल से सीधे अल्फ्रेड पार्क पहुंचे और महानीच कमीने और अंग्रेजों के वेतनभोगी एजेंट और दलाल नेहरू के आदमी के आने की प्रतीक्षा करने लगे। इधर पीछे से नेहरू ने उनके साथ भयानकतम विश्वासघात किया और पुलिस अधिकारियों को सूचना दे दी कि अल्फ्रेड पार्क में आपका शिकार बैठा हुआ है। तुरन्त उस पार्क में पुलिस अधिकारी नॉट बावर अपनी फोर्स के साथ पहुँच गया। जिन आजाद को अंग्रेजी सरकार इतने सालों में भी नहीं पकड़ नही पाई थी, उसे अंग्रेजों ने केवल 40 मिनट में तलाश करके अल्फ्रेड पार्क में घेर लिया। मुठभेड़ में क्रान्तिकारी आजाद ने कई पुलिस वालों को मार डाला और जब उनकी माउजर पिस्तौल में केवल एक ही गोली शेष रह गयी, तो उसे अपनी कटपटी पर मारकर बलिदान हो गये। अंग्रेजी सरकार के हाथ केवल उनका मृत शरीर ही लगा !

महान क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद के नाम से ही अंग्रेज अफसरों की पेंट गीली हो जाती थी। उन्हें धोखे से मरवाने वाला कोई दूसरा व्यक्ति नहीं, बल्कि हिंजड़े हिंदुओं का प्रिय नेता और हिंदुओं का प्यारा और हीरो मादर......जवाहर लाल नेहरू ही था । उनके अल्फ्रेड पार्क में होने की जानकारी केवल नेहरू को ही थी, जहाँ उस कमीने महाराक्षस ने भयानक धोखा करके पैसे देने का वायदा करके बैठने को कहा था।

चंद्रशेखर आज़ाद की मृत्यु से जुडी फ़ाइल आज भी लखनऊ के सीआइडी ऑफिस १, गोखले मार्ग में रखी है। उस फ़ाइल को भारत माता और सनातन हिंदुओं के भयानक गद्दार नेहरू ने सार्वजनिक करने से मना कर दिया था। इतना ही नहीं नेहरू ने उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री और नेहरू के भयानकतम चमचे गोविन्द बल्लभ पन्त को उस फ़ाइल को नष्ट करने का आदेश भी दे दिया था, लेकिन क्योंकि पन्त जी स्वयं भी एक क्रांतिकारी रहे थे, इसलिए उन्होंने नेहरू को झूठी सूचना दे दी कि उस फ़ाइल को नष्ट कर दिया गया है। 

उस फ़ाइल मे इलाहाबाद ( अब प्रयागराज ) के तत्कालीन पुलिस सुपरिटेंडेंट नॉट बावर के बयान दर्ज हैं। उसने अपने बयान मे कहा था- ”मै खाना खा रहा था। तभी नेहरू का एक संदेशवाहक आया। उसने कहा कि नेहरू ने एक संदेश दिया है कि आपका शिकार अल्फ्रेड पार्क में है और तीन बजे तक रहेगा। मैं कुछ समझा नहीं। फिर मैं तुरंत आनंद भवन भागा और वहाँ नेहरू ने मुझे बताया कि ‘अभी आज़ाद अपने साथियों के साथ आया था। वो रूस भागने के लिए तीन हज़ार रुपये मांग रहा था। मैंने उसे अल्फ्रेड पार्क मे बैठने को कहा है।’ फिर मैंने बिना देरी किये पुलिस बल लेकर अल्फ्रेड पार्क को चारों ओर से घेर लिया और आजाद को आत्मसमर्पण करने को कहा। लेकिन उसने अपना माउजर निकालकर हमारे एक इंस्पेक्टर को मार दिया। फिर मैंने भी गोली चलाने का हुकम दिया। पांच गोलियों से आजाद ने हमारे पांच लोगो को मारा। फिर छठी गोली अपनी कनपटी पर मार ली।”

लेखक : डॉ. विजय कुमार सिंघल 
कार्तिक कृ. 13, सं. 2082 वि. ( 19 अक्टूबर, 2025 )

आवश्यक संशोधन सहित संपादन और प्रस्तुति ; डा. ओम प्रकाश आर्य सैनी !

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