कविता - रोज़ नया पथ गढ़ना होगा

कविता - रोज़ नया पथ गढ़ना होगा 
- अरविन्द सिसोदिया 
  9414180151

रोज नया पथ गढ़ना होगा,
नित नित संघर्षरत करना होगा,
कौन तपस्या सहज जगत में,
हर पल क्षण संतापों को हरना होगा।

धूप चुभेगी, छाँव न होगी,
पग-पग काँटों की राह मिलेगी,
फिर भी मुस्कान सजाए रखना होगा ,
हर पीड़ा को पराजित करना होगा ।

आंधियाँ रोके चाहे राहें,
दीप जलाना होगा मन में,
विश्वासों की लौ से सजकर,
अंधकार को हरना होगा।

स्वप्न न होंगे पूरे पर ,
बार बार प्रयत्नों को करना है,
थककर बैठो भी पल भर को,
फिर उठ आगे बढ़ना होगा।

जीवन यज्ञ अपूर्ण न रह जाए,
अर्पण सम्पूर्ण करना होगा,
हर अश्रु को मोती समझकर,
हँसते हँसते बढ़ना होगा।

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