कविता - मजबूती ही साथी अपनी



कविता - “ मजबूती ही साथी अपनी ”
अरविन्द सिसोदिया 
 94141 80151

कभी-कभी लगता है,
सुख एक भ्रम है..,
मृगतृष्णा है ,
जो दूर से सोने सी दमकती है,
पर पास जाओ तो रेत बन जाती है।

हम भागते हैं उसके पीछे,
थके कदमों से, टूटे सपनों से,
पर वह हर बार, गुम हो जाती,
फिर कहीं और निकल जाता है।

कष्ट, संघर्ष और समस्याएँ,
यही तो जीवन की धक धक हैं,
यही सांसों का सार है ,
यही अस्तित्व का प्रमाण हैं।

सुख की चाह सिर्फ थकाती है ,
कष्ट हमें चलना सिखलाता है,
संघर्ष हमें गढ़ता है, मजबूत बनाता है,
जैसे अग्नि सोने को पूरा खरा कर देती है।

जीवन कोई उत्सव नहीं,
न ही दंड की कहानी,
यह तो बस एक यात्रा है,
जो अनुभवों की कहानी है,
और अंततः यात्राओं की रवानी है,

जब हम यह समझ लेते हैं
कि सुख और दुख दोनों ही अतिथि हैं,
तब भीतर एक मौन जन्म लेता है,
जहाँ कोई चाह नहीं,
कोई भय नहीं,
बस एक आत्मविश्वास रहता है।

मत घबराओ, मत डरो भयों से,
मत सुखों के पीछे भागो,
कठनाई तो परीक्षा है,
कठिन तैयारी करो,
मजबूती ही साथी अपनी,
दृढ़ता से बढ़ते बढ़ते मंजिल पर पहुंचो।
---

टिप्पणियाँ

इन्हे भी पढे़....

छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश

संघ का विचार भारत के सत्य सनातन का विचार है – मुरलीधर

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहे।

कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

सेंगर राजपूतों का इतिहास एवं विकास

श्री चांदमारी बालाजी मंदिर मार्ग कोटा की समस्या व समाधान Chandmari Balaji Kota

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, मास्को जेल में..?

God Science: God as the Supreme Scientist — A Journey of Evolution

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर NSA लगाया जाये

परमपूज्य डॉ. हेडगेवार : अखण्ड राष्ट्र-साधना